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औरतें

रविवार, 8 मार्च 2020

मेरी औरतें
अब भी अपनी पहचान के लिए
कुछ नही करती
न छपी होंती हैं कहीं
न बहस कर रही होंती हैं किसी फोरम में
न ही थामें होंती हैं बुके 
और मुस्कराती एक दिन
वो
आज भी सुबह से निकली है
हाथों को हथियार बना
देह को झोंक लड़ेगी जंग
हार नही मानेगी भूख से
और शाम ढले 
लौट आएगी अपने चूजों के लिए
चुग्गा लेकर...

--------//---------
@मुकेश कुमार तिवारी
08-मार्च-2020

कविता : खेल

शनिवार, 29 फ़रवरी 2020

शहर के बीच 
मैदान 
जहाँ खेलते थे बच्चे 
और उनके धर्म घरों में 
खूँटी पर टँगे रहते थे
जबसे एक पत्थर 
लाल हुआ तो
दूसरे ने ओढ़ी हरी चादर
तबसे बच्चे 
घरों में कैद हैं
धर्म सड़कों पर है 
और खूँटियाँ सरों पर
अब बड़े खेल रहे हैं

@मुकेश कुमार तिवारी
29-फेब्रुअरी-2019

कविता : अमराई में बारूद

रविवार, 3 मार्च 2019

हाँ,
मैं भूल गया हूँ मुस्कुराना/
अपने से बातें करना/
कहकहे लगाना/
या तुम्हारे गेसुओं में फिराते उँगलियाँ
भूल जाना जीने की जिल्लत
जब से आम पर बौराई है बारुद
खलिहानों में उग आई हैं खंदकें
मैं,
दफ़्न हो गया हूँ
वहीं, जहाँ दिखा था
आखिरी बार मुस्कुराता
---//---
मुकेश कुमार तिवारी
02-March-2019
@kavitaayan

कविता : बेमानी सन्दर्भ

रविवार, 25 नवंबर 2018

मेरे लिए
फिर नही लौटा
बयारो वाला मौसम
लाख चाहने पर भी
मिट्टी से नही उठी
सौंधी गमक
न ही इन्द्रधनुष खिंचा
वितान पर
नही आई ठिठुरन अबके
मेरी दालान में
धूप कन्नी काटती रही
आँगन से
किस अजीब से
मौसम को जी रहे हैं हम
सन्दर्भ सभी
बेमानी से हो आए हैं
अब आदमी की बात करो तो
जी धक्क सा करता है
---------/---------
मुकेश कुमार तिवारी
दिनांक : 25-नवम्बर-2018/समय : 18:55/इन्दौर-गुना यात्रा में

कविता : पड़ाव

शनिवार, 1 जुलाई 2017



करीब साढे नौ सालों के बाद अचानक फ़िर अपने ब्लॉग कि याद आई है.....




उम्र ने बढते हुये
द्दर्ज कर दी थी पेशानियों पे
अपनी मौजुदगी
और सफ़ेदी बढते हुये
कह ही दिया था
कि बहुत हो चुका सब


मन था कि
मानता ही नही
कभी यहाँ कभी वहाँ
अखबारों से शुरु हुआ सिलसिला
थमा तो व्हात्सएप पर
इस बीच पत्रिकायें थै तो
कभी फ़ेसबुक


लेकिन
छाँवभरी गोद लेकर
आज फ़िर याद आया है
ब्लॉग
किसी पड़ाव की तरह
एक थका देने वाली
जीवनयात्रा में
एक सुकून भरा ठहराव लिये....
------------------------
मुकेश कुमार तिवारी
दिनांक : 01-जुलाइ-2017 / समय : 04:40 दोपहर / घर
#हिन्दी_ब्लॉगिंग






उम्मीदों की सलीब

रविवार, 28 अगस्त 2016

एक बोझिल सुबह
जिसमें समेटना है दिन का विस्तार
इसके पहले कि मायूसियाँ
शाम के साथ
लिपटने लगे पहलु के साथ
दौड़ना है दिनभर
काँधे पर टाँगें
उम्मीदों की सलीब ...
------------------
मुकेश कुमार तिवारी
दिनांक 28-अगस्त-2016/सुबह : 09:15/घर

कविता : पंख

मंगलवार, 3 सितंबर 2013


मैं
जब तक नही जानता था
अपने पंखों को
अन्जान था
आकाश की गहराइयों से
बस
धरती के छोर पर ही 
खत्म हो जाती थी
दुनिया मेरी

एक सुबह
आकाश ने रचे
रंगों के षड़यंत्र
मेरे लिए
तब कहीं जाके
मेरे पंखों ने लांघी
क्षमता की दहलीज
और समूचा
आकाश सिमट आया
मेरी उड़ान में
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : ०३-सितम्बर-२०१३ / १०:४० रात्रि / घर