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शर्ट पर ठहरी हुई सिलवट

मंगलवार, 17 नवंबर 2009

उस,

भीड़ भरी गली जिसमें
मैं यूँ ही ठेला जा रहा था
जैसे हम अक्सर गुजार देते हैं जिन्दगी
ना कुछ अपनी /
ना अपना कोई कन्ट्रोल
बस बहाव के साथ चलते
रहने की मजबूरी

तुम,
उस दिन मुझे फिर दिखायी दिये थे
उसी भीड़ भरे रैले में
फिसलते हुये उंगलियों से छूटती गई
तुम्हारी कलाई
तुम ठहर गये मेरे शर्ट पर
किसी सलवट की तरह
और तुम्हारे पलटे हुये कॉलर ने
पूछा था मेरा हाल
कानों में फुसफुसाते हुये

मैंने,
महसूस किया था उस दिन भी
तुम्हारी साँसों में
बची रह गई गर्मी को /
तुम्हारे पसीने की गंध में
महकती अधपकी रोटियों को /
उस भीड़ के सीने पर
तुम्हारे जमे हुये कदमों को
और,
अपने उखड़ते हुये कदमों पर
तरस भी आया था

शायद,
तुम अब भी
उसी चूल्हे से चिपके हुये हो
बिल्कुल नही बदले
हालांकि,
मैंने अपनी पाठशाला में पढ़ा था
कि सदाचार के चूल्हे पर
नैतिकता की आँच से रोटियाँ नही सिंकती
और तुम तो जानते ही हो कि
कि अधपकी रोटियाँ कच्च-कच्च करती हैं दाँतों में
मुझे,
अधपकी रोटियों से आती है
आटे की गंध
मैं,
कच्ची रोटियाँ नही खा सकता
--------------------------------
मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : १५-नवम्बर-२००९ / समय : ११:०० रात्रि / घर

32 टिप्पणियाँ

मैंने अपनी पाठशाला में पढ़ा था
कि सदाचार के चूल्हे पर
नैतिकता की आँच से रोटियाँ नही सिंकती

मुकेश जी कमाल की रचना है ये आपकी...शब्द और भाव का ऐसा अद्भुत संगम कम ही देखने को मिलता है...विलक्षण कविता के लिए बधाई..
नीरज

17 नवंबर 2009 को 3:28 pm

शायद,
तुम अब भी
उसी चूल्हे से चिपके हुये हो
बिल्कुल नही बदले
हालांकि,
मैंने अपनी पाठशाला में पढ़ा था
कि सदाचार के चूल्हे पर
नैतिकता की आँच से रोटियाँ नही सिंकती
और तुम तो जानते ही हो कि
कि अधपकी रोटियाँ कच्च-कच्च करती हैं दाँतों में
मुझे,
अधपकी रोटियों से आती है
आटे की गंध
मैं,
कच्ची रोटियाँ नही खा सकता
Behad Sundar panktiyaan

17 नवंबर 2009 को 3:29 pm
KAVITA RAWAT ने कहा…

Sundar vimb prastuti ke saath sachai ko bayan karti aapki rachna bahut achhi lagi.
Badhai

17 नवंबर 2009 को 3:49 pm
वन्दना ने कहा…

ek behad bhavpoorna , sadhi huyi rachna sachchyi ko ujagar karti huyi..........badhayi

17 नवंबर 2009 को 3:50 pm

मैंने अपनी पाठशाला में पढ़ा था
कि सदाचार के चूल्हे पर
नैतिकता की आँच से रोटियाँ नही सिंकती
और तुम तो जानते ही हो कि
कि अधपकी रोटियाँ कच्च-कच्च करती हैं दाँतों में ..

बहुत गहरी बात .... शब्दों का ताना बाना जज़्बातों को बाखूबी उजागर कर रहा है .........शर्ट पर ठहरी हुई सिलवट की तरह किसी को महसूस करना ...... कमाल के प्रयोग किए हैं आपने .........

17 नवंबर 2009 को 4:20 pm
M VERMA ने कहा…

कि सदाचार के चूल्हे पर
नैतिकता की आँच से रोटियाँ नही सिंकती
और तुम तो जानते ही हो कि
कि अधपकी रोटियाँ कच्च-कच्च करती हैं दाँतों में
वाह क्या प्रतीक और बिम्ब चुना है आपने

भावो का प्रबल प्रवह है

17 नवंबर 2009 को 4:35 pm

turat kuchh nahin kahunga. is kavita par baad me baat hogi. abhi itna kah dun ki hatprabh hun...
anand v.

17 नवंबर 2009 को 7:22 pm
kshama ने कहा…

Dil karta hai...koyi chhoo le...chaddar pe baithe..kapdon pe haath fer de.....sirf silvaton ke liye!
Aisa likha hai,laga, jaise saamne ghat raha ho...sundar shabd chitr!

17 नवंबर 2009 को 8:46 pm
Nirmla Kapila ने कहा…

मैंने अपनी पाठशाला में पढ़ा था
कि सदाचार के चूल्हे पर
नैतिकता की आँच से रोटियाँ नही सिंकती
बहुत सुन्दर कविता है बधाई

17 नवंबर 2009 को 9:30 pm

बडी जानदार कविता है. बधाई.

18 नवंबर 2009 को 2:33 pm
rakeshindore.blogspot.com ने कहा…

Mukesh bhai,
since long i am reading your poems. this good that your writting continusly.
cogratulation.
Rakesh

18 नवंबर 2009 को 8:05 pm
Udan Tashtari ने कहा…

बहुत जबरदस्त रचना,,,

मन में रच बस गई..बहुत खूब!

18 नवंबर 2009 को 9:44 pm

बहुत गहन बात कही आपने. शुभकामनाएं.

रामराम.

19 नवंबर 2009 को 12:46 am
sada ने कहा…

मैंने अपनी पाठशाला में पढ़ा था
कि सदाचार के चूल्हे पर
नैतिकता की आँच से रोटियाँ नही सिंकती

बहुत ही गहराई लिये हुये हर पंक्ति बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

19 नवंबर 2009 को 11:31 am
singhsdm ने कहा…

सदाचार के चूल्हे पर
नैतिकता की आँच से रोटियाँ नही सिंकती

मुकेश जी बहुत ही सुन्दर रचना ! आपके प्रोफाइल में लिखे हर एक शब्द की असली कहानी कहती कविता......

19 नवंबर 2009 को 12:16 pm

बहुत सच्ची अच्छी लगी आपकी यह रचना कई दिन तक याद रहेगी ..शुक्रिया

19 नवंबर 2009 को 1:28 pm
गुंजन ने कहा…

भाई,

दंतकटी खाने को मिले तो फिर कच्ची/सौंधी भी चलेगी।

भाई, अच्छी लगी यह कविता।

जीतेन्द्र चौहान

20 नवंबर 2009 को 2:21 pm

अधपकी रोटियाँ और परिपक्व एहसास
वाह---- बहुत ही बढ़िया

20 नवंबर 2009 को 2:59 pm
मनोज कुमार ने कहा…

आपकी रचना में भाषा का ऐसा रूप मिला है कि वह हृदयगम्य हो गई है।

20 नवंबर 2009 को 3:05 pm

मेरे सखा नरेन्द्र सिँह सिकरवार ने अपनी प्रतिक्रिया ई-मेल के माध्यम से भेजी है :-

Mukesh Bhiya

Poem’s language is effective, good narration….

Subject seems to be higher… beyond my thinking level…. Hence I couldn’t catch the objective….

Thoda detail mein samjhana…. Tab tubelight jalegi…. Pappu can’t understand @%$#….....

Regards,

Pappu
narendra.sikerwar@avtec.in

21 नवंबर 2009 को 10:34 am
Dipak 'Mashal' ने कहा…

सर, आपकी कविताओं को पढ़ के लगा की कितना नियंत्रण है आपका कलम पर... बहुत कुछ सिखा सकते हैं आप हम नए लोगों को...
जय हिंद...

22 नवंबर 2009 को 5:39 am
Mrs. Asha Joglekar ने कहा…

मैंने अपनी पाठशाला में पढ़ा था
कि सदाचार के चूल्हे पर
नैतिकता की आँच से रोटियाँ नही सिंकती
कमाल की सच्चाई लिये हुए है ये आपकी रचना । बधाई ।

22 नवंबर 2009 को 8:15 am
Apoorv ने कहा…

कुछ कह पाना बहुत मुश्किल है..
..बस ऐसा लगता है जैसे कच्ची मिट्टी की किसी मूर्ति की क्रोधित बारिश के पानी से लड़ने और घुलते जाने की जद्दोजहद है..कविता में

ब्लॉग जगत की श्रेष्ठतम कविताओं मे एक..

22 नवंबर 2009 को 11:34 am
BrijmohanShrivastava ने कहा…

एक तो नैतिकता की आंच से रोटी नही सिकतीं और अधपकी रोटियां खाने मे दिक्कत ।उसी चूल्हे से चिपकना _कुछ कुछ छायावाद की झलक देती सुन्दर रचना

22 नवंबर 2009 को 4:28 pm
ज्योति सिंह ने कहा…

मैंने अपनी पाठशाला में पढ़ा था
कि सदाचार के चूल्हे पर
नैतिकता की आँच से रोटियाँ नही सिंकती
kafi uchit aur gahri baate hai is rachna me ,ek yatharth ki jiti jagti tasveer khinch di aapne ,umda aur kya kahoon

22 नवंबर 2009 को 11:22 pm
RC ने कहा…

खूबसूरत रचना, हमेशा की तरह |

यह पंक्तियाँ बेहद पसंद आयीं ...

भीड़ भरी गली जिसमें
मैं यूँ ही ठेला जा रहा था
जैसे हम अक्सर गुजार देते हैं जिन्दगी
....
तुम ठहर गये मेरे शर्ट पर
किसी सलवट की तरह
...
अधपकी रोटियों से आती है
आटे की गंध
मैं,
कच्ची रोटियाँ नही खा सकता
----------------
एक छोटासा सवाल है | एक कविता का शीर्षक का जो काम होता है.... खैर शीर्षक तो यथार्थ है,मगर कविता ने बीच में disha क्यों बदल दी?shirt/सिलवटें/भीड की तुलना जँच रही थी ... आटे/अधपकी रोटियों की भी तुलना अच्छी है ... मगर कविता बीच में रास्ता मोड़ कट रोटियों पर चली जाती है यह ज़रा अटपटा लगा, या फिर सिलवटों से आटे की तरफ का बहाव और सुगम होना चाहिए |

God bless
RC

23 नवंबर 2009 को 11:25 am
Prem Farrukhabadi ने कहा…

Mukesh ji,
apki sampoorn rachna jindgi ko bahut hi kareeb se dekhne ki or ingit karti hai.vo bhi yathaarth.badhai!!

23 नवंबर 2009 को 7:52 pm

आप सभी का हार्दिक आभार !!!

आपकी टिप्पणियाँ मेरा मार्गदर्शन करती हैं मुझे प्रोत्साहित करती हैं।

सादर,


मुकेश कुमार तिवारी

24 नवंबर 2009 को 11:49 am
Babli ने कहा…

बहुत ही सुंदर भाव और अभिव्यक्ति के साथ आपने शानदार रचना लिखा है ! इस बेहतरीन रचना के लिए ढेर सारी बधाइयाँ !

24 नवंबर 2009 को 5:34 pm
संजय भास्कर ने कहा…

बहुत ही भावपूर्ण निशब्द कर देने वाली रचना . गहरे भाव.

16 अप्रैल 2010 को 6:34 am
संजय भास्कर ने कहा…

ग़ज़ब की कविता ... कोई बार सोचता हूँ इतना अच्छा कैसे लिखा जाता है .

16 अप्रैल 2010 को 6:35 am