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मकां को कभी घर बनाया होता

शनिवार, 11 जुलाई 2009

यह मैं भली भांति जानता हुँ, कि मेरे शौक में अकविता-कविता लिखना रहा है। धीरे-धीरे अंतरजाल पर गज़अलों को पढते हुये और गुरूजी श्री पंकज सुबीर सा. की कक्षाओं से जो कुछ सीखा उसे आजमाने की कोशिश की है।

आप सभी के विचार / सुझाव चाहूँगा।

सादर,


मुकेश कुमार तिवारी

मकां को कभी घर बनाया होता
हौले से कभी हाथ दबाया होता

बदली सा बरस जाता मुसल्सल
भूले से कभी ख्वाबों में बुलाया होता

बोझिल सी दुपहर में कुछ पल साथ होते
हाल-ए-दिल सुनके कुछ अपना सुनाया होता

अल्फा़जों की भी कोई हद होती है
यह फलसफ़ा कभी आँखों से पढ़ाया होता

स्याह रातों का मुकद्दर ना देखो
आफ़्ताब कभी हाथों में उगाया होता

खुश्बू तेरा भी जिक्र करती बहार से
जो कभी बाग खिजां में लगाया होता

शब़नम की नमी लेकर सहरा की धूप में
वो शख्स कभी पसीने में नहाया होता
----------------------------

22 टिप्पणियाँ

ओम आर्य ने कहा…

bahut hi sundar ......kya kahe .......waah waah .....bahut hi sundar hai ek ek panktiyan

11 जुलाई 2009 को 2:42 pm
raj ने कहा…

shyah rato ka mukaadar dekho.aftaab koee hath me ugaya hota.....nice one...

11 जुलाई 2009 को 2:56 pm

wah ji wah.
ye andaaz bhi niralaa he aapka.
ab gazalo ke vyakaran ka paarkhi nahi hoo me, ye to vo jaane jinhe gazal ki gahraaiya pataa ho, mujhe to maza aayaa. aour bas ras hi lena jaantaa hoo, kaanto ki daali par lage foolo se.

bahut khoob.

11 जुलाई 2009 को 3:20 pm

अल्फा़जों की भी कोई हद होती है
यह फलसफ़ा कभी आँखों से पढ़ाया होता

वाह बहुत खूब .. आपका यह अंदाज़ भी खूब भाया ...शुक्रिया

11 जुलाई 2009 को 3:48 pm
मीत ने कहा…

अल्फा़जों की भी कोई हद होती है
यह फलसफ़ा कभी आँखों से पढ़ाया होता

behtareen.

11 जुलाई 2009 को 3:54 pm
vandana ने कहा…

bahut hi shandaar.........har sher lajawaab

11 जुलाई 2009 को 4:54 pm

शब़नम की नमी लेकर सहरा की धूप में
वो शख्स कभी पसीने में नहाया होता

Lajawaab likha hai aapne .... vaise to man ke bhaavon ko vyakt karna hi likhna hai ...... rahi shilp ki baat vo jo bhi hai... aa hi jata hai

11 जुलाई 2009 को 6:16 pm

ओह, कविता में भाव जो हैं शब्दों में संतृप्त हो कर भरे हैं।
गज़ल शायद शब्दों के किफायती प्रयोग कर अभिव्यक्ति की विधा है!

11 जुलाई 2009 को 6:30 pm

बहुत ही उच्चस्तरीय भाव ...

11 जुलाई 2009 को 10:21 pm
मथुरा कलौनी ने कहा…

मुकेश जी

कविता सीधे दिल में उतर गई। बधाई।

11 जुलाई 2009 को 11:43 pm

बहुत सुन्दर भावः गहरी बात कम शब्द आपने गज़ब कर दिया तिवारी जी
बहुत बहुत बधाई

12 जुलाई 2009 को 3:15 pm
गुंजन ने कहा…

Wah!

welcome to world of Gunjan.

12 जुलाई 2009 को 4:13 pm
Prem Farrukhabadi ने कहा…

बदली सा बरस जाता मुसल्सल
भूले से कभी ख्वाबों में बुलाया होता

bahut sundar!!!!!

13 जुलाई 2009 को 9:10 am
Babli ने कहा…

हर एक पंक्तियाँ आपने इतनी खूबसूरती से लिखा है कि कहने के लिए अल्फाज़ कम पर गए !

13 जुलाई 2009 को 11:55 am
MUFLIS ने कहा…

हुज़ूर ....
आप की कविता अकविता सब आप के
मन के गहरे खयालात का इज़हार ही होता है
अन्दर की सोच से अल्फाज़ उपजते हैं और उन
लफ्जों को तरतीब देने में कुछ न कुछ ख़याल तो
रखना ही पड़ता है .....
कोशिश बहुत अच्छी है ,,,,
गुरुवर की उगली थामे रहिये ,,,,
सब कुछ अच्छा ...और अचा होता चला जायेगा

शुभकामनाएं
---मुफलिस---

13 जुलाई 2009 को 6:44 pm
hem pandey ने कहा…

वैसे तो प्रशंसा करने के लिए एक पंक्ति ही काफी है-
मकां को कभी घर बनाया होता

लेकिन और भी जोड़ना चाहूंगा -
अल्फाजों की भी हद होती है.
यह फलसफा कभी आँखों से पढाया होता

13 जुलाई 2009 को 8:30 pm
भूतनाथ ने कहा…

बहुत ही अच्छा लगा आपका ब्लॉग.....और अत्यंत ही उम्दा आपकी रचनाएं....सच....!!

13 जुलाई 2009 को 10:06 pm
RC ने कहा…

अल्फा़जों की भी कोई हद होती है
यह फलसफ़ा कभी आँखों से पढ़ाया होता

शब़नम की नमी लेकर सहरा की धूप में
वो शख्स कभी पसीने में नहाया होता

13 जुलाई 2009 को 10:21 pm
‘नज़र’ ने कहा…

भावनाएँ बहुत ख़ूबसूरत हैं
---

14 जुलाई 2009 को 12:09 am
M.A.Sharma "सेहर" ने कहा…

अल्फा़जों की भी कोई हद होती है
यह फलसफ़ा कभी आँखों से पढ़ाया होता

कितनी रूमानियत से लिख दिया
बहुत सुन्दर !!

14 जुलाई 2009 को 1:44 pm
neera ने कहा…

बहूत सुंदर! पहली बार आई हूँ अब अक्सर आउंगी....

14 जुलाई 2009 को 2:50 pm
manu ने कहा…

बहुत-बहुत सुंदर प्रयास है...
अच्छे भाव ..
धीरे धीरे ले ही लेंगे गजल का रूप...
बहुत अच्छा लगा पढ़ कर..

26 जुलाई 2009 को 8:58 am