कविता : पहला सौदा

शुक्रवार, 6 नवम्बर 2009

मेरी पहली बैंगलोर यात्रा का एक वाकिया जिसने जिन्दगी के प्रति मेरे नज़रिये को काफी प्रभावित किया था, आज बस यूँ ही बाँटना चाहता हूँ आप सबसे, होन सकता है कि ऐसे ही किसी दौर से आप भी गुजरे हों?




मुकेश कुमार तिवारी
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रेल्वे स्टेशन,
से मेजेस्टिक सर्कल पर आती हूई सड़क पर
बस स्टैण्ड से गुजरते हुये
नासपातियों के ठेलों के बीच से गुजर
सड़क पर बिखरे कोलाहल में
कोई मेरे कान पर रेंगता है धीरे से
लेडिस!



यही,
कोई पन्द्रह सोलह की उमर का लड़का
मूछों का वजन भी नही महसूस किया हो जिसने
पहली नज़र में तो यह लगे
शायद, लिफ्ट माँग रहा है
या टिकिट के पैसे
वह फिर दोहराता है
मरी सी आवाज में
लेडिस!
सड़्क भाग रही है
और वह मेरे साथ सटा हुआ है



वह,
सकपकाता है इस बार
और बोलने लगता है धाराप्रवाह किसी दक्षिणी भाषा में
फिर अटक जाता है रूआंसा अंग्रेजी में
लेडिस! पर
शायद, यह उसका पहला सौदा था
मैं पहला ग्राहक
और इन सबसे गुजरना मेरा पहला अनुभव
रहा सवाल लेडिस का तो?
उसे तो कोई भी बेच सकता है
किसी भी उम्र में / कहीं भी सरे बाज़ार
बस भूख लगनी चाहिये
जरूरी बेशर्मी खुद-ब-खुद आ जाती है
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनांक : २१-जून-२००९ / समय : ११;१५ रात्रि / घर

21 टिप्पणियाँ

M VERMA ने कहा…

शायद, यह उसका पहला सौदा था
मैं पहला ग्राहक"
तीर सी बिध गयी आपकी यह रचना. बहुत अन्दर सा बिना आवाज किए प्रवेश कर जाती है
न जाने कौन बिकता है
न जाने कौन खरीदार है
यह तो महज़ आईना था
जो दिल के आर-पार है

6 नवम्बर 2009 4:47 pm

कितनी आसानी से सब बिकता हैं न यहाँ ..पहला सौदा और उस को बेचने का तरीका ...सब बिकता है .बस खरीददार चाहिए ....कौन जाने इस डगर से कौन कौन गुजरा पर आपकी लिखी इस कविता ने दर्द जरुर दे दिया

6 नवम्बर 2009 5:59 pm
ओम आर्य ने कहा…

एक शानदार और जानदार अभिव्यक्ति!

6 नवम्बर 2009 9:53 pm
Vinay Prajapati 'Nazar' ने कहा…

बहुत सजीव चित्रण है
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चाँद, बादल और शाम

6 नवम्बर 2009 11:32 pm

भाई,
कविता ने अवसन्न-मन कर दिया है...

''सच मेरे मित्र !
सारे अहसास गूंगे हो जाते हैं,
जब मैं टूटती उँगलियों से
कलम को जबान देना चाहता हूँ ...''

अपनी ही पुरानी कुछ पंक्तियाँ टिपण्णी में प्रेषित करता हूँ. अतिरिक्त ये कि ये खरीद-फरोख्त और ये भूख, तार-तार कर रही है ! उफ़, ये भोगवाद जाने कहाँ ले जाएगा हमें ? यही चिंता उपजाती है आपकी ये कविता !
सप्रीत--आ.

7 नवम्बर 2009 2:26 am

सब कुछ bikta है ......... कितनी aasaani से ..... बहुत कुछ kahti है आपकी गहरी रचना ..... आपकी yaatra एक dastavez है hamaari bikharti हुयी samvednaaon का .....

7 नवम्बर 2009 1:01 pm
पुनीत ओमर ने कहा…

सच कहूँ तो पूरी तरह से समझ नहीं पाया कविता का मतलब..
शुरूआती पंक्ति ने ही मुझे जाने कहाँ भेज दिया यादों में..

7 नवम्बर 2009 3:16 pm

बंधुवर,
'मेरा ठिकाना हो नहीं सकता...' शीर्षकवाली एक कविता मेरे ब्लॉग पर आपकी कृपा-दृष्टि की प्रतीक्षा कर रही है. क्या उसे पढ़ लेने का कष्ट करेंगे आप ? सच तो यह है कि कविता आपकी और किशोर भाई कि उत्प्रेरणा से ही उपजी है ! इसीलिए चाहता हूँ कि आप इसे अवश्य पढें...
सप्रीत--आ.

9 नवम्बर 2009 10:22 am
Nirmla Kapila ने कहा…

सही है आज सब कुछ बिकता है अगर नहीं बिकती तो मर्यादा हमारे संस्कार और जरा सी शर्म ऐसी खबरों से सिर शर्म से झुक जाता है आभार इस रचना के लिये

10 नवम्बर 2009 6:58 pm

jeevan ke kitne rang hai is duniya me....kya kahoo....bas soch rahaa hoo ki aisaa kyo hota hai.....

11 नवम्बर 2009 11:24 pm
BrijmohanShrivastava ने कहा…

गम्भीर रचना न जाने क्या क्या संदेश देती ,साथ मे आपकी लेखन शैली "मूछों का वजन भी नही महसूस किया जिसने "पुरानी किसी किताब मे पढा था उसकी मसें अभी भीगी भी न थी ।यह उसका पहला सौदा था में आपने शायद शब्द लगा कर कविता का वजन बढा दिया है ताकि संदेह न रहे कि "आपको क्या मालूम कि कौन सा सौदा था हो सकता है उसकी यही स्टाइल हो ।उसे तो कोई भी बेच सकता है इस लाइन मे दर्द ,व्यंग्य, सच्चाई , इतिहास से लेकर आज के महौल तक सब कुछ उंडेल दिया है ।बुभुंक्षु किं न करोति पापम "गोस्वामी जी ने भी कहा है नहि दरिद्र सम पातक पुंजा । नजीर अकबराबादी साहिब की दो गजल एक "मुफ़लिसी" दूसरी "रोटियां" इन्ही बातों का वयान करती है ""इज्जत सब उसके दिल की गंवाती है मुफ़लिसी " और घूंघट न जानो दोस्तो तुम जीनहार उसे, इस परदे मे ये अपने कमाती हैं रोटियां। दिल को छू लेने वाली रचना ।भाई तिवारी जी ,बहुत कम पढने आ पाता हूं -लेकिन आप को जब भी पढता हूं -लगता है कि हां आज कुछ पढा।

13 नवम्बर 2009 6:59 pm
Devendra ने कहा…

बस भूख लगनी चाहिए
जरूरी बेशर्मी तो खुद ब खुद आ ही जाती है।
-वाह तिवारी जी, आपके कठोर सच ने बहुत प्रभावित किया।

14 नवम्बर 2009 5:36 am
Babli ने कहा…

बहुत सुंदर भाव और अभिव्यक्ति के साथ आपने शानदार कविता लिखा है! बधाई!

14 नवम्बर 2009 7:19 pm

बहुत सुंदर भाव अभिव्यक्ति...

15 नवम्बर 2009 2:43 pm

... बेहद रोचक व प्रभावशाली रचना !!!!

15 नवम्बर 2009 10:19 pm
sandhyagupta ने कहा…

बस भूख लगनी चाहिये
जरूरी बेशर्मी खुद-ब-खुद आ जाती है

Kaphi kuch sochne ko majboor kiya aapne.

16 नवम्बर 2009 9:23 pm

कविता के माध्यम से एक सोचनीय दृश्य प्रस्तुत किया आपने...बेहतरीन अभिव्यक्ति...रचना समाज के निकट से गुजरती हुई..बहुत बहुत धन्यवाद मुकेश जी

16 नवम्बर 2009 10:52 pm
गुंजन ने कहा…

भाई,

ठीक कहा है बाजार और भूख ने हर किसी को बिकाऊ बन दिया है।

जीतेन्द्र चौहान

गुंजन का दूसरा अंक आ गया है, तुम्हारी प्रति भेज दी है। कविता "यह लड़कियाँ...." बहुत पसंद आयी।

17 नवम्बर 2009 9:31 am

आप सभी का आभार और धन्यवाद!!!!


सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

17 नवम्बर 2009 1:32 pm
शोभना चौरे ने कहा…

शायद दूसरे शहर में इससे भी छोटा जिसके दूध के दांत भी न टूटे हो और वो भी यही कहता हुआ मिल जाय |
कोई पन्द्रह सोलह की उमर का लड़का
मूछों का वजन भी नही महसूस किया हो जिसने
पहली नज़र में तो यह लगे
शायद, लिफ्ट माँग रहा है
या टिकिट के पैसे
वह फिर दोहराता है
मरी सी आवाज में
लेडिस!


रोंगटे खड़े कर गई यह कविता
हम कहाँ जा रहे है?
दिशाहीन रास्तो पर जाता हुआ बचपन ,योवन
दर्द दे गई रचना

20 नवम्बर 2009 7:44 pm
rajesh ने कहा…

aisa bhi ho sakta hain kya...itni bhikar gai hain "Sanskriti Humari"...

8 जनवरी 2010 4:43 pm