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कविता : रात नही होती तो

बुधवार, 18 अगस्त 2010

मुझे,

यह लगता है कि
रात नही होती तो
मैं,
दिन को खींचकर लम्बा कर लेता
शाम के मुहाने से
और खो जाता कहीं उस भीड़ में
जो, घर से निकलती तो है
और लौटने के पहले
बदल जाती है कहानियों में
घर के मुहाने पर

मुझे,

यह लगता है कि
रात नही होती तो
मैं,
कैद कर लेता सपनों को पलकों में
आँसुओं में बदलने से पहले
और ढ़ल जाता किसी गीत में
जिसे गुनगुनाया जा सकता है
मौन रहकर भी
और जिसकी अनुगूंज को किया जा सकता हो महसूस
दीवारों पर दरार बनाते हुये
जिनके पार दुनिया को देखा जा सकता है
बिना किसी चष्में के
------------------------------
मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 17-अगस्त-2010 / समय : 10:17 साँय / ऑफिस

18 टिप्पणियाँ

M VERMA ने कहा…

मुझे,
यह लगता है कि
------------
मुझे,

यह लगता है कि
रात नही होती तो
मैं,
कैद कर लेता सपनों को पलकों में

सपनो को कैद करने का यह अन्दाज अच्छा लगा

18 अगस्त 2010 को 4:38 pm
kshama ने कहा…

Wah! Kitna anootha khayal hai!
Mai sochane lagi,ki,mai kya karti? Ek zamana tha,jab itne chhand the,ki,din chhota padta! Lagta 24 ke badle 48 ghanton ka din ho!
Aur ab lagta hai,dinme taare ginne padenge!

18 अगस्त 2010 को 4:44 pm
Patali-The-Village ने कहा…

कविता अच्छी लगी धन्यवाद्|

18 अगस्त 2010 को 4:46 pm

बहुत दिनों बाद आपका लिखा पढ़ा मुकेश जी ..बहुत बेहतरीन लिखते हैं आप हमेशा की तरह

18 अगस्त 2010 को 5:53 pm

रात कितने गहरे रहस्य छिपा ले जाती है जीवन के।

18 अगस्त 2010 को 7:33 pm
मनोज कुमार ने कहा…

गहरे भाव लिए उम्दा प्रस्तुति।

18 अगस्त 2010 को 9:22 pm
कामरूप 'काम' ने कहा…

नमस्कार,

हिन्दी ब्लॉगिंग के पास आज सब कुछ है, केवल एक कमी है, Erotica (काम साहित्य) का कोई ब्लॉग नहीं है, अपनी सीमित योग्यता से इस कमी को दूर करने का क्षुद्र प्रयास किया है मैंने, अपने ब्लॉग बस काम ही काम... Erotica in Hindi. के माध्यम से।

समय मिले और मूड करे तो अवश्य देखियेगा:-

टिल्लू की मम्मी

टिल्लू की मम्मी ९२)

18 अगस्त 2010 को 9:23 pm
Akhtar Khan Akela ने कहा…

bhaayi jaan raat nhin hoti to
subh kiyaa he iskaa mzaa naa hotaa .
raat naa hoti to
spne kyaa hen hm kese jaan paate
raat naa hoti to andhere kyaa hen kese ptaa chltaa raat naa hoti to bijli kaa khrchaa nhin hotaa or raat naa hoti to vishv ki jnsnkhyaa aadhi se bhi aadhi hoti mzaaq ke liyen maafi chaahtaa hun aapkaa flsfaa or alfaaz bhut khub bdhaayi ho, akhtar khan akela kota rajsthan

18 अगस्त 2010 को 9:30 pm

आप की रचना 20 अगस्त, शुक्रवार के चर्चा मंच के लिए ली जा रही है, कृप्या नीचे दिए लिंक पर आ कर अपने सुझाव देकर हमें प्रोत्साहित करें.
http://charchamanch.blogspot.com

आभार

अनामिका

19 अगस्त 2010 को 10:53 pm

मैं,
दिन को खींचकर लम्बा कर लेता
शाम के मुहाने से
और खो जाता कहीं उस भीड़ में
जो, घर से निकलती तो है
और लौटने के पहले
बदल जाती है कहानियों में
घर के मुहाने पर


बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति ....पर लोग रात को कभी कभी रात नहीं समझते ..सोच में ही डूबे रहते हैं ..

20 अगस्त 2010 को 1:02 am
ALOK KHARE ने कहा…
रंजना ने कहा…

एकाकीपन की पीड़ा को क्या खूब बयान किया है आपने...
उजाले का जाल,स्मृतियों को कहीं छुपने को बाध्य कर देता है...पर रात का अँधेरा.... दर्द, आंसू और यादों के हथियार ले धावा बोल देता है...

सचमुच रात न हो तो सपनों को पलकों में बड़े आराम से कैद किया जा सकता है...

20 अगस्त 2010 को 4:20 pm

आप सभी का धन्यवाद!

टिप्पणियाँ लिखने की और नया कुछ करने की प्रेरणा देती हैं।

सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

24 अगस्त 2010 को 8:12 pm
vikram7 ने कहा…

मैं,
कैद कर लेता सपनों को पलकों में
आँसुओं में बदलने से पहले
और ढ़ल जाता किसी गीत में
जिसे गुनगुनाया जा सकता है
मौन रहकर भी
और जिसकी अनुगूंज को किया जा सकता हो महसूस
दीवारों पर दरार बनाते हुये
जिनके पार दुनिया को देखा जा सकता है
बिना किसी चष्में के
बेहतरीन कविता

27 अगस्त 2010 को 7:10 pm
kshama ने कहा…

Bikhare Sitare blog pe apka shukriya ada kiya hai...zaroor gaur farmayen!

27 अगस्त 2010 को 9:13 pm