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लड़कियाँ तितली सी होती हैं....(नई कड़ी)

बुधवार, 14 जनवरी 2009



मेरी अपनी एक पुरानी कविता "लड़कियाँ तितली सी होती हैं" जो कि ब्लॉग "कवितायन" http://tiwarimukesh.blogspot.com पर २५-नवम्बर-२००८ को प्रस्तुत की गई थी. उसकी अगली कड़ी में अपनी भांजी "जान्हवी" (पुत्री : विभा-राजेश) के जन्म के साथ मुझे यह पंक्‍तियाँ और सूझी :-

लड़कियाँ,
गोद में हों तो गुलाब सी लगती हैं
घुटनों पर चलता ख्वाब लगती हैं
जो मुस्कुराये तो मन मोह ले
जमीं पर उतरा माहताब लगती है

लड़कियाँ,
जब आती हैं तो,
बदल जाती है दुनिया
आँगन में झरती चांदनी लगती है
रातों में महकती बगिया लगती है

---------------------
मुकेश कुमार तिवारी
दिनांक : ०६-जनवरी-२००९ / समय : १०:०१ रात्रि / विभा के घर

11 टिप्पणियाँ

नवीन शर्मा ने कहा…

चमकीला अक्स, सुन्दर नक्श, कोमल स्पर्श
तेरी नाज़ुक सी पन्खुड़ियों सी उंगलियों से मुझे छूना
मेरी नजरों में गहरे तक झांकना
आते जाते मुझसे लिपटने को तरसना
कोरों से बहते अश्कों को लुढकने की इज़ाजत देना
जो मैं जाऊं तो प्रेम की ज्योत जला मेरे लौटने की प्रतीक्षा करना
और मुझे हर ढलती शाम लौटते देख
भागकर आना, खुशी के दो बूंद आंसू
इस धरती को समर्पि कर, धन्यवाद स्वरूप
मेरे आलिंगन में बन्ध जाना,
कोयल की तरह किलकारी लगाना
दो कदम पीछे को जाना और
एक बार फिर अपनी कोमल बाहों में मुझे भरने की
नाकाम कोशिश करना और लज्जाते पर बुलबुल की
आवाज में कहना -
'पापा'

---------
बहुत अच्छी और लुभाने वाली कविता थी..
मेरी खुद की दो बेटियां हैं.. और मुझे दोनो पर नाज़ है |

आदर सहित

14 जनवरी 2009 को 1:17 pm
नवीन शर्मा ने कहा…

You are most welcome anytime ! Would be my pleasure to host you.

Regards
N
981 098 2089

14 जनवरी 2009 को 6:41 pm
Prem Farrukhabadi ने कहा…

Tiwari ji
Daughters are real boats for us to complete our journey on this earthly sea. They really don,t get what they deserve. Lovely poem . congretulations!
Please write some more on beloved daughters.

14 जनवरी 2009 को 9:13 pm

कितनी सच्ची बात कही है, वाह! बहुत सुंदर कविता!

15 जनवरी 2009 को 7:07 am
BrijmohanShrivastava ने कहा…

इसको द्वितीय कड़ी का भी शीर्षक दिया गया होता

15 जनवरी 2009 को 7:02 pm
डॉ .अनुराग ने कहा…

बहुत खूब...एक अजीब सी ताजगी...एक मुस्कान चेहरे पर छोड़ गई आपकी ये कविता ओर नन्ही गुडिया

15 जनवरी 2009 को 7:44 pm

बहुत उम्दा कविता| मन मोहती हुई|

15 जनवरी 2009 को 7:57 pm

बहुत खूब. आपकी कविता सुंदर अहसास दिला गई. बधाई.

16 जनवरी 2009 को 5:03 pm
Jyotsna Pandey ने कहा…

मुझको मेरा बचपन लौटती
पायलों की रुनझुन सी
आँगन महकाती
चूडियों की खनक में
कुछ कह जाती
जिसके हँसने से
मैं भी मुस्काती
मेरे गले में बाँहें डाले
वो तुम ही तो हो
मेरी परछाईं .....

सच-मुच बेटियाँ होती ही प्यारी हैं .मेरी भी एक बेटी है,और हम भी ऐसे ही एहसास ले के जीते हैं .

बिटिया की तरह प्यारी ,भावों से भरी कविता के लिए साधुवाद .

17 जनवरी 2009 को 9:17 am

भावपूर्ण वर्णन बहुत सुंदर
प्रदीप मनोरिया
http://manoria.blogspot.com
http://kundkundkahan.blogspot.com

17 जनवरी 2009 को 10:10 am
MUFLIS ने कहा…

"larkiyaaN jb aayeiN to,
badal jati hai duniya.."
bahot hi paavan aur umda izhaar hai
iss nek aur muqaddas nazm pr meri taraf se dheron mubarakbaad....!
---MUFLIS---

19 जनवरी 2009 को 6:42 pm