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कविता : तुम्हारे शब्दों से बुनी दुनिया में

गुरुवार, 5 जनवरी 2012

नये साल की पूर्व रात्रि, जो भी मन में था उसे निम्न पंक्तियों के माध्यम से आप सभी तक पहुँचा रहा हूँ।

तुम्हारे,शब्द मुझे व्यापार से लगते हैं
अक्सर चढ़े हुए
या गिरे-गिरे से
और हरबार
तुम आदमी का मोल-भाव करते नज़र आते हो

तुम्हारे,
शब्द गंधाते हैं मेरी साँसों में
ताजे माँस की तरह
जैसे अभी-अभी किसीने मछली को चीरा हो
हंसिये के सहारे
और तौल दिया हो
जरूरतों को रुपये में बदलते हुए
तुम अपने शब्दों से जाल बुनते नज़र आते हो

तुम्हारे,
शब्द खट्टाते हैं मुँह में
पीले-पीले केलों की तरह
जिन्हें समय से पूर्व ही पकाया गया हो कार्बाइड से
तुम्हें बड़ी होती लड़कियाँ
लगती हैं केले की भारियों की तरह
तुम्हारी आँखों का पीलापन बढ़ता जाता है
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 31-दिसम्बर-2011 / समय : 10:50 रात्रि / घर

10 टिप्पणियाँ

Sunil Kumar ने कहा…

सुंदर शब्दों के संयोजन से रची रचना अच्छी लगी आभार

5 जनवरी 2012 को 7:10 am

काश कृत्रिमता सहजता को राह दे।

5 जनवरी 2012 को 8:14 am
M VERMA ने कहा…

सुन्दर बिम्बात्मक और शब्दात्मक रचना

5 जनवरी 2012 को 9:34 am
kshama ने कहा…

Aksar log aise hee hote hain!
Naya saal bahut mubarak ho!

5 जनवरी 2012 को 4:09 pm
shama ने कहा…

आपके शब्दों में दुनिया बोल पड़ी है ! अनेक बिम्ब उभरे हैं--स्पष्ट होकर; समय को अभिव्यक्त करते हुए... चिंतन को ढोते हुए ! हर टुकडा दृष्टि देता-सा आई-सर्जन लगता है !!
अति-उत्तम ! सप्रीत--आ.

11 जनवरी 2012 को 4:11 pm
Pradeep ने कहा…

मुकेश जी नमस्ते !
समाज के स्वार्थपरक सरोकार और आंतरिक दीनता को शब्दों में खूब पिरोया है आपने ...
मकर सक्रांति पर्व की अग्रिम शुभकामनाएं ... प्रदीप

11 जनवरी 2012 को 7:10 pm
singhSDM ने कहा…

प्रिय मुकेश जी
रचना के माध्यम से पता चला की कवि की सोच कहाँ तक जा सकती है.... शब्दों को महसूस करना, उनका स्वाद चखना कोई साधारण व्यक्ति नहीं कर सकता. अच्छी रचना.

23 जनवरी 2012 को 11:47 am

आप सभी सुधिजनों का धन्यवाद।

सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

25 जनवरी 2012 को 5:07 pm
गुंजन ने कहा…

bhai,

achhi rachanaa hai.

jitenra

25 जनवरी 2012 को 5:13 pm