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गण, पैसा और तंत्र

बुधवार, 28 जनवरी 2009

आज,
फिर मना गणतंत्र दिवस
सुबह से ही रेडियो चीख रहे थे
मॉल्स में भारी छूट मिल रही थी
देशभक्‍ति शीतलहर सी फैली हुई थी
स्कूलों से लड्‍डू खाये बच्चे लौट रहे थे
गण चौराहों पर बेच रहा था
एक रुपये में झंडा
जो कुछ देर तो जरूर हाथों में था
रस्मी तौर पर फिर.........

जिनके बाप के पास पैसे थे
उनके हाथ में झंड़े थे
तंत्र उनके साथ था
जिसके पास पैसा था
सुस्ता रहा था छुट्‍टी की दोपहर
और बचा हुआ गण,
पैसे पैदा कर रहा था
झंड़े बेचकर /
घरों से कचरा फेंककर /
या बदल कर भीड़ में
एक जून की जुगत में
जिंदाबाद / जयहिन्द बोल रहा था
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनांक : २६-जनवरी-२००९ / समय : ११:३० दोपहर / पलासिया चौराहे पर

4 टिप्पणियाँ

sareetha ने कहा…

आपकी कविता हमेशा ही ज़ोरदार होती हैं । एक दिन आपका नाम ज़रुर चमकेगा कवि के तौर पर ।

28 जनवरी 2009 को 2:57 pm
Udan Tashtari ने कहा…

कितना सच सच कह दिया कविता के माध्यम से. बहुत खूब!

28 जनवरी 2009 को 6:16 pm

aapke blog par pahli baar aaya..gadtantra pr likhi kavita padi..marm ko jaana..achcha laga..apme rachna aour uski sarthakta dono mouju he..badhai aour dhanyvad..

30 जनवरी 2009 को 12:16 am
नवीन शर्मा ने कहा…

वाह हज़ूर ... सबसे पहले तो आपकी तबीयत के बारे में बताइये.. कविता की नज़र से देखूं तो वही जोश है...
थोडी निराशा का भाव था पर यही कह सकता हूं..
'नहीं रहने वाली ये मुशकिलें,
ये हैं अगले मोड पर मंजिलें,
ज़रा देर इसमें लगे अगर,
ना उदास हो मेरे हम सफर..'

आदर सहित

31 जनवरी 2009 को 8:21 pm