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जड़, होने के पहले

मंगलवार, 16 जून 2009

जब,
भूख नही लगती
पेट रोटियों से भरा रहता है
और नींद नही आती
गोलियाँ खाने के बाद भी
तब,
चेतना खोजने लगती है
जीवन के पर्याय

हथेलियों,
पर बनते बिगड़ते समीकरणों में
चेतन और अचेतन के बीच की रेखा
मिटने लगती है ललाट पर

जड़ होने की हद से
थोड़ा पहले ही चेतना
बदलने लगती है अतिविश्वास में
ज्ञान को उग आते हैं पर
च्यूंटियों की तरह
और आत्मा शरीर के अंदर ही
विलीन हो रही होती है
----------------------------------
मुकेश कुमार तिवारी
दिनांक : १३-जून-२००९ / समय : ११:५२ रात्रि / घर

23 टिप्पणियाँ

विनय ने कहा…

आपकी रचनाओं में जो सच्चाई निहित रहती है मैं उसी से प्रभावित हुआ है, सुन्दर रचना है।

16 जून 2009 को 9:21 am
Nirmla Kapila ने कहा…

सुन्दर और सार्थक अभिव्यक्ति है बधाई11111111111111111111111111111111111111

16 जून 2009 को 9:23 am
Udan Tashtari ने कहा…

बहुत उम्दा रचना!

16 जून 2009 को 9:29 am
Science Bloggers Association ने कहा…

कविता के बहाने आपने बहुत अच्‍छी बात कही है। बधाई।

-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

16 जून 2009 को 9:36 am
RC ने कहा…

बहुत खूबसूरत रचना मुकेश जी! एक, वही आम विषय मगर इतनी खूबसूरती से बाँधा है आपने .... दो, असरदार शुरुआत ... "तब चेतना खोजने लगती है जीवन के पर्याय" ...
"चेतन और अचेतन की रेखा मिटने लगती है" ... क्या खूब कहा, और कितना सच ! जब "सुख चुभने लगता है" ... :) ...
और आखरी वर्स भी बहुत उम्दा ... "चेतना बदलने लगती है अतिविश्वास में ... आत्मा शरीर के अन्दर विलीन हो रही होती है " ..

बधाई !
God bles
RC

16 जून 2009 को 10:12 am
ओम आर्य ने कहा…

और आत्मा शरीर के अंदर ही
विलीन हो रही होती है

बहुत ही गहरी बात कही है आपने ......यह मै कहुगा कि आपकी कविता पढने के बाद जो हालत होती है .....उसको मै ब्यान करने असमर्थ हुँ...बस इतना ही कहुंगा कि यथार्थ पर लाकर आप पट्क देते हो.

16 जून 2009 को 11:04 am

चेतना खोजने लगती है
जीवन के पर्याय

जीवन का कटु सत्य है यह ..जो इंसान खुद से कभी भी रूबरू होता है ..इस चेतना से भी होता है ..और आत्मा शरीर के अंदर ही
विलीन हो रही होती है ..यह पंक्ति अपने से की गयी बात चीत का ही एक अंश है ..जिसे जानना सब चाहते हैं पर .जान कोई कोई ही पाता है .आपका लिखा हमेशा ज़िन्दगी के करीब ही पाया है ..यह रचना भी बहुत पसंद आई मुकेश जी ..शुक्रिया

16 जून 2009 को 11:32 am
Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

sir, namaskar , pahli baar aapke blog par aaya hoon.. aapki kavitayen padhi .. kya kahun.. aap bahut shaandar likhte hai .. is kavita me jo dard hai ..jo abhivyakti hai .. main kya kahun ....

is sajiv chitran ke liye aapko badhai ..

vijay
pls read my new sufi poem :
http://poemsofvijay.blogspot.com/2009/06/blog-post.html

16 जून 2009 को 12:28 pm

पूरी ज़िन्दगी विकल्प ढूंढने में निकल जाती है,सार क्या है?
वह जो हम मान लेते हैं या वह,जो हमसे परे होता है........
बहुत ही सशक्त चित्रण

16 जून 2009 को 12:46 pm
नवीन शर्मा ने कहा…

It was indeed the fact and very much true - what happens at the time of death. That is the only time when we think of our TRUE spiritual earning and only that is what helps and decides where will we go next !.

Being in this physical adobe is not being in creation, this is very temporary physical life and part of the journey of the soul. Like one takes accommodation at hotel for few days and then leaves it, similarly we have to go somewhere else and that is the main aim of this life... to find that destination !

Good work ! May GOD help you with correct guidance to explore more of this truth.

regards

16 जून 2009 को 2:33 pm
परमजीत बाली ने कहा…

बहुत बेहतरीन रचना है।बधाई।

16 जून 2009 को 3:12 pm
sandhyagupta ने कहा…

Gehra prabhav chodti hai aapki yah rachna.Badhai.

16 जून 2009 को 5:27 pm
Pyaasa Sajal ने कहा…

har lihaaj se ek bahut hi shashakt aur sahi rachna

16 जून 2009 को 9:48 pm
आकांक्षा~Akanksha ने कहा…

समाज की मूल्यहीनता तथा बदलते दौर में उम्दा कविता.
_______________________________
मेरे ब्लॉग "शब्द-शिखर" पर भी एक नजर डालें तथा पढें 'ईव-टीजिंग और ड्रेस कोड'' एवं अपनी राय दें.

17 जून 2009 को 1:13 am
raj ने कहा…

sachi or gahri baat kahi aapne...

17 जून 2009 को 10:33 am

मुकेश कुमार तिवारी जी।
गरीबी में बच्चों को भूख अधिक लगती है।

17 जून 2009 को 11:34 am

tiwariji,
chetna hoti hi khojne ke liye he/ chetan man hi mastishk ko vyast rakhta he, kuchh nayaa karne, khojne ke prati vo sajag rahtaa he/
aapki kavita me bhi ek chetna he// chetan man hi to he jo shbdo ke chayan ke baad rachnaa ko khoj kar kalambadhdh kiya/
bahut khoob likhaa he aapne//

17 जून 2009 को 6:37 pm
Babli ने कहा…

बहुत ही सुंदर भाव के साथ आपने ये ख़ूबसूरत और उम्दा रचना लिखा है जो काबिले तारीफ है !

18 जून 2009 को 5:26 am
श्यामल सुमन ने कहा…

बहुत सहजता से गहरी बात कह गए। बहुत खूब।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

18 जून 2009 को 6:06 am

तिवारी जी...........
आपका धन्यवाद आप मेरे ब्लॉग पर ये और मेरा उत्साह बढाया. आपका ब्लॉग शशक्त आज के जीवन को जीता हवा है........ रचनाओं में सत्य और गहराई का लाजवाब मिश्रण किया है और शब्दों को भी सहज ही बाँध लिया है अपनी कविता में.......अक्सर नींद न आने पर मन चेतन और अचेतन अवस्था में भटकता रहता है और जड़ होने तक चेतना विलीन हो जाती है........... लजवाब लिखते हैं आप

19 जून 2009 को 3:30 pm

चेतना खोजने लगती है
जीवन के पर्याय
... प्रभावशाली अभिव्यक्ति !!!!

19 जून 2009 को 11:36 pm
शोभना चौरे ने कहा…

जब,
भूख नही लगती
पेट रोटियों से भरा रहता है
और नींद नही आती
गोलियाँ खाने के बाद भी
तब,
चेतना खोजने लगती है
जीवन के पर्याय
steek bat bhut ghri bat
jeevn ke anubhvo se niklkar aai ak sachhi kavita .

20 जून 2009 को 12:53 am
neera ने कहा…

वाह! क्या बात है!

14 जुलाई 2009 को 2:53 pm