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कविता : प्रेम

बुधवार, 25 जनवरी 2012

प्रे,
अपने को व्यक्त करने के लिए
केवल सौन्दर्य को ही
नही खोजता
वह किसी भी रूप में
तलाश लेता है
स्वयं को अभिव्यक्त करने का रास्ता


प्रे
की विशुद्ध अभिव्यक्ती
मैंने महसूस की है
निश्छल झरनों में
अन्जान पहाड़ी के किसी निर्झर कोने से
जब,
कोई नदी
प्रकृति के मोह में
छलाँग लगा देती है
किसी अनछुई बियाबाँ तलहटी में
खुद धुंध में बदलते हुए विलीन हो जाती है
मिस्ट में बदलकर हवा में कहीं 
और
पत्थरों के सीने पर
फूटने लगती हैं कोंपलें
वादियों में ध्वनित होने लगता है संगीत
बस,
प्रे अंकुरित हो जाता है
---------------------
मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 07-जनवरी-2012 / ऑफिस / समय : 12:35 दोपहर

17 टिप्पणियाँ

कविता रावत ने कहा…

और
पत्थरों के सीने पर
फूटने लगती हैं कोंपलें
वादियों में ध्वनित होने लगता है संगीत
बस,
प्रेम अंकुरित हो जाता है..
sach prem ki taakat ko kisi bhi taraju mein nahi taula jaa sakta hai..
Prem ki sundar abhivykati...

25 जनवरी 2012 को 7:06 pm
Kailash Sharma ने कहा…

बहुत सुन्दर और भावपूर्ण प्रस्तुति..

25 जनवरी 2012 को 7:11 pm

Sach kaha hai ... Prem ki gaagar chalak hi jaati hai ... Bhavpoorn ... Lajawab prastuti ...

25 जनवरी 2012 को 7:13 pm
Pallavi ने कहा…

वाह क्या बात है बेहतरीन भाव संयोजन लाजवा प्रस्तुति

25 जनवरी 2012 को 8:23 pm
kshama ने कहा…

Bahut sundar rachana!
Kabhee mere blog pe bhee padharen!

25 जनवरी 2012 को 10:58 pm
kshama ने कहा…

Gantantr Diwas kee anek shubh kamnayen!

25 जनवरी 2012 को 10:58 pm
kshama ने कहा…

प्रेम की अभिव्यक्ति सौन्दर्य की परतों से कहीं गहरी होती है, जो समझ ले, वही पाने का अधिकारी है..

26 जनवरी 2012 को 8:10 pm
vikram7 ने कहा…

पत्थरों के सीने पर
फूटने लगती हैं कोंपलें
वादियों में ध्वनित होने लगता है संगीत
बस,
प्रेम अंकुरित हो जाता है
आदरणीय तिवारी जी
प्रेम की सही व्याख्या की है आपनें इस रचना के माध्यम से
गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें

26 जनवरी 2012 को 11:22 pm

पत्थरों के सीने पर
फूटने लगती हैं कोंपलें
वादियों में ध्वनित होने लगता है संगीत
बस,
प्रेम अंकुरित हो जाता है

वाह ..बहुत सुन्दर भाव ...

28 जनवरी 2012 को 6:35 pm

कल 14/02/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

13 फ़रवरी 2012 को 3:57 pm
Anupama Tripathi ने कहा…

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति ...!!

14 फ़रवरी 2012 को 7:04 am
Swati Vallabha Raj ने कहा…

प्रेम चहुँ ओर व्याप्त है...बस तबियत भरी नजर की जरुरत है महसूस करने की..सुन्दर रचना...

14 फ़रवरी 2012 को 8:04 am
Madhuresh ने कहा…

पत्थरों के सीने पर
फूटने लगती हैं कोंपलें...
बहुत ही अच्छे से परिभाषित किया है आपने प्रेम को,
सुन्दर अभिव्यक्ति!

14 फ़रवरी 2012 को 8:23 am
Sadhana Vaid ने कहा…

बहुत ही खूबसूरत एवं मौलिक प्रस्तुति ! बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति ! बधाई आपको !

14 फ़रवरी 2012 को 9:08 am

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति ।

14 फ़रवरी 2012 को 12:16 pm
Reena Maurya ने कहा…

वाह |||
बहुत ही सुन्दर.
बेहतरीन भावाभिव्यक्ति है....:-)....

14 फ़रवरी 2012 को 3:27 pm