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शब्दों की तलाश में

शुक्रवार, 17 जुलाई 2009

मैं,
नही चाहता कि
तुम किसी दिन भूल जाओ
अपना नाम भी
और गुमसुम बैठी रहो ताकते शून्य में
और चेहरे पर उभर आयें आंसुओं की लकीरें

किसी,
प्रश्‍न के जवाब में
तुम्हें तलाशने हो शब्द
फिर थक-हार चुप बैठ जाना हो
या बड़ी देर बाद कुछ कहो
और,
किसी प्रतिप्रश्‍न के जवाब में सुबकते हुये
थमी नज़रों से देखो मेरी ओर
फिर दीवारों पर पढती रहो खबरें
या फर्श पर देखती रहो आसमान

मैं,
नही चाहता कि
तुम अब तलाश की शुरूआत करो
खोजो गुम हो आये शब्दों को
परदों पर लिखो इबारतें
या किसी उलझी हुई कॅसेट को सुलझाते हुये
गुजार दो पूरा दिन
और आईने से खुद का पता पूछती रहो
-----------------------------------------------------
मुकेश कुमार तिवारी
दिनांक : ११-जुलाई-२००९ / समय : १२:३८ रात्रि / घर

21 टिप्पणियाँ

श्यामल सुमन ने कहा…

या फर्श पर देखती रहो आसमान - बहुत खूब मुकेश भाई। चलते हैं हम भी आईना से अपना पता पूछते हैं।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

17 जुलाई 2009 को 6:50 pm
raj ने कहा…

shabdo ka khoobsurat estemal kiya hai...sunder or emotions se bhari pyari kavita....

17 जुलाई 2009 को 7:08 pm
अनिल कान्त : ने कहा…

आप बहुत अच्छा लिखते हैं....बहुत अच्छा

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

17 जुलाई 2009 को 7:46 pm
mehek ने कहा…
ओम आर्य ने कहा…

बेजोड रचना अतिसुन्दर .......उपमा उपमेय लाज़बाव.....बधाई

17 जुलाई 2009 को 9:56 pm
M VERMA ने कहा…

या किसी उलझी हुई कॅसेट को सुलझाते हुये
गुजार दो पूरा दिन
और आईने से खुद का पता पूछती रहो
===
बेजोड

17 जुलाई 2009 को 10:14 pm
‘नज़र’ ने कहा…

बहुत ही उम्दा काव्याभिव्यक्ति!

17 जुलाई 2009 को 11:41 pm

एक अच्छी कविता मुकेश जी...मगर थोड़ी-सी अधुरी लगी। थोड़ी सी और बढ़ायी जा सकती थी, है...
अन्यथा नही लेंगे, इस आशा में!

18 जुलाई 2009 को 10:00 am

और आईने से खुद का पता पूछती रहो

खुद को तलाशते रहे खुद में ही ..
आईने में अक्स भी तब अजनबी सा लगा ....सुन्दर अभिव्यक्ति मुकेश जी ..

18 जुलाई 2009 को 10:25 am

कुछ सजीव से ख्याल पास से गुजर गए,
बहुत स्नेहिल भावनाओं से भरी हुई रचना.......

18 जुलाई 2009 को 1:17 pm
vikram7 ने कहा…

अति सुन्दर

18 जुलाई 2009 को 1:50 pm

पता नहीं डेमेंशिया (Dementia) से बहुत भय लगता है।

18 जुलाई 2009 को 7:11 pm
गुंजन ने कहा…

Bhai,

Gambheer aur Marmik rachana.

"Gunjan" ki aur se Badhai.

Jeetendra Chauhan

19 जुलाई 2009 को 8:47 pm
Mumukshh Ki Rachanain ने कहा…

'नहीं चाहते' तो बहुत कुछ कह गई, पर चाहत भी तो मालूम पड़े...............
सुन्दर प्रस्तुति.

चन्द्र मोहन गुप्त

19 जुलाई 2009 को 9:40 pm
Babli ने कहा…

बहुत ही सुंदर और लाजवाब रचना लिखा है आपने! इस बेहतरीन रचना के लिए बधाई!

20 जुलाई 2009 को 9:54 am

मैं,
नही चाहता कि
तुम अब तलाश की शुरूआत करो
खोजो गुम हो आये शब्दों को
परदों पर लिखो इबारतें

सच कहा कभी कभी इंसान भूल जाता है अपना नाम........... गहरे तक छु गयी आपकी रचना , सार्थक अध्बुध

20 जुलाई 2009 को 2:19 pm
Nirmla Kapila ने कहा…

या किसी उलझी हुई कॅसेट को सुलझाते हुये
गुजार दो पूरा दिन
और आईने से खुद का पता पूछती रहो
बहुत ही भावमय अभिव्यक्ति हैशब्दों का संयोजन बहुत बडिया है आभार्

20 जुलाई 2009 को 2:54 pm
ARUNA ने कहा…

बहुत ही खूबसूरती से शब्दों का प्रयोग करके आपने इस कविता में जान दाल दी मुकेश जी! लाजवाब है!

20 जुलाई 2009 को 9:03 pm

मुकेश कुमार तिवारी जी!
शब्द-चित्रों ने मन मोह लिया।
बहुत बढ़िया।
बधाई।

21 जुलाई 2009 को 8:50 am
Prem Farrukhabadi ने कहा…

मैं,
नही चाहता कि
तुम अब तलाश की शुरूआत करो
खोजो गुम हो आये शब्दों को
परदों पर लिखो इबारतें
या किसी उलझी हुई कॅसेट को सुलझाते हुये
गुजार दो पूरा दिन
और आईने से खुद का पता पूछती रहो

Tiwari ji
bahut hi sundar!!

22 जुलाई 2009 को 4:20 pm