मैं,
नही चाहता कि
तुम किसी दिन भूल जाओ
अपना नाम भी
और गुमसुम बैठी रहो ताकते शून्य में
और चेहरे पर उभर आयें आंसुओं की लकीरें
किसी,
प्रश्न के जवाब में
तुम्हें तलाशने हो शब्द
फिर थक-हार चुप बैठ जाना हो
या बड़ी देर बाद कुछ कहो
और,
किसी प्रतिप्रश्न के जवाब में सुबकते हुये
थमी नज़रों से देखो मेरी ओर
फिर दीवारों पर पढती रहो खबरें
या फर्श पर देखती रहो आसमान
मैं,
नही चाहता कि
तुम अब तलाश की शुरूआत करो
खोजो गुम हो आये शब्दों को
परदों पर लिखो इबारतें
या किसी उलझी हुई कॅसेट को सुलझाते हुये
गुजार दो पूरा दिन
और आईने से खुद का पता पूछती रहो
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनांक : ११-जुलाई-२००९ / समय : १२:३८ रात्रि / घर
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21 टिप्पणियाँ
या फर्श पर देखती रहो आसमान - बहुत खूब मुकेश भाई। चलते हैं हम भी आईना से अपना पता पूछते हैं।
१७ जुलाई २००९ ६:५० PMसादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com
shabdo ka khoobsurat estemal kiya hai...sunder or emotions se bhari pyari kavita....
१७ जुलाई २००९ ७:०८ PMआप बहुत अच्छा लिखते हैं....बहुत अच्छा
१७ जुलाई २००९ ७:४६ PMमेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति
अद्भुत....
१७ जुलाई २००९ ८:२५ PMbahut sunder
१७ जुलाई २००९ ९:३२ PMबेजोड रचना अतिसुन्दर .......उपमा उपमेय लाज़बाव.....बधाई
१७ जुलाई २००९ ९:५६ PMया किसी उलझी हुई कॅसेट को सुलझाते हुये
१७ जुलाई २००९ १०:१४ PMगुजार दो पूरा दिन
और आईने से खुद का पता पूछती रहो
===
बेजोड
बहुत ही उम्दा काव्याभिव्यक्ति!
१७ जुलाई २००९ ११:४१ PMएक अच्छी कविता मुकेश जी...मगर थोड़ी-सी अधुरी लगी। थोड़ी सी और बढ़ायी जा सकती थी, है...
१८ जुलाई २००९ १०:०० AMअन्यथा नही लेंगे, इस आशा में!
और आईने से खुद का पता पूछती रहो
१८ जुलाई २००९ १०:२५ AMखुद को तलाशते रहे खुद में ही ..
आईने में अक्स भी तब अजनबी सा लगा ....सुन्दर अभिव्यक्ति मुकेश जी ..
कुछ सजीव से ख्याल पास से गुजर गए,
१८ जुलाई २००९ १:१७ PMबहुत स्नेहिल भावनाओं से भरी हुई रचना.......
अति सुन्दर
१८ जुलाई २००९ १:५० PMपता नहीं डेमेंशिया (Dementia) से बहुत भय लगता है।
१८ जुलाई २००९ ७:११ PMBhai,
१९ जुलाई २००९ ८:४७ PMGambheer aur Marmik rachana.
"Gunjan" ki aur se Badhai.
Jeetendra Chauhan
'नहीं चाहते' तो बहुत कुछ कह गई, पर चाहत भी तो मालूम पड़े...............
१९ जुलाई २००९ ९:४० PMसुन्दर प्रस्तुति.
चन्द्र मोहन गुप्त
बहुत ही सुंदर और लाजवाब रचना लिखा है आपने! इस बेहतरीन रचना के लिए बधाई!
२० जुलाई २००९ ९:५४ AMमैं,
२० जुलाई २००९ २:१९ PMनही चाहता कि
तुम अब तलाश की शुरूआत करो
खोजो गुम हो आये शब्दों को
परदों पर लिखो इबारतें
सच कहा कभी कभी इंसान भूल जाता है अपना नाम........... गहरे तक छु गयी आपकी रचना , सार्थक अध्बुध
या किसी उलझी हुई कॅसेट को सुलझाते हुये
२० जुलाई २००९ २:५४ PMगुजार दो पूरा दिन
और आईने से खुद का पता पूछती रहो
बहुत ही भावमय अभिव्यक्ति हैशब्दों का संयोजन बहुत बडिया है आभार्
बहुत ही खूबसूरती से शब्दों का प्रयोग करके आपने इस कविता में जान दाल दी मुकेश जी! लाजवाब है!
२० जुलाई २००९ ९:०३ PMमुकेश कुमार तिवारी जी!
२१ जुलाई २००९ ८:५० AMशब्द-चित्रों ने मन मोह लिया।
बहुत बढ़िया।
बधाई।
मैं,
२२ जुलाई २००९ ४:२० PMनही चाहता कि
तुम अब तलाश की शुरूआत करो
खोजो गुम हो आये शब्दों को
परदों पर लिखो इबारतें
या किसी उलझी हुई कॅसेट को सुलझाते हुये
गुजार दो पूरा दिन
और आईने से खुद का पता पूछती रहो
Tiwari ji
bahut hi sundar!!
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