शतक / सैकड़ा / शतांक केवल लुभाता भर नही है बल्कि एकाग्रता बढ़ाता है, जिम्मेदारियों को महसूसना सिखाता है, निरन्तरता बनाये रखने की प्रेरणा देता है। अपनी सौंवी पोस्ट पर मैं सभी ब्लॉग साथियों का शुक्रगुजार हूँ कि आपकी सुलभ प्रेरणा, प्रतिक्रियायें मेरा मार्गदर्शन करती रहीं अन्यथा मैं तो अपनी आदत के मुताबिक कुछ भी स्थायी नही रख पाता हूँ मात्र एक उलझा-उलझा जिन्दगी की मुश्किलों की सुलझाने की कोशिश में खुद को ही भूल बैठता हूँ कभी।
आज मैं अपनी एक पुरानी कविता "मैं, तुम, बेटा और दीवारें" प्रस्तुत कर रहा हूँ इस कविता ने मेरे बहुत से साथियों को श्रोताओं को गोष्ठियों में करीब से छुआ है।
सादर,
आपका स्नेहाकांक्षी
मुकेश कुमार तिवारी
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मैं, तुम, बेटा और दीवारें
अक्सर,
रातों को
मैं, तुम, बेटा और दीवारें
बस इतना ही बड़ा संसार होता है
बेटे की अपनी दुनिया है / उसके अपने सपने
दीवारें कभी बोलती नही
और हमारे बीच अबोला
बस इतना ही बड़ा संसार होता है
तुम्हारे पास है
अपने ना होने का अहसास /
बेरंग हुये सपने /
और दिनभर की खीज
मेरे पास है
दिनभर की थकान /
पसीने की बू
और वक्त से पीछे चल रहे माँ-बाप
ना,
तुमने मुझे समझने की कोशिश की
ना मैं समझ पाया तुम्हें कभी
तुम्हारे पास हैं थके-थके से प्रश्न
मेरे पास हारे हुये जवाब
अब हर शाम गुजर जाती है
तुम्हारे चेहरे पर टंगी चुप्पी पढ़ने में
रात फिर बँट जाती है
मेरे, तुम्हारे, बेटे और दीवारों के बीच
----------------------------------
मुकेश कुमार तिवारी
शर्ट पर ठहरी हुई सिलवट
मंगलवार, 17 नवंबर 2009
उस,
भीड़ भरी गली जिसमें
मैं यूँ ही ठेला जा रहा था
जैसे हम अक्सर गुजार देते हैं जिन्दगी
ना कुछ अपनी /
ना अपना कोई कन्ट्रोल
बस बहाव के साथ चलते
रहने की मजबूरी
तुम,
उस दिन मुझे फिर दिखायी दिये थे
उसी भीड़ भरे रैले में
फिसलते हुये उंगलियों से छूटती गई
तुम्हारी कलाई
तुम ठहर गये मेरे शर्ट पर
किसी सलवट की तरह
और तुम्हारे पलटे हुये कॉलर ने
पूछा था मेरा हाल
कानों में फुसफुसाते हुये
मैंने,
महसूस किया था उस दिन भी
तुम्हारी साँसों में
बची रह गई गर्मी को /
तुम्हारे पसीने की गंध में
महकती अधपकी रोटियों को /
उस भीड़ के सीने पर
तुम्हारे जमे हुये कदमों को
और,
अपने उखड़ते हुये कदमों पर
तरस भी आया था
शायद,
तुम अब भी
उसी चूल्हे से चिपके हुये हो
बिल्कुल नही बदले
हालांकि,
मैंने अपनी पाठशाला में पढ़ा था
कि सदाचार के चूल्हे पर
नैतिकता की आँच से रोटियाँ नही सिंकती
और तुम तो जानते ही हो कि
कि अधपकी रोटियाँ कच्च-कच्च करती हैं दाँतों में
मुझे,
अधपकी रोटियों से आती है
आटे की गंध
मैं,
कच्ची रोटियाँ नही खा सकता
--------------------------------
मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : १५-नवम्बर-२००९ / समय : ११:०० रात्रि / घर
भीड़ भरी गली जिसमें
मैं यूँ ही ठेला जा रहा था
जैसे हम अक्सर गुजार देते हैं जिन्दगी
ना कुछ अपनी /
ना अपना कोई कन्ट्रोल
बस बहाव के साथ चलते
रहने की मजबूरी
तुम,
उस दिन मुझे फिर दिखायी दिये थे
उसी भीड़ भरे रैले में
फिसलते हुये उंगलियों से छूटती गई
तुम्हारी कलाई
तुम ठहर गये मेरे शर्ट पर
किसी सलवट की तरह
और तुम्हारे पलटे हुये कॉलर ने
पूछा था मेरा हाल
कानों में फुसफुसाते हुये
मैंने,
महसूस किया था उस दिन भी
तुम्हारी साँसों में
बची रह गई गर्मी को /
तुम्हारे पसीने की गंध में
महकती अधपकी रोटियों को /
उस भीड़ के सीने पर
तुम्हारे जमे हुये कदमों को
और,
अपने उखड़ते हुये कदमों पर
तरस भी आया था
शायद,
तुम अब भी
उसी चूल्हे से चिपके हुये हो
बिल्कुल नही बदले
हालांकि,
मैंने अपनी पाठशाला में पढ़ा था
कि सदाचार के चूल्हे पर
नैतिकता की आँच से रोटियाँ नही सिंकती
और तुम तो जानते ही हो कि
कि अधपकी रोटियाँ कच्च-कच्च करती हैं दाँतों में
मुझे,
अधपकी रोटियों से आती है
आटे की गंध
मैं,
कच्ची रोटियाँ नही खा सकता
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : १५-नवम्बर-२००९ / समय : ११:०० रात्रि / घर
कविता : पहला सौदा
शुक्रवार, 6 नवंबर 2009
मेरी पहली बैंगलोर यात्रा का एक वाकिया जिसने जिन्दगी के प्रति मेरे नज़रिये को काफी प्रभावित किया था, आज बस यूँ ही बाँटना चाहता हूँ आप सबसे, होन सकता है कि ऐसे ही किसी दौर से आप भी गुजरे हों?
मुकेश कुमार तिवारी
----------------------------------------
रेल्वे स्टेशन,
से मेजेस्टिक सर्कल पर आती हूई सड़क पर
बस स्टैण्ड से गुजरते हुये
नासपातियों के ठेलों के बीच से गुजर
सड़क पर बिखरे कोलाहल में
कोई मेरे कान पर रेंगता है धीरे से
लेडिस!
यही,
कोई पन्द्रह सोलह की उमर का लड़का
मूछों का वजन भी नही महसूस किया हो जिसने
पहली नज़र में तो यह लगे
शायद, लिफ्ट माँग रहा है
या टिकिट के पैसे
वह फिर दोहराता है
मरी सी आवाज में
लेडिस!
सड़्क भाग रही है
और वह मेरे साथ सटा हुआ है
वह,
सकपकाता है इस बार
और बोलने लगता है धाराप्रवाह किसी दक्षिणी भाषा में
फिर अटक जाता है रूआंसा अंग्रेजी में
लेडिस! पर
शायद, यह उसका पहला सौदा था
मैं पहला ग्राहक
और इन सबसे गुजरना मेरा पहला अनुभव
रहा सवाल लेडिस का तो?
उसे तो कोई भी बेच सकता है
किसी भी उम्र में / कहीं भी सरे बाज़ार
बस भूख लगनी चाहिये
जरूरी बेशर्मी खुद-ब-खुद आ जाती है
---------------------------------------
मुकेश कुमार तिवारी
दिनांक : २१-जून-२००९ / समय : ११;१५ रात्रि / घर
मुकेश कुमार तिवारी
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रेल्वे स्टेशन,
से मेजेस्टिक सर्कल पर आती हूई सड़क पर
बस स्टैण्ड से गुजरते हुये
नासपातियों के ठेलों के बीच से गुजर
सड़क पर बिखरे कोलाहल में
कोई मेरे कान पर रेंगता है धीरे से
लेडिस!
यही,
कोई पन्द्रह सोलह की उमर का लड़का
मूछों का वजन भी नही महसूस किया हो जिसने
पहली नज़र में तो यह लगे
शायद, लिफ्ट माँग रहा है
या टिकिट के पैसे
वह फिर दोहराता है
मरी सी आवाज में
लेडिस!
सड़्क भाग रही है
और वह मेरे साथ सटा हुआ है
वह,
सकपकाता है इस बार
और बोलने लगता है धाराप्रवाह किसी दक्षिणी भाषा में
फिर अटक जाता है रूआंसा अंग्रेजी में
लेडिस! पर
शायद, यह उसका पहला सौदा था
मैं पहला ग्राहक
और इन सबसे गुजरना मेरा पहला अनुभव
रहा सवाल लेडिस का तो?
उसे तो कोई भी बेच सकता है
किसी भी उम्र में / कहीं भी सरे बाज़ार
बस भूख लगनी चाहिये
जरूरी बेशर्मी खुद-ब-खुद आ जाती है
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनांक : २१-जून-२००९ / समय : ११;१५ रात्रि / घर
छांव के पैबंद
गुरुवार, 29 अक्टूबर 2009
खजूर,
सीधे, तने हुये धरती के सीने पर
या मुड़े हुये बेतरतीब अलसाये से
जब भी मैनें देखा उन्हें
उनींदे अधूरे ख्वाबों सा लगे
आसमानी बुलंदी को छूने के पहले /
ठिठके हुये हौंसले से
जलती दुपहरी में छांव के पैबंद से लगे
जब से,
ख्वाब जागने लगे हैं रातों में
बैचेनियाँ सवार हो आई हैं नींद पर
आदमी उलझकर कंघी में टूट रहा है जड़ों से
और फेंका जा रहा है
शहरों में कूड़े के साथ
खजूर,
अब नही दिखाई देता है
खेतों की मेड़ पर / ताल के किनारें
गाँव के मुहाने पर / खपरैले घरों में
बदले हुये चटाईयों में
डुलिया में / छबड़ियों में / सूपे में
या झाडूओं में
सभी जगह उग रही हैं
गाजर घांस
ना आदमी में कुछ बचा
ना खजूर में
दोनों ही नज़र नही आते
--------------------------
मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : २८-ऑक्टोबर-२००९ / समय : ११:०९ रात्रि / घर
सीधे, तने हुये धरती के सीने पर
या मुड़े हुये बेतरतीब अलसाये से
जब भी मैनें देखा उन्हें
उनींदे अधूरे ख्वाबों सा लगे
आसमानी बुलंदी को छूने के पहले /
ठिठके हुये हौंसले से
जलती दुपहरी में छांव के पैबंद से लगे
जब से,
ख्वाब जागने लगे हैं रातों में
बैचेनियाँ सवार हो आई हैं नींद पर
आदमी उलझकर कंघी में टूट रहा है जड़ों से
और फेंका जा रहा है
शहरों में कूड़े के साथ
खजूर,
अब नही दिखाई देता है
खेतों की मेड़ पर / ताल के किनारें
गाँव के मुहाने पर / खपरैले घरों में
बदले हुये चटाईयों में
डुलिया में / छबड़ियों में / सूपे में
या झाडूओं में
सभी जगह उग रही हैं
गाजर घांस
ना आदमी में कुछ बचा
ना खजूर में
दोनों ही नज़र नही आते
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : २८-ऑक्टोबर-२००९ / समय : ११:०९ रात्रि / घर
माया, नज़रिया और ज्ञान
बुधवार, 21 अक्टूबर 2009
हम,
सिर्फ पैकिंग बदलने को
बदलाव / परिवर्तन का नाम दे देते हैं
और खुद भी भ्रमित हो जाते हैं
शायद,
माया इसी को कहते हैं
हम,
जितना देख पाते हैं
बस वहीं समेट लेते हैं दुनिया को
और सिखाते हैं क्षितिज की परिभाषा
शायद,
नज़रिया इसी को कहते हैं
हम,
जितना जानते हैं
उससे एक इंच भी आगे बढ़े बगैर
देने लगते हैं सीख आसमान छूने की
शायद,
ज्ञान इसी को कहते हैं
-------------------------
मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक १०-ऑक्टोबर-२००९ / समय : १०:१५ रात्रि / ऑफिस
सिर्फ पैकिंग बदलने को
बदलाव / परिवर्तन का नाम दे देते हैं
और खुद भी भ्रमित हो जाते हैं
शायद,
माया इसी को कहते हैं
हम,
जितना देख पाते हैं
बस वहीं समेट लेते हैं दुनिया को
और सिखाते हैं क्षितिज की परिभाषा
शायद,
नज़रिया इसी को कहते हैं
हम,
जितना जानते हैं
उससे एक इंच भी आगे बढ़े बगैर
देने लगते हैं सीख आसमान छूने की
शायद,
ज्ञान इसी को कहते हैं
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक १०-ऑक्टोबर-२००९ / समय : १०:१५ रात्रि / ऑफिस
मैं, पहले तो ऐसा ना था
मंगलवार, 13 अक्टूबर 2009
यह वाकिया एक न्यूरोसाईकेट्रिक फिजिशियन के क्लीनिक को विजिट करने पर जो कुछ देखा था/महसूस किया था वो सब आपके सामने है। मुझे भी ऐसा लगने लगा है कि इस आपा-धापी के युग में हमारी संवेदनायें मरती जा रही हैं और हम केवल अपने में ही सिमट रहे हैं :-
वो,
लड़की अक्सर
मुझे मिल जाती है
अपनी बारी का इंतजार करते
सिमटी सिमटी सी
कुछ सहमी सहमी सी
दवा की पर्चियों को मुट्ठी में भींचे हुये
वो,
कभी कभी देखती है मुझे
कनखियों से फिर सहम जाती है
कुरेदने लगती है
हथेलियों को नाखून से
या ज़मीन में धंसी जाती है
वो,
कराहती भी है
अपनी सिसकियों के बीच
या सलवार घुटनों तक उपर कर
सहलाती है किसी चोट को
फिर भावशून्य हो जाती है
किसी बुत की तरह
और एकटक देखती है दीवार के पार
मुझे,
लगने लगता है कि
एक विषय मिल गया है
कविता लिखने के लिये
और मेरी रूचि
अब सिमटने लगती है
उसकी हरकतों को बारीकी से देखने में
शायद,
यह कविता पसंद भी आये
पढने पर या सुने जाने पर
मैं,
अपने अंतर उदास था कहीं
कि मैं पूरे समय
देखता रहा उसे / उसकी टाँगो को
उसकी हरकतों को
और लिखता रहा जो भी देखा
एकबार भी हमदर्दी से महसूस नही किया
उसके दर्द को
मैं पहले तो ऐसा नही था
------------------------------------
मुकेश कुमार तिवारी
दिनांक : २४-मई-२००९ / समय : ११:०० रात्रि / घर
वो,
लड़की अक्सर
मुझे मिल जाती है
अपनी बारी का इंतजार करते
सिमटी सिमटी सी
कुछ सहमी सहमी सी
दवा की पर्चियों को मुट्ठी में भींचे हुये
वो,
कभी कभी देखती है मुझे
कनखियों से फिर सहम जाती है
कुरेदने लगती है
हथेलियों को नाखून से
या ज़मीन में धंसी जाती है
वो,
कराहती भी है
अपनी सिसकियों के बीच
या सलवार घुटनों तक उपर कर
सहलाती है किसी चोट को
फिर भावशून्य हो जाती है
किसी बुत की तरह
और एकटक देखती है दीवार के पार
मुझे,
लगने लगता है कि
एक विषय मिल गया है
कविता लिखने के लिये
और मेरी रूचि
अब सिमटने लगती है
उसकी हरकतों को बारीकी से देखने में
शायद,
यह कविता पसंद भी आये
पढने पर या सुने जाने पर
मैं,
अपने अंतर उदास था कहीं
कि मैं पूरे समय
देखता रहा उसे / उसकी टाँगो को
उसकी हरकतों को
और लिखता रहा जो भी देखा
एकबार भी हमदर्दी से महसूस नही किया
उसके दर्द को
मैं पहले तो ऐसा नही था
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनांक : २४-मई-२००९ / समय : ११:०० रात्रि / घर
बिस्तर में सिमटे हुये प्रश्न
बुधवार, 7 अक्टूबर 2009
क्यों?
देर रात घर लौटने के बाद भी
मन उदिग्न रहता है
और बिस्तर में भी
वो सारे प्रश्न
जिनके उत्तर मैं खोज नही पाया आजतक
दग्ध करते हैं
क्यों?
ऐसा लगता है कि
काश यह रात ना होती तो
मैं ठहरता नही
खोजता समाधानों को / आजमाता
और लिख पाता कोई कहानी नई
वो सारे प्रश्न मेरे सपनों पे काबिज हो जाते हैं
क्यों?
सुबह आँख खुलने के पहले ही
वो सारे अनुत्तरित प्रश्न
जमा हो जाते हैं
तकिये के इर्द-गिर्द
और नींद खुल जाती है
मन भागने लगता है बिस्तर छोड़ने के पहले
क्यों?
सुबह की शीतलता बदल गई है आग में /
दिन अब बोझिल से लगते हैं /
शाम सुहावनी नही लगती /
रात घर लौटने को मन नही करता /
सपने नही आते / नींद नही आती /
लेकिन, भूख लगती है अब भी
----------------------
मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : ०७-ऑक्टोबर-२००९ / सुबह : ०६:१६ / घर
देर रात घर लौटने के बाद भी
मन उदिग्न रहता है
और बिस्तर में भी
वो सारे प्रश्न
जिनके उत्तर मैं खोज नही पाया आजतक
दग्ध करते हैं
क्यों?
ऐसा लगता है कि
काश यह रात ना होती तो
मैं ठहरता नही
खोजता समाधानों को / आजमाता
और लिख पाता कोई कहानी नई
वो सारे प्रश्न मेरे सपनों पे काबिज हो जाते हैं
क्यों?
सुबह आँख खुलने के पहले ही
वो सारे अनुत्तरित प्रश्न
जमा हो जाते हैं
तकिये के इर्द-गिर्द
और नींद खुल जाती है
मन भागने लगता है बिस्तर छोड़ने के पहले
क्यों?
सुबह की शीतलता बदल गई है आग में /
दिन अब बोझिल से लगते हैं /
शाम सुहावनी नही लगती /
रात घर लौटने को मन नही करता /
सपने नही आते / नींद नही आती /
लेकिन, भूख लगती है अब भी
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : ०७-ऑक्टोबर-२००९ / सुबह : ०६:१६ / घर
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