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मकान में कैद घर

शनिवार, 20 जून 2009

दीवारों से घिरी चौहद्दी, जिसके ऊपर छत भी होती है एक मकान की शक्ल इख्तियार कर लेती है। जिसके तले सपने बुने जाते हैं.... तामीर होते हैं...... पराये अपने हो जाते हैं......परिवार बढता है......बचपन चहकता है......जवानी आती है......यह एक अदद मकान क्रमशः घर में बदल जाता है।

फिर एक दिन वो आता है जब यह मकान को बदलना होता है, एक-एक कर सारा सामान पैक हो चुका है। एक नज़र से फिर मुआयना होता है पूरे खाली मकान का कहीं कुछ रह तो नही गया है तब मैं किसी कोने में कोई कहता है मेरे कानों में :-

भीतर,
की ओर खुलने वाले
दरवाजों के बाद
दीवारें बदल जाती हैं
दालान में
जहाँ आज भी मेरा बचपन झांकता है
फिर शुरू होता है
आँगन जिसमें
गुनगुनी धूप बिछी रहती है
मखमल सी
चांदनी भी छिटकती है
जैसे हरसिंगार झरा हो झूमके
जहाँ मेरे जवान होते सपने भी
मिल जाते हैं
अक्सर रातों में तारे गिनते

खेतों,
की ओर खुलते रास्ते पर
मेरा कमरा
बाहर की ओर खुलती खिड़की
जिससे ताजा हवा झोंका
अब भी लगता है
लेकर आयेगा तुम्हारी खुश्बू
और मैं भीग जाऊंगा
झरोखे में कैद तुम्हारा अक्स
अब भी लगता है
बातें करेगा सुबह तक
मेरे सिर में उंगलियाँ फिराते हुये

क्या,
यह सब मैं
ले जा सकूंगा अपने साथ?
---------------------------------
मुकेश कुमार तिवारी
दिनांक : १५-जून-२००९ / समय : १०;४८ रात्रि / घर

18 टिप्पणियाँ

sada ने कहा…

बहुत ही बेहतरीन रचना, जिसके लिये आपको बधाई ।

20 जून 2009 को 5:12 pm

बहुत ही bhaavok............... मन के kareeb लिखी huye rchnaa.......... सचमुच samaan के साथ yaaden ही जा सकती हैं बस.............

20 जून 2009 को 5:37 pm
Udan Tashtari ने कहा…

अति भावपूर्ण रचना!

20 जून 2009 को 6:13 pm
raj ने कहा…

boht khub.....kya main ye le ja sakunga apne sath......

20 जून 2009 को 7:28 pm

कई बार बहुत कुछ साथ ही रहता है यादो के .बहुत सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति लगी आपकी इस रचना की मुकेश जी बधाई एक और सुन्दर रचना के लिए

20 जून 2009 को 7:38 pm
ओम आर्य ने कहा…

मकान मे कैद घर मे यादो की चाँदनी छिटकी हुई है जिसमे शीतलता का एहसास होता है .........यादो के रथ पे सवार हो बचपन से जवानी तक द्रुत गति से पहुंच गये हो .......और मानो ताज़ा हवा का झोका जवानी पर निखार ला दिये हो............बहुत ही सुन्दर कविता.......

20 जून 2009 को 7:56 pm
श्यामल सुमन ने कहा…

मकान से क्रमशः घर बन जाता है - मुकेश भाई मन को छूने वाली पंक्तियाँ। बधाई।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

20 जून 2009 को 8:44 pm
vandana ने कहा…

bahut hi bhavuk rachna......har ahsaas , har lamha jo jiya jata hai wo to sirf wahin qaid rahta hai ya sirf yadon mein.

20 जून 2009 को 10:44 pm
RC ने कहा…

Le hi to ja rahe ho! This is the best way to carry it, Sir.

God bless
RC

20 जून 2009 को 10:55 pm

बहुत ही भावुक और दिल के करीब...

21 जून 2009 को 3:28 pm
‘नज़र’ ने कहा…

आपकी रचनाओं को मेरा सलाम!

22 जून 2009 को 12:13 am

मुकेश जी कविता उत्तम है किन्तु आप सौभाग्यशाली हैं, जो आपको मकान भी मिला और वह घर भी बना. कितने ही लोग ऐसे होते जिन्हे मकान भी नहीं मिलता, बिना मकान के घर बनाने की कोशिशे भी सफ़ल नहीं होतीं और जब तक मकान का जुगाड़ करें, घर पीछे छूट जाता है.
सुन्दर अभिव्यक्ति के लिये पुनः बधाई.

22 जून 2009 को 9:55 am

बेहद खूबसूरत रचना...भावः और शब्द का अनूठा संगम...वाह.
नीरज

22 जून 2009 को 3:22 pm

क्या,
यह सब मैं
ले जा सकूंगा अपने साथ?
---------------
असल में हम सब कहीं जाने का विचार पाले रहते हैं!

22 जून 2009 को 8:18 pm
Harsh ने कहा…

bahut sundar rachna ke liye shukria......

22 जून 2009 को 10:22 pm
Babli ने कहा…

बहुत ही शानदार रचना लिखा है आपने! बल्कि मैं तो ये कहूँगी कि आपकी हर एक रचना इतनी सुंदर होती है कि मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकती! आप एक महान कवि है और आपकी लेखनी को मेरा सलाम!

23 जून 2009 को 6:13 am
Prem Farrukhabadi ने कहा…

खेतों,
की ओर खुलते रास्ते पर
मेरा कमरा
बाहर की ओर खुलती खिड़की
जिससे ताजा हवा झोंका
अब भी लगता है
लेकर आयेगा तुम्हारी खुश्बू
और मैं भीग जाऊंगा
झरोखे में कैद तुम्हारा अक्स
अब भी लगता है
बातें करेगा सुबह तक
मेरे सिर में उंगलियाँ फिराते हुये

क्या,
यह सब मैं
ले जा सकूंगा अपने साथ?

Tiwari saheb.
kuchh yaaden jahan jud jaati hain jab yaad aati hain to vo jagah bhi yaad aati hain. bahut hi bhav poorn abhivyakti.

23 जून 2009 को 9:00 am
Mumukshh Ki Rachanain ने कहा…

क्या,
यह सब मैं
ले जा सकूंगा अपने साथ?

शायद नहीं, खाली हात आना और खाली हाथ जाना. शायद यही नियति है. मैं और मेरा से ऊपर उठाना होगा.

सुन्दर भाव पूर्ण रचना पर बधाई.

चन्द्र मोहन गुप्त

23 जून 2009 को 10:03 pm