खजूर,
सीधे, तने हुये धरती के सीने पर
या मुड़े हुये बेतरतीब अलसाये से
जब भी मैनें देखा उन्हें
उनींदे अधूरे ख्वाबों सा लगे
आसमानी बुलंदी को छूने के पहले /
ठिठके हुये हौंसले से
जलती दुपहरी में छांव के पैबंद से लगे
जब से,
ख्वाब जागने लगे हैं रातों में
बैचेनियाँ सवार हो आई हैं नींद पर
आदमी उलझकर कंघी में टूट रहा है जड़ों से
और फेंका जा रहा है
शहरों में कूड़े के साथ
खजूर,
अब नही दिखाई देता है
खेतों की मेड़ पर / ताल के किनारें
गाँव के मुहाने पर / खपरैले घरों में
बदले हुये चटाईयों में
डुलिया में / छबड़ियों में / सूपे में
या झाडूओं में
सभी जगह उग रही हैं
गाजर घांस
ना आदमी में कुछ बचा
ना खजूर में
दोनों ही नज़र नही आते
--------------------------
मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : २८-ऑक्टोबर-२००९ / समय : ११:०९ रात्रि / घर
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24 टिप्पणियाँ
जब से,
29 अक्तूबर 2009 7:55 pmख्वाब जागने लगे हैं रातों में
बैचेनियाँ सवार हो आई हैं नींद पर
आदमी उलझकर कंघी में टूट रहा है जड़ों से
और फेंका जा रहा है
शहरों में कूड़े के साथ
wah! bahut khoob.....
yeh panktiyan achchi lagin....
बाह तिवारी जी.
29 अक्तूबर 2009 8:05 pmआनन्द आ गया इस गहरी रचना को पढ़कर.
ना आदमी में कुछ बचा
29 अक्तूबर 2009 8:14 pmना खजूर में
दोनों ही नज़र नही आते
आदमियों के भीड मे कुछ तो बचे है जिन्हें यह एहसास है कि आदमियो से बहुत कुछ चुकता जा रहा है.
मुकेश जी रचना बहुत गहराई से बेध रही है.
मुकेश जी
29 अक्तूबर 2009 9:26 pmबहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना .... बधाई.
sach ki tasweer, jiti-jagti bangi , mann ko jhakjhor gai
29 अक्तूबर 2009 10:24 pm"जैसे पेड़ खजूर का , छाया नही पथिक को फल लागे अति दूर .." ये कहावत तो बरसों सूनी ...लेकिन इस पेड़ से एक छाया नही अन्य कितने उपयोग हैं , ये किसी ने नही सोचा ...वही बात की इंसान से तुलना हुई तो बात कितनी गहराई पे पहुँचा दी आपने ..
29 अक्तूबर 2009 10:29 pm"आदमी का कंघी में उलझ कर बाल की तरह टूटना .." ये कैसी प्रखर तुलना है ..अपनी जड़ों से बिछड़ी हुई पीढी दर पीढी नज़र आ रही है ..
जब से,
29 अक्तूबर 2009 10:47 pmख्वाब जागने लगे हैं रातों में
बैचेनियाँ सवार हो आई हैं नींद पर
आदमी उलझकर कंघी में टूट रहा है जड़ों से
और फेंका जा रहा है
शहरों में कूड़े के साथ
बहुत सुंदर रचना ..धन्यवाद मुकेश जी
नवीन प्रतीकों के साथ नवीनता को दर्शाती अच्छी रचना के लिए बधाई।
30 अक्तूबर 2009 8:56 amबेहद खूबसूरत रचना.
30 अक्तूबर 2009 10:53 amरामराम.
bahut hi sashakt lekhan.
30 अक्तूबर 2009 12:21 pmबहुत कुछ गुम होता जा रहा है ... और आपकी लिखी यह पंक्तियाँ उस सच को उजागर करती है
30 अक्तूबर 2009 12:42 pmना आदमी में कुछ बचा
ना खजूर में
दोनों ही नज़र नही आते
बहुत सही और सुन्दर
sach hi hai ,bahut shaandar rachana
30 अक्तूबर 2009 2:31 pmसभी जगह उग रही हैं
गाजर घांस
ना आदमी में कुछ बचा
ना खजूर में
दोनों ही नज़र नही आते
ख्वाब जागने लगे हैं रातों में
30 अक्तूबर 2009 4:29 pmबैचेनियाँ सवार हो आई हैं नींद पर
आदमी उलझकर कंघी में टूट रहा है जड़ों से
और फेंका जा रहा है
शहरों में कूड़े के साथ
बहुत ही सही लिखा है आज इंसानियत कचरा मे ही जा रही है,बेहद खुबसूरती से वास्तविकता को निचोड के रख दिया है !बहुत ही सुन्दर!लाज़वाब!
बहुत सुन्दर!
30 अक्तूबर 2009 8:04 pm------
आज वह उदास हो गया
आदमी था, गाजर घास हो गया! :(
खजूर की छांव को ""छांव के पैबन्द "बहुत अच्छा प्रयोग लगा ।खेतों की मेड पर और तालाव के किनारे खजूर अब दिखाई नही देते चटाई डलिया सूप छवडियां झाडू खजूर की ही बना करती थी ,एक और पंखा जिसे विजना भी कहा जाता था वह भी और खपरैल घरों पर म्याल भी खजूर की लगती थी । रातों मे ख्वाब के कारण नींद मे व्यबधान होना बिल्कुल स्वाभाविक बात कही है ।मेहनत और सोच का सीधा सम्बन्ध है नींद से ।श्रमित भूप निद्रा अति आई , सो किम सोव सोच अधिकाई "प्रताप भानु के प्रसंग मे यही बताया है ।खैर।
30 अक्तूबर 2009 9:36 pm२२ तारीख को पिडावा आ गया था किन्तु इन्टर्नेट आज चालू हुआ है नाम और पासवर्ड गलत बता रहा था ,बार बार झालाबाड फ़ोन करना पडा तब जाकर आज ठीक हुआ है ।
मुकेशजी,
31 अक्तूबर 2009 1:28 amखजूर के पेड़ से कविता के लिए ऐसे मर्मस्पर्शीय उपादान ढूंढ लेना आपके लिए ही सहज हो सकता है ! उल्लेख्य भावाभिव्यक्ति ! निष्कलुष विवेचन ! यथार्थ के सन्निकट, मर्म को बेधती हुई :
'आदमी उलझकर कंघी में टूट रहा है जड़ों से
और फेंका जा है
शहर में कूड़े के साथ...'
'न आदमी में कुछ बचा है
न खजूर में !'
आपकी दिक्कते-नज़र (गलत न समझें, 'अतल तक देखनेवाली नज़र') से रश्क होने लगा है !
उस दिन आपसे बातें करके मुझे भी परमानंद हुआ !
सप्रीत--आ.
न आदमी में कुछ बचा
31 अक्तूबर 2009 3:20 pmन खजूर में
दोनों ही नज़र नहीं आते...........
बहुत खरी बात.........
बधाई.
चन्द्र मोहन गुप्त
जयपुर
www.cmgupta.blogspot.com
khajoor ke maadhyam se jeevan ki bahoot si baarikiyon ko ,,,,, bahoot si gahraaiyon ko utaara hai .... bahoot hi umda likha hai ...
31 अक्तूबर 2009 11:09 pmMukesh ji,
1 नवम्बर 2009 8:21 amkavita bahut achchhi lagi. badhai!
भाई,
4 नवम्बर 2009 11:57 amआदमी या खजूर दोनों हि नज़र नही आते हैं।
बहुत ही खूबसूरत चित्रण है व्यथा का।
जीतेन्द्र चौहान
वाह वाह ! सामयिक भावपूर्ण रचना !
6 नवम्बर 2009 11:11 amआप सभी का हार्दिक आभार!
6 नवम्बर 2009 3:21 pmआपकी प्रतिक्रियायें मेरा मार्गदर्शन करती हैं और मुझे सुधारने में मदद भी।
सादर,
मुकेश कुमार तिवारी
बहुत खूब
10 नवम्बर 2009 5:24 pmखजूर के बहाने समाज की बदलती हुई प्रवृतियों को लाल घेरे मे खड़ा कर दिया आपने..छाँव के यह पैबंद भी अब गायब होते जा रहे हैं..आर्टिफ़िशियल लाइट्स की चौंधियाती रोशनी मे..
11 नवम्बर 2009 11:48 pm...काफ़ी कुछ सीखने को मिलता है आपकी कलम से..
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