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गज़ल : कोई मुझसा ही मुझे ढूंढता होगा

शनिवार, 11 सितंबर 2010

आईना खुदही हैरां होता होगा
वो मुझे जब भी देखता होगा

शक्ल गुम हो गई हैं कहीं भीड़ में
कोई मुझसा ही, मुझे ढूंढता होगा

दफ़न होता रहा जो हर करवट पे
सलवटों में दर्ज फसाना पढ़ता होगा

ढल चुकी ख्वाब में दिन की नाकामियाँ
सोते हुये मेरे साथ कोई जागता होगा

वुजूद गुम हो गया है गर्दिश में
अजायब सा जहाँ मुझे देखता होगा
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : ०३-अगस्त-२०१० / समय : ०५:५० सायँ / घर

7 टिप्पणियाँ

अनूप शुक्ल ने कहा…

अरे वाह! आप तो गजल भी लिखने लगे।
आइने पर एक शेर याद आया:
साफ़ आइनों में चेहरे भी नजर आते हैं साफ़
धुंधला चेहरा हो तो आइना भी धुंधला चाहिये

11 सितंबर 2010 को 6:40 pm

शक्ल गुम हो गई हैं कहीं भीड़ में
कोई मुझसा ही, मुझे ढूंढता होगा

बहुत सही कहा है ..सुन्दर गज़ल .

11 सितंबर 2010 को 6:52 pm

बढिया गजल पंडित जी ....
गणेश चतुर्थी पर्व पर हार्दिक शुभकामनाये....

11 सितंबर 2010 को 8:17 pm
मनोज कुमार ने कहा…

बहुत अच्छी ग़ज़ल!
आप की इस ग़ज़ल में विचार, अभिव्यक्ति शैली-शिल्प और संप्रेषण के अनेक नूतन क्षितिज उद्घाटित हो रहे हैं।

आपको और आपके परिवार को तीज, गणेश चतुर्थी और ईद की हार्दिक शुभकामनाएं!
फ़ुरसत से फ़ुरसत में … अमृता प्रीतम जी की आत्मकथा, “मनोज” पर, मनोज कुमार की प्रस्तुति पढिए!

11 सितंबर 2010 को 9:30 pm

अच्छी कही तिवारीजी : 'आईना खुद ही हैराँ होता होगा...' आईने का यह आश्चर्य बहुत कुछ कहता है !... भीड़ में गुम हुए शक्ल को तलाशती मुझ-सी ही कोई शक्ल में अपने अक्स ढूंढ़ता रह गया बंधु !!.....

पूरी ग़ज़ल लाज़वाब !
सप्रीत--आ.

12 सितंबर 2010 को 6:14 pm

वाह, मुझसा मुझे, मुझ से छीन लेगा।

12 सितंबर 2010 को 7:51 pm