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कविता : अपनी पहचान से परे

शनिवार, 11 अगस्त 2012

मैं, केवल विस्तार भर हूँ
उस अशेष-शेष का
और कुछ भी नही
इससे ज्यादा
यहाँ तक कि
मेरा होना भी
तुम्हारे होने की वज़ह का
मोहताज है

शायद,
यही हमें जोड़ता भी है
और अलहदा भी करता है
ठीक वहीं से
जहाँ तुम पाते हो
अपने विचारों को गड्ड-मड्ड होते
और छोड़ देते हो
प्रश्नों को उलझे हुए धागों सा
या सिर्फ अपने बाप होने के
अहसानों से दबा देते हो
या मुझे सीने होते हैं
होंठ अपने
और गुम हो जाना होता है
अपनी पहचान से परे
तुम्हारी परछाइयों में कहीं
--------------------------
मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 11-जुलाई-2012 / समय : 11:00 रात्रि / घर

10 टिप्पणियाँ

मुकेश जी बहुत सुन्दर कविता है... एक नए सोच को जन्म देता है...

12 अगस्त 2012 को 12:17 am

वाह जी अच्‍छी कवि‍ता है

12 अगस्त 2012 को 1:02 pm

बहुत बढिया रचना है बधाई स्वीकारें।

12 अगस्त 2012 को 1:47 pm
Vinay Prajapati ने कहा…

सर आपके ब्लॉग पर CTRL+A करके सब कुछ Select हो जाता है और फिर उसे CTRL+C कर के कापी कर सकते हैं।

अपनाइए नया उपाय :
1. No Right Click on Post Text with CSS
2.No Right Click on Post Text with JS

12 अगस्त 2012 को 2:46 pm

अपनी पहचान से परे की पहचान को ढूंढती अच्छी रचना ...

12 अगस्त 2012 को 5:12 pm

अपनी पहचान से जुड़ी कवितायें प्रायः दार्शनिक हो जाती हैं..

13 अगस्त 2012 को 9:14 am

अलग-अलग मुकाम और स्थितियों में अपनी पहचान ही गुम हुई लगती है ! नए सिरे से तलाश करनी होती है अपनी हकीकत ! अपने वजूद की पहचान की कोशिशें होती रही हैं हमेशा से और अलग-अलग रास्तों से, ढंग से.... ! लेकिन आपकी यह कविता क्यों, किस चोट से उपजी है, समझने की चेष्टा कर रहा हूँ ! इतना कह सकता हूँ, कविता प्रभावित करती है !
सप्रीत---आ.

13 अगस्त 2012 को 1:42 pm

आप सभी का आभार,

सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

19 सितंबर 2012 को 5:39 pm
आशा जोगळेकर ने कहा…

पहली बार आपको ब्लॉग पर आई । आपकी कविताएं बहुत अच्छी लगीं । यह भी एक अलग सी प्रस्तुति बेटे की विवशता और छुपा सा आक्रोश ।

20 सितंबर 2012 को 9:41 pm