अपनी सौंवी पोस्ट के बाद एक नये स्ट्रांस के साथ पारी की प्रारंभ कर रहा हूँ इस आशा के साथ कि एकाग्रचित्त रह सकूं और आपके स्नेह का पात्र भी।
सादर,
मुकेश कुमार तिवारी
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संभावनायें,
जब भी लौटी निराश
जेब के मुहाने से
मैंने,
खुदको सिमटा पाया
किसी खोटे सिक्के की तरह
अनचाहा गैरजरूरी सा
प्रत्याशायें,
केवल आशा भर रही
जब भी जिन्दगी लगी दाँव पर
द्यूत,
केवल विनोद भर नही था
कुछ और भी था अंतर्निहित
मैंने,
खुदको हारता पाया
सभी बाजी पर युधिष्ठर की तरह
सत्यनिष्ठ होने की सजा भोगता, बेबस लाचार सा
आशायें,
विश्वास देती रहीं कि
कुछ भी अशेष-शेष नही होता
खाली हाथों में
बहुत जगह होती है कि
वो,
कैद कर सके हवा को /
मोड़ सके हवा का रूख अपनी ओर /
सपनों की पतंग को दे सके आसमानी उड़ंची
और,
मैं महसूस करता हूँ
जेब में मचलते पाँसों को /
हाथों में हो रही खुज़ली को
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : ०६-दिसम्बर-२००९ / समय : ११:४१ दोपहर / घर
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25 टिप्पणियाँ
खुदको सिमटा पाया
7 दिसम्बर 2009 11:16 amकिसी खोटे सिक्के की तरह
अनचाहा गैरजरूरी सा
यह पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगीं.........
खूबसूरत कविता.........
खुदको सिमटा पाया
7 दिसम्बर 2009 11:19 amकिसी खोटे सिक्के की तरह
अनचाहा गैरजरूरी सा
बहुत सही है आम आदमी की भावनाओं को बहुत सुन्दर शब्द दिये हैं 100वीं पोस्ट के लिये बहुत बहुत बधाई
आशायें,
7 दिसम्बर 2009 11:32 amविश्वास देती रहीं कि
कुछ भी अशेष-शेष नही होता
खाली हाथों में
बहुत जगह होती है...यह पंक्तियाँ सच को उजागर कर रही है ..बहुत अच्छी लगी आपकी यह रचना शुक्रिया मुकेश जी
जब भी जिन्दगी लगी दाँव पर
7 दिसम्बर 2009 12:32 pmद्यूत,
केवल विनोद भर नही था
कुछ और भी था अंतर्निहित ....
सच कहा है ........ धूत युधिष्ठर ने भी बस विनोद के लिए नही खेला था ...... बहुत कुछ दाव पर लगा था .... प्रतिष्ठा, गर्व ........ आज के दौर में बस कारण बदल गये हैं .........
बहुत ही शशक्त रचना है मुकेश जी .........
आपकी रचनाओं का विस्तार सोच को एक अद्भुत दिशा देता है
7 दिसम्बर 2009 2:49 pmखुदको हारता पाया
7 दिसम्बर 2009 5:18 pmसभी बाजी पर युधिष्ठर की तरह
सत्यनिष्ठ होने की सजा भोगता, बेबस लाचार सा
खुद को हारना और फिर एहसास कर लेना यही तो युधिष्ठरत्व है शायद.
बेहतरीन,गम्भीर रचना
अच्छी रचना। बधाई।
7 दिसम्बर 2009 5:37 pmachchi rachna ke liye badhaai.
7 दिसम्बर 2009 9:59 pmरचना एक आशापूर्ण उर्जा भर गयी ।
8 दिसम्बर 2009 12:45 amek aur shaandaar kavita... sir maine aapki ek kavita ke baare mein yahan likha hai..
8 दिसम्बर 2009 11:52 amhttp://pupadhyay.blogspot.com/2009/12/blog-post.html
us kavita ne sach mein hilakar rakh diya hai mujhe...kya bhaav the..waaah..just superb
Sundar sakaratmak rachna...apne bareme saty likhna himmat ka kaam hota hai...
8 दिसम्बर 2009 2:06 pmखुदको सिमटा पाया
8 दिसम्बर 2009 2:12 pmकिसी खोटे सिक्के की तरह
अनचाहा गैरजरूरी सा
सर जी आप कैसे खोटे सिक्के हो सकते हैं। आप तो निकले खरा सोना । अच्छी प्रस्तुति बधाई स्वीकारें ।
Bahut bahut sundar bhavabhivyakti !!!
8 दिसम्बर 2009 3:12 pmGalat ko jeette dekh saty ke shakti par jab man aashankit ho jaya karta hai to isi prakaar ke manobhaav man me utha karte hain jise aapne bade hi sundar shabdon me abhivyakti dee hai...
सुन्दर कविता.
8 दिसम्बर 2009 4:15 pmसंभावनायें,
8 दिसम्बर 2009 4:36 pmजब भी लौटी निराश
जेब के मुहाने से
मैंने,
खुदको सिमटा पाया
किसी खोटे सिक्के की तरह
अनचाहा गैरजरूरी सा
Gambhir, saarthaka rachana ke liye shubhkamnayen.
सौवीं पोस्ट के लिये बधाई मुकेश जी...
9 दिसम्बर 2009 10:15 amबड़ा मुश्किल है इस सौ पोस्ट का सफर और उसपर हर पोस्ट पे अपनी चमक को बरकरार रखते हुए इतनी खूबसूरत कवितायें कहना।
बधाई!
कविता वक़्त की बेबसी का सच्चा
9 दिसम्बर 2009 6:05 pmभावमय चित्र प्रस्तुत कर रही है ..
बहुत खूब
12 दिसम्बर 2009 11:14 amबहुत -२ आभार
वाकई ,बेवस और लाचार होकर सजा झेलना पड्ता है सत्यनिष्ठ होने की ।आशाये तो कुछ भी आश्वासन दे सकती है सब्ज़ बाग दिखला सकती है ।
14 दिसम्बर 2009 9:27 pmतिवारी जी । बाराह पैड पर ड और ढ के नीचे बिन्दी नही लग पारही है ,की बोर्ड के किस अक्षर से लगेगी ?
बधाई और इतनी सुंदर कविताऍं लिखने के लिए धन्यवाद और शुभकामनाऍ ।
14 दिसम्बर 2009 11:17 pmभाई,
15 दिसम्बर 2009 6:04 pmसुना तो यही था सत्य परेशान हो सकता है पराजित नही लेकिन यह विडम्बना युधिष्ठर के भाग्य में भी थी और हम सब भी कहीं ना कहीं भोगते हैं।
बात अच्छी कही है दिल तक पहुँचती है।
जितेन्द्र चौहान
आशायें,
16 दिसम्बर 2009 5:27 pmविश्वास देती रहीं कि
कुछ भी अशेष-शेष नही होता
खाली हाथों में
बहुत जगह होती है
सुंदर ।
आप सभी का आभार!
18 दिसम्बर 2009 8:42 amसादर,
मुकेश कुमार तिवारी
Pehla verse hi bahut zabardast hai ! Kavita bahut badhiya !
26 दिसम्बर 2009 10:32 pmCopy paste karna chaha comment kar sakoon apni pasandeeda panktiyaan ..... shayad disabled hai. Achchi baat hai :)
God bless
सौवीं पोस्ट के लिये बधाई मुकेश जी..
16 अप्रैल 2010 6:28 amएक टिप्पणी भेजें