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कविता : बाज़ार का दखल

मंगलवार, 21 फ़रवरी 2012

जबसे, दिखने और बिकने के संबंधों को 
गणित ने परिभाषित किया
और अर्थशास्त्र के 
सिद्धाँतों ने समझाया कि
बिकने के लिए दिखना सम्पूरक है
कपड़े छोटे होने लगे

पहले,
पतलून ऊँची हुई तो
ज़ुराबें झाँकने लगी पाँयचों से बाहर
फिर ज़ुराबों पे
लिखा जाने लगा ब्राण्ड
अब सिर्फ ज़ुराबें ही पहनी जाती है
और पतलून
खोने लगी है अपनी उपयोगिता

अंतर्वस्त्रों,
पर सजे लेबल
अब बाहर झाँकने लगे है
मैं डरने लगा हूँ
बाज़ार के बढ़ते हुए दखल से
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 05-फरवरी-2012 / समय : 10:40 रात्रि / घर 


6 टिप्पणियाँ

kshama ने कहा…

Bahut khoob!
"Bikhare Sitare"pe aayen! Apne heart attack ke bareme likh rahee hun.

21 फ़रवरी 2012 को 6:26 pm
Sunil Kumar ने कहा…
M VERMA ने कहा…

यकीनन बाजार का दखल अंतर्वस्त्रों तक हो गया है.
बहुत सुन्दर रचना

21 फ़रवरी 2012 को 8:18 pm

बाजार हावी है...सुन्दर अभिव्यक्ति इस भाव की...

21 फ़रवरी 2012 को 10:43 pm
Vivek Rastogi ने कहा…

सच कहा, यही तो हो रहा है।

22 फ़रवरी 2012 को 7:01 am

सच में कभी कभी दर लगने लगता है .. कहाँ रुकेगी ये दखल ...

23 फ़रवरी 2012 को 2:01 pm