एक स्त्री अपने होने की जंग से कहीं ज्यादा लड़ती है, आदमी के लिए और उसके अस्तित्व को बचाए रखने की जद्दोजहद में अपनी पहचान को खो देती है, दरअसल जो सहअस्तित्व का भाव है वो दांपत्य के बोझ में खो जाता है और यूँ लगता है कि जैसे स्त्री उस रिश्ते में मौजूद भर है बगैर किसी पहचान के लेकिन रिश्ते को बचाए रखने के लिए केवल उसे ही जूझना है......
नही!
मैं नही चाहता कि
सिन्दूर की तरह सजा रहूँ
तुम्हारे भाल पर
और तुम
लड़ती रहो मेरे अस्तित्व की जंग
पसीने में नहाती हुई
रंगीन चूड़ियों में बदल
सजना तुम्हारी कलाइयों पर
बेरंग दुनिया में
टिक जाना तुम्हारी आँखों पर
केलेडियोस्कोप की तरह
और तुम
लड़ती रहो मेरे अस्तित्व की जंग
दिनभर खटते हुए
घुंघरूओं से पैदा करूं
तुम्हारे सूने हिस्से में संगीत
कैद कर लूँ तुम्हें
उम्र भर के लिए पायल में
और तुम
घिसटती रहो मेरा अस्तित्व लिए
बेड़ियों से लड़ते हुए
मैं
चाहता हूँ कि
मैं तुम्हारे अंतर बहूँ
विश्वास की तरह
और तुम्हारे चेहरे पर दमकूं
आत्मविश्वास की तरह
शायद तब हम जी सकें
सहास्तित्व अपना
लादी हुई पहचानों से मुक्त
--------------
मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 19-अप्रैल-2013 / समय : 06:30 सुबह / घर
नही!
मैं नही चाहता कि
सिन्दूर की तरह सजा रहूँ
तुम्हारे भाल पर
और तुम
लड़ती रहो मेरे अस्तित्व की जंग
पसीने में नहाती हुई
नही!
मैं नही चाहता कि रंगीन चूड़ियों में बदल
सजना तुम्हारी कलाइयों पर
बेरंग दुनिया में
टिक जाना तुम्हारी आँखों पर
केलेडियोस्कोप की तरह
और तुम
लड़ती रहो मेरे अस्तित्व की जंग
दिनभर खटते हुए
नही!
मैं नही चाहता किघुंघरूओं से पैदा करूं
तुम्हारे सूने हिस्से में संगीत
कैद कर लूँ तुम्हें
उम्र भर के लिए पायल में
और तुम
घिसटती रहो मेरा अस्तित्व लिए
बेड़ियों से लड़ते हुए
मैं
चाहता हूँ कि
मैं तुम्हारे अंतर बहूँ
विश्वास की तरह
और तुम्हारे चेहरे पर दमकूं
आत्मविश्वास की तरह
शायद तब हम जी सकें
सहास्तित्व अपना
लादी हुई पहचानों से मुक्त
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 19-अप्रैल-2013 / समय : 06:30 सुबह / घर






