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मैं, पहले तो ऐसा ना था

मंगलवार, 13 अक्तूबर 2009

यह वाकिया एक न्यूरोसाईकेट्रिक फिजिशियन के क्लीनिक को विजिट करने पर जो कुछ देखा था/महसूस किया था वो सब आपके सामने है। मुझे भी ऐसा लगने लगा है कि इस आपा-धापी के युग में हमारी संवेदनायें मरती जा रही हैं और हम केवल अपने में ही सिमट रहे हैं :-

वो,
लड़की अक्सर
मुझे मिल जाती है
अपनी बारी का इंतजार करते
सिमटी सिमटी सी
कुछ सहमी सहमी सी
दवा की पर्चियों को मुट्ठी में भींचे हुये

वो,
कभी कभी देखती है मुझे
कनखियों से फिर सहम जाती है
कुरेदने लगती है
हथेलियों को नाखून से
या ज़मीन में धंसी जाती है

वो,
कराहती भी है
अपनी सिसकियों के बीच
या सलवार घुटनों तक उपर कर
सहलाती है किसी चोट को
फिर भावशून्य हो जाती है
किसी बुत की तरह
और एकटक देखती है दीवार के पार

मुझे,
लगने लगता है कि
एक विषय मिल गया है
कविता लिखने के लिये
और मेरी रूचि
अब सिमटने लगती है
उसकी हरकतों को बारीकी से देखने में

शायद,
यह कविता पसंद भी आये
पढने पर या सुने जाने पर
मैं,
अपने अंतर उदास था कहीं
कि मैं पूरे समय
देखता रहा उसे / उसकी टाँगो को
उसकी हरकतों को
और लिखता रहा जो भी देखा
एकबार भी हमदर्दी से महसूस नही किया
उसके दर्द को
मैं पहले तो ऐसा नही था
------------------------------------
मुकेश कुमार तिवारी
दिनांक : २४-मई-२००९ / समय : ११:०० रात्रि / घर

28 टिप्पणियाँ

अर्कजेश ने कहा…

कभी अस्पतालों में ऐसे अनुभव हुआ करते हैं ।

13 अक्तूबर 2009 को 1:03 pm

कविता लिखने की प्रेरणा तो बहुत बढ़िया जगह से मिली..सुंदर कविता ..बधाई

13 अक्तूबर 2009 को 1:35 pm
Mahfooz Ali ने कहा…

bahut hi achchi kavita....

maarmik ...

13 अक्तूबर 2009 को 1:44 pm

एक बार दुखडा पूछ लेते तो शायद इस अहसास से न गुजरना पड़ता !!सुंदर कविता !

13 अक्तूबर 2009 को 2:01 pm
raj ने कहा…

uska dukh aap apne sath le aaye...dil me gahre baitth gyee apki kavita....

13 अक्तूबर 2009 को 2:27 pm
ओम आर्य ने कहा…

BEHAD GAHARE BHAW LIYE HUYE KAWITA .....KAWITA SACHA ME AISEE HI HONI CHAHAIYE JISASE SAMWEDANA KA JANM HO SAKE ......BAHUT HI SUNDAR RACHANA
SAADAR
OM

13 अक्तूबर 2009 को 3:38 pm
शरद कोकास ने कहा…

आपकी सम्वेदना ने यह महसूसना शुरू किया यह क्या कम है ।

13 अक्तूबर 2009 को 3:55 pm
M VERMA ने कहा…

मुकेश जी
आपका अवलोकन शायद सही नही है.
कविता लिखने की प्रेरणा उसके दर्द ने ही दिया होगा. संवेदनाए मरती नही है उनका स्थानांतरण हो जाता है.
क्षमा चाहूँगा पर मेरा मानना यही है.

13 अक्तूबर 2009 को 5:27 pm

किसी के दर्द को यूँ महसूस करना भी आज कल के समय में कम बात नहीं है मुकेश जी ..वह लफ्ज़ इस तरह से उतर गए बहुत अच्छा लगा इसको पढना शुक्रिया

13 अक्तूबर 2009 को 5:43 pm

जो दर्द कविता लिखने को कलम उठवा दे ....... वो संवेदन हीन कैसे हो सकता है ........... आपकी सार्थक रचना है ........ सुन्दर लिखा हैं

13 अक्तूबर 2009 को 5:51 pm

जो दर्द कविता लिखने को कलम उठवा दे ....... वो संवेदन हीन कैसे हो सकता है ........... आपकी सार्थक रचना है ........ सुन्दर लिखा हैं

13 अक्तूबर 2009 को 5:51 pm
Mumukshh Ki Rachanain ने कहा…

कविता तो पूरी कर ली न भाई.
चलो लड़की ने न सही
कविता तो आपको
आपकी संवेदनाओं का अहसास करा गई,
कोरे कागज़ पर
आपके हस्ताक्षर करा गई
क्या ये कम है.
कविता में वस्तुतः बहुत दम है.
कविता में दम है.
आपको ही नहीं
हम सब को भी
संवेदनाओं का अहसास करा रही है
इस कविता से नतमस्तक हम हैं.

हार्दिक आभार.

चन्द्र मोहन गुप्त
जयपुर
www.cmgupta.blogspot.com

13 अक्तूबर 2009 को 7:50 pm
kshama ने कहा…

Dil dard se karah utha..kaash! kuchh karna apne vash me hota!

13 अक्तूबर 2009 को 9:16 pm
Prem Farrukhabadi ने कहा…

मैं,
अपने अंतर उदास था कहीं
कि मैं पूरे समय
देखता रहा उसे / उसकी टाँगो को
उसकी हरकतों को
और लिखता रहा जो भी देखा
एकबार भी हमदर्दी से महसूस नही किया
उसके दर्द को
मैं पहले तो ऐसा नही था

सुंदर कविता ..बधाई

13 अक्तूबर 2009 को 9:45 pm
संगीता पुरी ने कहा…

आज के युग में किसी के दर्द के आपकी संवेदना ही कम नहीं .. अपनी छोटी मोटी बीमारियों के लिए अस्‍पताल जाने पर गंभीर रूप से पीडित मरीजों को देखकर अपना दर्द कम हो जाता है .. अच्‍छी अभिव्‍यक्ति !!

14 अक्तूबर 2009 को 1:04 pm

प्रियवर,
अज्ञेयजी के संस्मरण के लिए समाधि में था, फिर पत्रिकाके सम्पादन के सिलसिले में पटना जाना पड़ा; वहां तो सर उठाने की फुर्सत नहीं मिलती; आपकी टिपण्णी से अभिभूत था; लेकिन इससे पहले प्रतिउत्तर लिख न सका; क्षमा चाहता हूँ ! मैं तो नितांत अकिंचन, अपदार्थ हूँ, आपकी काव्य-प्रतिभा का कायल और प्रेमी भी हूँ--निःसंदेह, आपसे मिलकर मुझे बड़ी प्रसन्नता होगी ! आप दिल्ली आयें, तो मुझे फ़ोन भर कर दें, पता ठिकाना दें तो स्वयं हाज़िर हो जाऊँगा. विलंब से उत्तर देने के लिए सच्चा खेद है; लेकिन परिस्थितियों ने अवश कर रखा था, विश्वास करें ! मेरा सेल फ़ोन नंबर है : ०९३३४०८४६१६.
--सप्रीत, आ.

14 अक्तूबर 2009 को 11:37 pm

पुनः
दर्द जब हद से गुज़र जाता है, बेअसर हो जाता है; आपकी इस कविता में भी 'दर्द का हद से गुज़र जाना, दवा होना है--मैं इसे इसी रूप में ले पा रहा हूँ ! आपकी संवेदना ने ही 'पहले मैं ऐसा तो न था...' जैसी कविता को जन्म दिया है ! संवेदनहीन होना भी अगर मानूं, तो भी ये संवेदनहीनता अंतर को झकझोरती है ! सुन्दर अभिव्यक्ति !! बधाई !!! --आ.

15 अक्तूबर 2009 को 12:44 am
प्रकाश पाखी ने कहा…

सम्वेदनाओं को इससे बेहतर क्या कहा जा सकता है...हम स्वीकारने लगें कि हम असम्वेदनशील होते जा रहे है.पहली बार आपके ब्लॉग पर आया हूँ और प्रशंसक बन गया हूँ ..बधाई.
दीपावली कि हार्दिक बधाई और शुभ कामनाएं,!

15 अक्तूबर 2009 को 7:47 pm
ओम आर्य ने कहा…

बढ़ा दो अपनी लौ
कि पकड़ लूँ उसे मैं अपनी लौ से,

इससे पहले कि फकफका कर
बुझ जाए ये रिश्ता
आओ मिल के फ़िर से मना लें दिवाली !
दीपावली की हार्दिक शुभकामना के साथ
ओम आर्य

16 अक्तूबर 2009 को 11:38 am

साल की सबसे अंधेरी रात में
दीप इक जलता हुआ बस हाथ में
लेकर चलें करने धरा ज्योतिर्मयी

कड़वाहटों को छोड़ कर पीछे कहीं
अपना-पराया भूल कर झगडे सभी
झटकें सभी तकरार ज्यों आयी-गयी

=======================
दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ!
=======================

17 अक्तूबर 2009 को 5:53 am

एक दीप मोहब्बत का ऐसा भी जला दो कि ,
रूह रौशन हो सके, घर में उजाला भी रहे !

दीपावली की मंगल-कामनाएं !!

विनीत--
आनंद वर्धन ओझा.

17 अक्तूबर 2009 को 5:49 pm
vikram7 ने कहा…

दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें

18 अक्तूबर 2009 को 7:09 pm
डॉ .अनुराग ने कहा…

शुक्रिया अनूप जी का जो उन्होंने . मानवीय संवेदना के एक पल के पास से गुजर कर उसे दोबारा महसूस करने का मौका दिया ...ऐसे अहसास हमें अपने भीतर जिलाये रखने होगे ताकि हम इस समाज को ओर बेहतर बनाये रखने में किसी न किसी रूप में अपना योगदान देते रहे .छोटा ही सही...

19 अक्तूबर 2009 को 12:42 pm
Prem ने कहा…

divali ki goodwishes,kavita ke bhav man ko chute hain .

20 अक्तूबर 2009 को 11:03 am
गुंजन ने कहा…

भाई,

दर्द का चित्रण मर्म को छू लेता है।

जीतेन्द्र चौहान

21 अक्तूबर 2009 को 8:35 am

आप सभी का धन्यावद और आभार!!!


सादर,


मुकेश कुमार तिवारी

21 अक्तूबर 2009 को 11:54 am