कुछ देर ठहरना चाहता हूँ

रविवार, 20 फरवरी 2011

जब, तक हम साथ थे
उस एक रास्ते पर चलते हुये
मुझे हरपल लगता था कि
हम एकदूसरे के लिये ही बने है
शायद तुम भी,
ऐसा ही कुछ सोचती हो

न,
जाने मुझे ऐसा क्यों लगता था कि
मैं तुम पर थोप सकता हूँ
अपने विचारों को धूप की तरह /
तुम्हें घुले रख सकता हूँ
अपनी देहगंध में /
तुम पर अधिकार जता सकता हूँ
सिर्फ इस वज़ह से ही कि
हम साथ चल रहे हैं
और हमारे बीच पहचान बदलने लगी है
रिश्ते की सहूलियत में

मेरे,
विश्वास के परे
तुम किसी कोंपल की तरह
फूट पड़ीं और
अलग कर लिया खुद को
मेरी पहचान से मुक्त
मैं अब भी मुड़के देखता हूँ तो
तुम्हारे कदमों की छाप दिखाई देने लगी हैं
मेरे कदमों से अलग होती हुई
लेकिन रास्ता / दिशा अब भी एक ही है
मैं,
कुछ देर ठहरना चाहता हूँ
तुम्हारा इंतजार करते
---------------------------
मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 03-फरवरी-2011 / समय : 11:27 रात्रि / घर

14 टिप्पणियाँ

kshama ने कहा…

Saath,saath chalte hue,pahchaan alag ho to kya bura hai?Jeevan samantar rekhaon kee tarah to nahee hua na!
Aur ham chahke bhee kahan thahar sakte hain??

20 फरवरी 2011 11:46 am
वन्दना ने कहा…

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (21-2-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

http://charchamanch.blogspot.com/

20 फरवरी 2011 12:47 pm
Dilbag Virk ने कहा…

sunder kvita
pyar jab adhikar jmane lgta hai to pyar toot jata hai , is sach ko aapne bdi khoobsoorti se prstut kiya hai .

--- sahityasurbhi.blogspot.com

20 फरवरी 2011 12:52 pm
Mithilesh dubey ने कहा…

बहुत दिनों बाद आपको पढने का मौका मिला अच्छा लगा .

20 फरवरी 2011 12:55 pm
Kailash C Sharma ने कहा…

मैं अब भी मुड़के देखता हूँ तो
तुम्हारे कदमों की छाप दिखाई देने लगी हैं
मेरे कदमों से अलग होती हुई
लेकिन रास्ता / दिशा अब भी एक ही है

रास्ते अलग अलग भी हों, लेकिन दिशा एक ही हो तो मिलन कभी न कभी अवश्य होगा..सुन्दर भावपूर्ण प्रस्तुति

20 फरवरी 2011 2:57 pm
ZEAL ने कहा…

जो अपने होते हैं , वो प्रेरणा बनकर बहुत ऊँचाइयों तक ले जाते हैं , फिर खुद कों धीरे से अलग करके साथ साथ चलते हैं । कभी कभी ठहरकर इंतज़ार करना ही चाहिए ।

20 फरवरी 2011 3:22 pm
वन्दना ने कहा…

यही रिश्तो का सच है।

20 फरवरी 2011 5:36 pm

..बहुत बार बिना कहे किया हुवा कुछ अच्छा लगता है .... लाजवाब है मुकेश जी ...

20 फरवरी 2011 8:01 pm

चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 22- 02- 2011
को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

http://charchamanch.uchcharan.com/

21 फरवरी 2011 8:55 pm
अजय कुमार ने कहा…

सीधे दिल तक पहुंची

22 फरवरी 2011 7:19 am
राज शिवम ने कहा…

बहुत ही खुबसुरत प्रस्तुति......

22 फरवरी 2011 1:46 pm

सुंदर सरल प्रभावी सम्प्रेषण ......बेमिसाल रचना

23 फरवरी 2011 9:56 am

मानव सम्बन्धों का सरल चित्रण।

23 फरवरी 2011 10:08 pm