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कविता : बेमानी रात के ख्वाब

बुधवार, 21 मार्च 2012

तुम्हारे पसीने की बू
मुझे अच्छी लगती है
किसी रूम फ्रेशनर से भी बेहतर
और चाहता हूँ कि
तुम यूँ ही
मेरे तेज होती साँसों में समा जाओ

स बात का
कोई मतलब नही होता
कि हमारे बीच लाख नासमझियाँ हों
लेकिन फिर भी मैं
गुम हो जाना चाहता हूँ
तुम्हारी बाहों के दायरे में
अपने पूरे अस्तित्व के साथ
लेकिन
तुम्हारे होने के बावजूद भी जब महकता है
कमरा किसी रुम फ्रेशनर से
और तुम
दूसरी ओर मुँह करके सो जाती हो
रात बेमानी हो जाती है
सुबह तक ख्वाब
बैचेनियों का सुरमा लगाये रह जाते हैं
मेरा अपना
पसीना गंधाने लगता है
--------------------------
मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 20-मार्च-2012 / समय : 10:28 रात्रि / घर

13 टिप्पणियाँ

रविकर ने कहा…

आभार |

dineshkidillagi.blogspot.com

21 मार्च 2012 को 6:32 pm
Mithilesh dubey ने कहा…

सुन्दर भाव समेटे अच्छी रचना ।

21 मार्च 2012 को 7:00 pm
Kailash Sharma ने कहा…

बहुत सुंदर भावमयी रचना...

21 मार्च 2012 को 7:41 pm

आपकी पोस्ट कल 22/3/2012 के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
कृपया पधारें
http://charchamanch.blogspot.com
चर्चा - 826:चर्चाकार-दिलबाग विर्क

21 मार्च 2012 को 9:04 pm
kshama ने कहा…

गहरा पर स्पष्ट।

21 मार्च 2012 को 10:10 pm
Pallavi ने कहा…

प्रवीण जी की बात से पूर्णतःसहमत हूँ गहरा मगर स्पष्ट...अभिव्यक्ति समय मिले तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है।
http://mhare-anubhav.blogspot.co.uk/

22 मार्च 2012 को 12:57 am

बहुत सुन्दर और सटीक अभिव्यक्ति प्रस्तुत की है आपने!

22 मार्च 2012 को 5:33 am

bahut badhiya bhavapoorn rachana ... badhai

22 मार्च 2012 को 2:50 pm
S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') ने कहा…

वाह! सीधी बात....

22 मार्च 2012 को 5:54 pm
Vijuy Ronjan ने कहा…

bimbon ka adbhut prayog...bahut umda...

22 मार्च 2012 को 6:57 pm
udaya veer singh ने कहा…

सुंदर भावमयी रचना...

22 मार्च 2012 को 9:30 pm
M VERMA ने कहा…

बहुत सुन्दर .. रात बेमानी क्यों हो

6 अप्रैल 2012 को 5:39 pm