कविता : वैतरणी के पार

मंगलवार, 31 अगस्त 2010

आग / पानी / हवा /
मिट्टी और आकाश से ड़रने के बाद
जब आदमी आदिम से अवतरित हो रहा होगा
तब कल्पना ने अपनी पैठ बनायी होगी
आकाश के पार
स्वर्ग और नर्क की रचना के बाद
वैतरणी अवतरित हुई होगी
गरूड़ पुराण के साथ


वैतरणी,
धरती पर जीवन के बाद की
सबसे बड़ी अवधारणा रही होगी
जिसे समझ के विकसित होने की प्रक्रिया में
और भी ज्यादा
भयावह बनाया होगा क्रमशः
कोई भी अनुसंधान लक्षित नही कर पाया
क्या वाकई वैतरणी जैसी कोई नदी भी है?
या हम यूँ ही ड़र रहे हैं?


जबसे,
बच्चे पैदा होने लगे हैं
चूजों की तरह प्रयोगशालाओं में अपने मनमाकिफ़ /
या कपास सीधे ही पहना जाने लगा है फ़ाहों की तरह /
या आदमी हो आया है चाँद पर
और समझने लगा है
हकीकत और कल्पना में भेद
कि स्वर्ग और नर्क जो भी यहीं हैं
पृथ्वी पर
तब से वैतरणी सिमट आयी है आकार में
ढ़ाई बाय पाँच या तीन बाय साढ़े पाँच के टेबल टॉप के बराबर
और आदमी जिन्दा ही
टेबल के इस पार से उस पार की यात्रा में
महसूस करता है
वैतरणी पार करने के सारे सुःख (दुःख मैं कहना नही चाहता)
अकेला ही /
किसी भी कीमत पर
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 20-अगस्त-2010 / समय : 05:30 सुबह / घर

12 टिप्पणियाँ

बहुत सुन्दर भाव पंडित जी ...बढ़िया प्रस्तुति....आभार

31 अगस्त 2010 7:26 pm
Udan Tashtari ने कहा…

बहुत उम्दा अभिव्यक्ति!

31 अगस्त 2010 8:12 pm

तिवारीजी,
अत्यंत सारगर्भित रचना ! बहुत कुछ कहती हुई ! आपने एक विराट सत्ता को 'टेबल के इस पार, उस पार' लाकर रख दिया है ! अभी और मनन करना शेष है !
सप्रीत--आ.

31 अगस्त 2010 8:48 pm
kshama ने कहा…

Hun! Pata nahi hame kin kin baaton se satark rahna chahiye? Itni baaten hain ki shayad ab dar lagna band ho gaya hai!

31 अगस्त 2010 9:33 pm
vikram7 ने कहा…

वैतरणी,
धरती पर जीवन के बाद की
सबसे बड़ी अवधारणा रही होगी
जिसे समझ के विकसित होने की प्रक्रिया में
और भी ज्यादा
भयावह बनाया होगा क्रमशः
कोई भी अनुसंधान लक्षित नही कर पाया
क्या वाकई वैतरणी जैसी कोई नदी भी है?
या हम यूँ ही ड़र रहे हैं?
ati sundar rachana,

31 अगस्त 2010 11:10 pm

बड़े ही सुन्दर और नये भाव।

1 सितम्बर 2010 6:25 am
Shah Nawaz ने कहा…

बेहतरीन रचना.... बहुत दिनों बाद इतनी बेहतरीन कविता पढने के लिए मिली.... बहुत-बहुत धन्यवाद!

1 सितम्बर 2010 10:16 am
शारदा अरोरा ने कहा…

बेहतरीन , नन्हा सा डर भी भूत होता है , आदमी को सही राह चलाने के लिये वैतरणी का डर दिखाया जाता होगा ।

1 सितम्बर 2010 12:55 pm

बहुत सही अभिव्यक्ति ..कुछ इस तरह की रचना मैंने भी लिखी थी ..सचाई है इन पंक्तियों में ...बेहद पसंद आई यह ..शुक्रिया

1 सितम्बर 2010 5:10 pm

या आदमी हो आया है चाँद पर
और समझने लगा है
हकीकत और कल्पना में भेद
कि स्वर्ग और नर्क जो भी यहीं हैं
पृथ्वी पर

बहुत वैचारिक भाव लिए रचना ....उम्दा प्रस्तुति

3 सितम्बर 2010 12:23 pm
शरद कोकास ने कहा…

वैतरणी के बिम्ब मे बहुत कुछ कह गये आप ।

8 सितम्बर 2010 10:52 pm
अनूप शुक्ल ने कहा…

यहां तो पूरी कायनात मुट्ठी में हो गयी!

11 सितम्बर 2010 6:43 pm