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कुछ अधूरे प्रश्‍न

सोमवार, 12 जनवरी 2009

यह,
जरूरी तो नही कि
हर पूछे गये प्रश्‍न का जवाब दिया जाये
या यदि लगा हो प्रश्‍नचिन्ह
क्यों?
तो उससे हरसंभव छुटकारा पाया जाये
कभी,
मौन से अच्छा उत्‍तर कोई नही होता
कभी,
पूरी जिन्दगी कम पड़ती है बयां करने में
क्यों?
एक प्रश्‍न नही होता अपने आपमें
मुकम्मल
सिर्फ बौखलाहट है प्रश्‍नों की

एक,
सीमा होती है जहां तक ही
सहा जा सकता है प्रश्‍नों को
या तलाशा जा सकता है जवाब
जब कचोटने लगते है प्रश्‍न तो
फिर, नकारा जाने लगता है

प्रश्‍न,
जब कुलबुलाते हैं अंतर
तब क्यों? आकार लेता है
और टोह लेता है जवाब की
फिर, यह उम्मीद क्यों
कि हर कि क्यों के बाद
आवाज गुम नही हो जायेगी
सन्नाटे में
बल्कि, लौटती रहेगी
अनुगूंज बनकर

क्यों?
कुछ प्रश्‍न रह जाते है अधूरे
क्यों?
हर प्रश्‍न का जवाब नही होता
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनांक : १०-जनवरी-२००९ / समय : १०:१७ रात्रि / घर

2 टिप्पणियाँ

Prem Farrukhabadi ने कहा…

mukesh ji
Bahut khoob.sach much ye sawwal jawaab hi jindgi ko doobar kar dete hain.AAPKA YE VICHAAR DILKO CHHU GAYA.

Duniya walon ke liye

sawaalon jawaawo mein mat uljho mere dost.
na to ye khudko jeene dete na gairon ko.

Maun mein jo mazaa vo kahin nahin
Magar jindgi maun kahan rahne deti

13 जनवरी 2009 को 12:17 pm
नवीन शर्मा ने कहा…

बहुत सुन्दर लिखा है...
आपको और सभी मित्रों को मेरी तरफ से लोहड़ी की बहुत बहुत शुभ कामनायें.

आदर सहित

13 जनवरी 2009 को 5:56 pm