हमारे
बीच वो सब था
जो कि होना चाहिये
जिससे किसी रिश्ते को
कोई नाम दिया जा सकता है
वो,
सब भी था
जो बांधे रखता है
एक डोर में
उलहानों की लालिमा में
सजी सुबह से लेकर
नाराजियों की उबासियाँ लेती
अलसाई दोपहरी /
तानों से बोझिल उदास शाम तक
और इन सबके बावजूद
जो है / जैसा है स्वीकारते हुये
एकसाथ बने रहने की अदम्य इच्छा
मैं,
कभी महसूस करता हूँ कि
हम एकसाथ ना होते तो भी
जिन्दगी के किसी मोड़ पर
जरूर मिले होते
किसी भी वज़ह से या बिलावज़ह भी
लेकिन जरूर मिले होते
कोई अकेला तो नही बूढ़ा होता
हमारे
बीच सभी कुछ
भाग रहा हो हड़बड़ी में
जैसे दीवारें मचलती है
मुँह बाये नये रंगों के लिये
या बाल धकेल रहे हों
खिज़ाब को अपने से परे
केवल एक उम्र का फासला स्थिर है
और हम बुढ़ा रहे हैं
एकसाथ
-----------------
मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : १६-दिसम्बर-२००९ / समय : ११:१८ रात्रि / घर
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22 टिप्पणियाँ
बहुत सुंदर प्रस्तुति....
18 दिसम्बर 2009 9:56 amलेकिन जरूर मिले होते
18 दिसम्बर 2009 10:02 amकोई अकेला तो नही बूढ़ा होता
ओह बेहतरीन....उम्दा..!
sahi kaha..........sundar bhav.
18 दिसम्बर 2009 11:39 am"केवल एक उम्र का फासला स्थिर है / और हम बुढ़ा रहे हैं/ एक साथ !"
18 दिसम्बर 2009 12:04 pmबेहद खूबसूरत पंक्तियाँ । सुन्दर कविता । आभार ।
बहुत सही कहा है
18 दिसम्बर 2009 12:21 pmअगर हम मिले होते
तो कोई अकेला तो बूढा नहीं होता सुन्दर अभिव्यक्ति धन्यवाद शुभकामनायें
मैं,
18 दिसम्बर 2009 1:48 pmकभी महसूस करता हूँ कि
हम एकसाथ ना होते तो भी
जिन्दगी के किसी मोड़ पर
जरूर मिले होते
किसी भी वज़ह से या बिलावज़ह भी
लेकिन जरूर मिले होते
कोई अकेला तो नही बूढ़ा होता
बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति लगी यह ...उम्र के एक साथ होने का एहसास कहीं तो कुछ मिला देता है ..सुन्दर शुक्रिया
Harek shabd,har panktiko sundartase bharta hua! Waah! Kamaal hai!
18 दिसम्बर 2009 2:50 pmहमारे
18 दिसम्बर 2009 2:58 pmबीच सभी कुछ
भाग रहा हो हड़बड़ी में
बहुत अच्छा। प्रेरक। बधाई स्वीकारें।
उलाहनों, नाराजियों, तानों को झेलते हुये साथ रहने की इच्छा यही जिन्दगी है ।दीबारें रंग रोगन मांगती हों और बाल खिजाब को सहन न कर पारहे हों ।हां बालों का सफ़ेद होना पहले बुढापे की निशानी समझा जाता था =श्रवण समीप भये सित केसा ,मनहु जरठ पन अस उपदेसा ""रिश्ते को कोई नाम दिया जाना जरूरी भी होता है । "उलाहने की लालिमा मे सजी सुबह"" अच्छा प्रयोग किया है गोया ""यह कभी नही हुआ कि मै खुद कभी सोकर उठूं/ घर के हंगामे ही हर रोज़ जगाते हैं मुझे"" ।उत्तम रचना ,सरल वाक्य ,जीवन की कड़्वी सच्चाई ।
18 दिसम्बर 2009 7:20 pmतिवारीजी,
19 दिसम्बर 2009 12:41 amढलान पर बढती ज़िन्दगी का फलसफा ! खट्टे-मीठे स्वाद से भरी एक समूची आत्मा को आईना दिखाती रचना ! इस सच के सम्मुख साथ होने का ये यकीन क्या कम है ! कविता की पंक्तियाँ मन को छूती हैं ! साधुवाद !!
सप्रीत--आ.
बहुत सुन्दर रचना है बधाई।
19 दिसम्बर 2009 2:18 amsunder rachna.
19 दिसम्बर 2009 7:20 amबेहद खूबसूरत भाव! काल को कौन रोक सका है?
19 दिसम्बर 2009 9:40 amउम्र बढता जा रहा है और उम्र का फासला स्थिर है
19 दिसम्बर 2009 5:38 pmफासला ही तो है जो फासला बनाए रखने को मजबूर कर देता है.
बहुत गहरी नज़र की रचना
बेहतरीन
जिंदगी कें बारे में बहुत कुछ कहती है आपकी रचना ......... उम्र का फलसफा है आपकी रचना .....
20 दिसम्बर 2009 6:19 pmबहुत अच्छी और सुंदर रचना. प्रेरणादायक,सकारात्मक सोच बधाई
22 दिसम्बर 2009 4:46 pmबहुत कम शब्दों में कही गयी बहत गहरी बात
आह! मुकेश जी की चमत्कारी लेखनी का एक और जादू....
23 दिसम्बर 2009 7:47 pmबहुत सुंदर कविता, सर!
वैसे भी बुढ़ापा मौत की तरह ही याद रखने योग्य चीज है।
23 दिसम्बर 2009 8:15 pmमेरे सखा श्री नरेन्द्र सिँह सिकरवार की ई-मेल प्र प्राप्त प्रतिक्रिया :-
24 दिसम्बर 2009 1:31 pmMukesh Bhiya
It’s simply beautiful.... vah! Kya sur lagaya hai!!!!
Koi akela to boodha nahi hota…
Boodha hona such hai is jeevan ka
Naye valay umr ke paida hote rahte hain..
aur dhakelte hain pichhle valay ko age, tab aadmi boodha hota hai,
Chahe akela ho yaa kisi ke saath ho...
Kintu....
Kisi ke saath boodha hone ki apni ek ada hai.. apna ek andaaz hai...
Jisme boodha hone ki anubhuti dheere hoti hai
ekdum se pareshaan nahi karta naye valay ka pichle valay ko dhakelna...
fir chaahe baal khizaab ko kyo na dhakelte rahein....
Good one...... Bhiya, good one...
Regards,
Pappu....
narendra.sikerwar@avtec.in
एक साथ बुढ़ाने का भी अलग ही आनन्द होता होगा. यह मैं इस कविता के माध्यम से महसूस कर रही हूँ.
26 दिसम्बर 2009 12:18 amऔर इन सबके बावजूद
3 जनवरी 2010 11:09 amजो है / जैसा है स्वीकारते हुये
एकसाथ बने रहने की अदम्य इच्छा...
आज के इस विखंडित होते माहौल में, जहाँ तलाकशुदा लोगों की तादाद बढती जा रही है...आपकी कविता प्रेरित करती है एक साथ बुढ़ाने के लिए...
बेहद खूबसूरत भाव! काल को कौन रोक सका है
16 अप्रैल 2010 6:25 amएक टिप्पणी भेजें