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किसी दिन अपनी बारी पर

शनिवार, 10 जनवरी 2009

मेरे सामने,
दिनभर वही डरावने प्रश्‍न थे
जिनके उत्तर?
शायद मैं खोजना ही नही चाहता था
बस यूँ ही भागते हुये सच से
मैं बचना चाहता था
अपनी जिम्मेवारी से

मुझ,
पर जैसे सुबह से ही सवार था
खौफ
कि / मुझसे कुछ पूछा जायेगा
जाना - अंजाना सा
यह उम्मीद रखी जायेगी कि
मेरे पास उन सारे सवालों के हल होना चाहिये
जो मेरे दिमाग में भी आते है
जब मुझे पूछने होते सवाल
और किसी को देना होता है जवाब

दिन भर
के रूटीन में कई-कई प्लान
को रिव्यू करते हुये
कभी पहियों वाली कुर्सी पर
घुमते हुये / या सरकते हुये
किसी पर बिना वजह भी
कभी उखड़ते / चिल्लाते / झल्लाते हुये
मैं महसूस नही कर पाया
कि जब मूझे टेबल के उस पार से
दुनिया देखनी होगी किसी दिन
कैसी दिखाई देगी?
क्या मेरे शब्द खो देगें रफ्तार?
मेरी टाँगों में होने लगेगा कंपन?
क्या वो आसमान जहाँ मैं उड़ा करता हूँ
उतर आयेगा जमीन पर?
कोई और होगा मुझसे भी ऊँचे
सुर्ख आब से परों वाला जिसे चुगाना होगा मुझे
सर-सर कहते हुये

और,
यही सच स्वीकारने के पहले मुझे
किसी जमीन वाले पर
बिना वजह चिल्लाना पड़ेगा
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनांक : ०९-जनवरी-२००९ / समय : १०:४० रात्रि / घर

3 टिप्पणियाँ

BrijmohanShrivastava ने कहा…

व्यंग्य भी ,दिल की कड़वाहट भी /सर सर कहते हुए चुगाना होगा और उस क्लेश को अपने से नीचे वाले को डांट कर निकलना होगा क्या बात है तिवारी जी/ आज क्या दुर्घटना होने वाली है प्रश्न पूछे जाने की , सुबह से आभास होने लगना और भयभीत होजाना /दैनिक जीवन की रोज़मर्रा की होने वाली हकीकत का सही चित्रण

10 जनवरी 2009 को 6:55 pm
safat alam ने कहा…

बहुत ही अच्छे और मधूर लेख प्रस्तुत करते हैं आप, दिल की गहराई से बहुत बहुत धन्यवाद। खूब लिखें और लिखते रहें, हमारी शुभकामनायें आपके साथ हैं, और हम ईश्वर से आपकी सफलता के लिए प्रार्थना करते है।

10 जनवरी 2009 को 8:10 pm

बहुत मार्मिक अभिव्यक्ति बहुत गहरे भावः भरी है आपकी कविता सटीक व्यंग कार्यालय के पृष्ठ भूमि से

12 जनवरी 2009 को 9:36 am