आग / पानी / हवा /
मिट्टी और आकाश से ड़रने के बाद
जब आदमी आदिम से अवतरित हो रहा होगा
तब कल्पना ने अपनी पैठ बनायी होगी
आकाश के पार
स्वर्ग और नर्क की रचना के बाद
वैतरणी अवतरित हुई होगी
गरूड़ पुराण के साथ
वैतरणी,
धरती पर जीवन के बाद की
सबसे बड़ी अवधारणा रही होगी
जिसे समझ के विकसित होने की प्रक्रिया में
और भी ज्यादा
भयावह बनाया होगा क्रमशः
कोई भी अनुसंधान लक्षित नही कर पाया
क्या वाकई वैतरणी जैसी कोई नदी भी है?
या हम यूँ ही ड़र रहे हैं?
जबसे,
बच्चे पैदा होने लगे हैं
चूजों की तरह प्रयोगशालाओं में अपने मनमाकिफ़ /
या कपास सीधे ही पहना जाने लगा है फ़ाहों की तरह /
या आदमी हो आया है चाँद पर
और समझने लगा है
हकीकत और कल्पना में भेद
कि स्वर्ग और नर्क जो भी यहीं हैं
पृथ्वी पर
तब से वैतरणी सिमट आयी है आकार में
ढ़ाई बाय पाँच या तीन बाय साढ़े पाँच के टेबल टॉप के बराबर
और आदमी जिन्दा ही
टेबल के इस पार से उस पार की यात्रा में
महसूस करता है
वैतरणी पार करने के सारे सुःख (दुःख मैं कहना नही चाहता)
अकेला ही /
किसी भी कीमत पर
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 20-अगस्त-2010 / समय : 05:30 सुबह / घर
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12 टिप्पणियाँ
बहुत सुन्दर भाव पंडित जी ...बढ़िया प्रस्तुति....आभार
31 अगस्त 2010 7:26 pmबहुत उम्दा अभिव्यक्ति!
31 अगस्त 2010 8:12 pmतिवारीजी,
31 अगस्त 2010 8:48 pmअत्यंत सारगर्भित रचना ! बहुत कुछ कहती हुई ! आपने एक विराट सत्ता को 'टेबल के इस पार, उस पार' लाकर रख दिया है ! अभी और मनन करना शेष है !
सप्रीत--आ.
Hun! Pata nahi hame kin kin baaton se satark rahna chahiye? Itni baaten hain ki shayad ab dar lagna band ho gaya hai!
31 अगस्त 2010 9:33 pmवैतरणी,
31 अगस्त 2010 11:10 pmधरती पर जीवन के बाद की
सबसे बड़ी अवधारणा रही होगी
जिसे समझ के विकसित होने की प्रक्रिया में
और भी ज्यादा
भयावह बनाया होगा क्रमशः
कोई भी अनुसंधान लक्षित नही कर पाया
क्या वाकई वैतरणी जैसी कोई नदी भी है?
या हम यूँ ही ड़र रहे हैं?
ati sundar rachana,
बड़े ही सुन्दर और नये भाव।
1 सितम्बर 2010 6:25 amबेहतरीन रचना.... बहुत दिनों बाद इतनी बेहतरीन कविता पढने के लिए मिली.... बहुत-बहुत धन्यवाद!
1 सितम्बर 2010 10:16 amबेहतरीन , नन्हा सा डर भी भूत होता है , आदमी को सही राह चलाने के लिये वैतरणी का डर दिखाया जाता होगा ।
1 सितम्बर 2010 12:55 pmबहुत सही अभिव्यक्ति ..कुछ इस तरह की रचना मैंने भी लिखी थी ..सचाई है इन पंक्तियों में ...बेहद पसंद आई यह ..शुक्रिया
1 सितम्बर 2010 5:10 pmया आदमी हो आया है चाँद पर
3 सितम्बर 2010 12:23 pmऔर समझने लगा है
हकीकत और कल्पना में भेद
कि स्वर्ग और नर्क जो भी यहीं हैं
पृथ्वी पर
बहुत वैचारिक भाव लिए रचना ....उम्दा प्रस्तुति
वैतरणी के बिम्ब मे बहुत कुछ कह गये आप ।
8 सितम्बर 2010 10:52 pmयहां तो पूरी कायनात मुट्ठी में हो गयी!
11 सितम्बर 2010 6:43 pmएक टिप्पणी भेजें