मेरी पहली बैंगलोर यात्रा का एक वाकिया जिसने जिन्दगी के प्रति मेरे नज़रिये को काफी प्रभावित किया था, आज बस यूँ ही बाँटना चाहता हूँ आप सबसे, होन सकता है कि ऐसे ही किसी दौर से आप भी गुजरे हों?
मुकेश कुमार तिवारी
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रेल्वे स्टेशन,
से मेजेस्टिक सर्कल पर आती हूई सड़क पर
बस स्टैण्ड से गुजरते हुये
नासपातियों के ठेलों के बीच से गुजर
सड़क पर बिखरे कोलाहल में
कोई मेरे कान पर रेंगता है धीरे से
लेडिस!
यही,
कोई पन्द्रह सोलह की उमर का लड़का
मूछों का वजन भी नही महसूस किया हो जिसने
पहली नज़र में तो यह लगे
शायद, लिफ्ट माँग रहा है
या टिकिट के पैसे
वह फिर दोहराता है
मरी सी आवाज में
लेडिस!
सड़्क भाग रही है
और वह मेरे साथ सटा हुआ है
वह,
सकपकाता है इस बार
और बोलने लगता है धाराप्रवाह किसी दक्षिणी भाषा में
फिर अटक जाता है रूआंसा अंग्रेजी में
लेडिस! पर
शायद, यह उसका पहला सौदा था
मैं पहला ग्राहक
और इन सबसे गुजरना मेरा पहला अनुभव
रहा सवाल लेडिस का तो?
उसे तो कोई भी बेच सकता है
किसी भी उम्र में / कहीं भी सरे बाज़ार
बस भूख लगनी चाहिये
जरूरी बेशर्मी खुद-ब-खुद आ जाती है
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनांक : २१-जून-२००९ / समय : ११;१५ रात्रि / घर
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21 टिप्पणियाँ
शायद, यह उसका पहला सौदा था
6 नवम्बर 2009 4:47 pmमैं पहला ग्राहक"
तीर सी बिध गयी आपकी यह रचना. बहुत अन्दर सा बिना आवाज किए प्रवेश कर जाती है
न जाने कौन बिकता है
न जाने कौन खरीदार है
यह तो महज़ आईना था
जो दिल के आर-पार है
कितनी आसानी से सब बिकता हैं न यहाँ ..पहला सौदा और उस को बेचने का तरीका ...सब बिकता है .बस खरीददार चाहिए ....कौन जाने इस डगर से कौन कौन गुजरा पर आपकी लिखी इस कविता ने दर्द जरुर दे दिया
6 नवम्बर 2009 5:59 pmएक शानदार और जानदार अभिव्यक्ति!
6 नवम्बर 2009 9:53 pmबहुत सजीव चित्रण है
6 नवम्बर 2009 11:32 pm---
चाँद, बादल और शाम
भाई,
7 नवम्बर 2009 2:26 amकविता ने अवसन्न-मन कर दिया है...
''सच मेरे मित्र !
सारे अहसास गूंगे हो जाते हैं,
जब मैं टूटती उँगलियों से
कलम को जबान देना चाहता हूँ ...''
अपनी ही पुरानी कुछ पंक्तियाँ टिपण्णी में प्रेषित करता हूँ. अतिरिक्त ये कि ये खरीद-फरोख्त और ये भूख, तार-तार कर रही है ! उफ़, ये भोगवाद जाने कहाँ ले जाएगा हमें ? यही चिंता उपजाती है आपकी ये कविता !
सप्रीत--आ.
सब कुछ bikta है ......... कितनी aasaani से ..... बहुत कुछ kahti है आपकी गहरी रचना ..... आपकी yaatra एक dastavez है hamaari bikharti हुयी samvednaaon का .....
7 नवम्बर 2009 1:01 pmसच कहूँ तो पूरी तरह से समझ नहीं पाया कविता का मतलब..
7 नवम्बर 2009 3:16 pmशुरूआती पंक्ति ने ही मुझे जाने कहाँ भेज दिया यादों में..
बंधुवर,
9 नवम्बर 2009 10:22 am'मेरा ठिकाना हो नहीं सकता...' शीर्षकवाली एक कविता मेरे ब्लॉग पर आपकी कृपा-दृष्टि की प्रतीक्षा कर रही है. क्या उसे पढ़ लेने का कष्ट करेंगे आप ? सच तो यह है कि कविता आपकी और किशोर भाई कि उत्प्रेरणा से ही उपजी है ! इसीलिए चाहता हूँ कि आप इसे अवश्य पढें...
सप्रीत--आ.
सही है आज सब कुछ बिकता है अगर नहीं बिकती तो मर्यादा हमारे संस्कार और जरा सी शर्म ऐसी खबरों से सिर शर्म से झुक जाता है आभार इस रचना के लिये
10 नवम्बर 2009 6:58 pmjeevan ke kitne rang hai is duniya me....kya kahoo....bas soch rahaa hoo ki aisaa kyo hota hai.....
11 नवम्बर 2009 11:24 pmगम्भीर रचना न जाने क्या क्या संदेश देती ,साथ मे आपकी लेखन शैली "मूछों का वजन भी नही महसूस किया जिसने "पुरानी किसी किताब मे पढा था उसकी मसें अभी भीगी भी न थी ।यह उसका पहला सौदा था में आपने शायद शब्द लगा कर कविता का वजन बढा दिया है ताकि संदेह न रहे कि "आपको क्या मालूम कि कौन सा सौदा था हो सकता है उसकी यही स्टाइल हो ।उसे तो कोई भी बेच सकता है इस लाइन मे दर्द ,व्यंग्य, सच्चाई , इतिहास से लेकर आज के महौल तक सब कुछ उंडेल दिया है ।बुभुंक्षु किं न करोति पापम "गोस्वामी जी ने भी कहा है नहि दरिद्र सम पातक पुंजा । नजीर अकबराबादी साहिब की दो गजल एक "मुफ़लिसी" दूसरी "रोटियां" इन्ही बातों का वयान करती है ""इज्जत सब उसके दिल की गंवाती है मुफ़लिसी " और घूंघट न जानो दोस्तो तुम जीनहार उसे, इस परदे मे ये अपने कमाती हैं रोटियां। दिल को छू लेने वाली रचना ।भाई तिवारी जी ,बहुत कम पढने आ पाता हूं -लेकिन आप को जब भी पढता हूं -लगता है कि हां आज कुछ पढा।
13 नवम्बर 2009 6:59 pmबस भूख लगनी चाहिए
14 नवम्बर 2009 5:36 amजरूरी बेशर्मी तो खुद ब खुद आ ही जाती है।
-वाह तिवारी जी, आपके कठोर सच ने बहुत प्रभावित किया।
बहुत सुंदर भाव और अभिव्यक्ति के साथ आपने शानदार कविता लिखा है! बधाई!
14 नवम्बर 2009 7:19 pmबहुत सुंदर भाव अभिव्यक्ति...
15 नवम्बर 2009 2:43 pm... बेहद रोचक व प्रभावशाली रचना !!!!
15 नवम्बर 2009 10:19 pmबस भूख लगनी चाहिये
16 नवम्बर 2009 9:23 pmजरूरी बेशर्मी खुद-ब-खुद आ जाती है
Kaphi kuch sochne ko majboor kiya aapne.
कविता के माध्यम से एक सोचनीय दृश्य प्रस्तुत किया आपने...बेहतरीन अभिव्यक्ति...रचना समाज के निकट से गुजरती हुई..बहुत बहुत धन्यवाद मुकेश जी
16 नवम्बर 2009 10:52 pmभाई,
17 नवम्बर 2009 9:31 amठीक कहा है बाजार और भूख ने हर किसी को बिकाऊ बन दिया है।
जीतेन्द्र चौहान
गुंजन का दूसरा अंक आ गया है, तुम्हारी प्रति भेज दी है। कविता "यह लड़कियाँ...." बहुत पसंद आयी।
आप सभी का आभार और धन्यवाद!!!!
17 नवम्बर 2009 1:32 pmसादर,
मुकेश कुमार तिवारी
शायद दूसरे शहर में इससे भी छोटा जिसके दूध के दांत भी न टूटे हो और वो भी यही कहता हुआ मिल जाय |
20 नवम्बर 2009 7:44 pmकोई पन्द्रह सोलह की उमर का लड़का
मूछों का वजन भी नही महसूस किया हो जिसने
पहली नज़र में तो यह लगे
शायद, लिफ्ट माँग रहा है
या टिकिट के पैसे
वह फिर दोहराता है
मरी सी आवाज में
लेडिस!
रोंगटे खड़े कर गई यह कविता
हम कहाँ जा रहे है?
दिशाहीन रास्तो पर जाता हुआ बचपन ,योवन
दर्द दे गई रचना
aisa bhi ho sakta hain kya...itni bhikar gai hain "Sanskriti Humari"...
8 जनवरी 2010 4:43 pmएक टिप्पणी भेजें