कविता : आदमी को पसीना नही आता है

मंगलवार, 8 फरवरी 2011


जबसे,
प्रबंधन(मैनेजमेन्ट) सिद्धाँत नही
बल्कि किसी हथियार की तरह इस्तेमाल होने लगा है
और, आदमी ने सीखा
आऊटसोर्स/ऑफलोड़ करना और
खुदको मुक्त कर लेना
अपने कर्तव्यों से
तबसे,
आदमी! आदमी नही रहा

जब,
उसने सीखा था पढ़ना लिखना
तबसे,
आदमी नही रहा जंगली
जो अपनी सीमाओं का विस्तार करता था
अदम्य साहस के सहारे
और बदलकर रख देता था
जो भी चाहता था

अब,
आदमी अपने अधिकारों को बिजूकों में बदल
चौराहों पर खड़ा करता है
हक के लिये लड़ने
और खुद सो जाता है
दुबुक कर
अब,
आदमी को पसीना नही आता है
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 29-जनवरी-2011 / समय : 07:45 सायं / बाहा-ईवेंट से लौटते हुये

6 टिप्पणियाँ

सदा ने कहा…

बहुत सुन्‍दर शब्‍द रचना ।

8 फरवरी 2011 3:58 pm

इस अत्यंत प्रभावशाली रचना के लिए मेरी बधाई स्वीकार करें...
नीरज

8 फरवरी 2011 4:09 pm

बहुत सच कहा, जो ठीक से न करो, बाहर वालों को दे दो।

8 फरवरी 2011 6:47 pm
kshama ने कहा…

Jinko paseena aabhee jata hai,wo kisko, kab dikhta hai?

8 फरवरी 2011 9:13 pm
ओम आर्य ने कहा…

अच्छी रचना मुकेश भाई..

9 फरवरी 2011 8:01 am
Rahul Singh ने कहा…

पसीना नहीं आता तो सो भी नहीं पाता, बस दुबक जाता है.

9 फरवरी 2011 8:55 pm