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दिन, किस तरह कचोटता है

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2009

हाँ,
मैने देखा है
तुम्हारी आँखों में
जमे हुये ख्वाबों को
और उनके इर्द-गिर्द स्याह दायरों में
दफन हो आई हसरतों को

हाँ,
मैने देखा है
तुम्हारे चेहरे पर
झांईयों में बदल आये आत्मविश्‍वास को
और टूटे हुये विश्‍वास को
बदलते हुये झुर्रियों में

हाँ,
मैने देखा है
तुम्हें कई बार
अपने वुजूद से लड़ते
टूट कर बिखरते हुये
फिर घुटनों पर सिर टिकाये
किसी कोने में सिमटते हुये

हाँ,
मैने सुना है
तुम्हारी सिसकियों में
दम तौड़ती शिकायतों को
और, गले में ही घुट के रह गई चीखों को
बदलते हुये हिचकियों में

हाँ,
मैने महसूस किया है
तुम्हारे कानों के आस-पास
सुने गये तानों की तपन को /
तुम्हारे चेहरे का रंग बदलते हुये
दर्द के उबटन से /
या टीस की सौंधी गमक को
तुम्हारे बालों से आते हुये

इतना,
करीब से जानने के बाद भी
तुम्हें शिकायत है मुझसे कि
मैं,
कभी नही समझ पाऊंगा
दिन किस तरह कचोटता है
तुम्हें
-----------------------------------
मुकेश कुमार तिवारी
दिनांक : १६-अप्रैल-२००९ / समय : ११:२५ रात्रि / घर

17 टिप्पणियाँ

sareetha ने कहा…

भावनाएँ बताई नहीं सिर्फ़ एहसास कराई जा सकती हैं । उम्दा रचना ।

17 अप्रैल 2009 को 2:48 pm

अत्यंत सुन्दर अभिव्यक्ति, बधाईयाँ!

17 अप्रैल 2009 को 4:45 pm
raj ने कहा…

etna kareeb se janne ke baad bhi shikayat hai...asal me shikayat kreeb se janne walo se hi hotee hai...

17 अप्रैल 2009 को 4:55 pm

शिकायत भी अपनों से और प्यार भी अपनों से ..आपका यह अंदाज़ बेहद भाता है कविता का ...बहुत सी बातें कह जाते हैं आप इसके माध्यम से ..जो दिल के करीब होती हैं .एक और बेहतरीन रचना लगी आपकी .यह मुकेश जी ..शुक्रिया

17 अप्रैल 2009 को 5:09 pm
संगीता पुरी ने कहा…

बहुत सुंदर रचना ... भावनाएं बतायी नहीं जाती ... एहसास की जाती है।

17 अप्रैल 2009 को 5:14 pm
डॉ .अनुराग ने कहा…

इतना,
करीब से जानने के बाद भी
तुम्हें शिकायत है मुझसे कि
मैं,
कभी नही समझ पाऊंगा
दिन किस तरह कचोटता है
तुम्हें







अनूप जी कारण अक्सर आपकी कविता को पढ़ा है ओर हर बार पाया है की आपकी कविताओ में वेदना ओर मनुष्यता के स्वर है.

17 अप्रैल 2009 को 6:48 pm
Reality Bytes ने कहा…

हाँ,
मैने देखा है
तुम्हारी आँखों में
जमे हुये ख्वाबों को
और उनके इर्द-गिर्द स्याह दायरों में
दफन हो आई हसरतों को ........

इतना,
करीब से जानने के बाद भी
तुम्हें शिकायत है ................

17 अप्रैल 2009 को 8:20 pm
RC ने कहा…

I read this once and loved the Poem. Then I read it again, as a woman and my comment is strictly from a woman's point of view!
कविता वाकई अच्छी लगी | एक पुरुष से किसी स्त्री के भावनाओं की इतनी अच्छी समझ याद नहीं पहले कब देखी थी!
आखरी stanza जान है कविता की | गुस्ताखी माफ़, ज़रासी विरोधाभासी भी है अगर गौर करें | मतलब ये के अगर इतनी समझ है दर्द की तो दिया ही क्यों !

Anyway, interpretations can be many. Good poem overall.

God bless
RC

22 अप्रैल 2009 को 8:42 pm
Harkirat Haqeer ने कहा…

इतना,
करीब से जानने के बाद भी
तुम्हें शिकायत है मुझसे कि
मैं,
कभी नही समझ पाऊंगा
दिन किस तरह कचोटता है
तुम्हें

मैं भी कहूँगी आर. सी. जी की बात पर गौर कीजियेगा.....शायद उन काली स्याह झाइयों के बीच पड़ी झुर्रियों को कुछ राहत मिल जाये .......!!

गुस्ताखी माफ़....!!

26 अप्रैल 2009 को 12:33 am

"...
इतना,
करीब से जानने के बाद भी
तुम्हें शिकायत है मुझसे कि
मैं,
कभी नही समझ पाऊंगा
दिन किस तरह कचोटता है
तुम्हें"
सच ही है.
बहुत सुन्दर रचना, बधाई!

26 अप्रैल 2009 को 7:02 am
नवीन शर्मा ने कहा…

इस दर्द को सिर्फ और सिर्फ वही जान सकता है जिस्के हिस्से का रोटी नुमा चांद रोज़ दर रोज़ कम होता गया हो और बचपन ऐसे ही बीत गया हो..

भारतीय मध्यम वर्ग की मार्मिक पेशकश और फिर भी उस्में हर सुबेह एक नई जिन्दगी डालती आपकी कवितायें, स्लमडोग मिल्लियन्नेयर की प्रसिधी को फीका कर देती हैं...

--
मस्तक पर चूल्हे की राख को सुहाग की निशानी बनाया,
उसी पर अप्ना दिल जला कर पेट की आग को बुझाया,
एसी सती की जय हो, जए हो ।।

~~~~~~~~~~~~~~
आदर सहित
नवीन

26 अप्रैल 2009 को 6:48 pm
"अर्श" ने कहा…

KHUBSURAT RACHNAA KE LIYE AAPKO BAHOT BAHOT BADHAAYEE...


ARSH

27 अप्रैल 2009 को 4:27 pm
अभिन्न ने कहा…

मुकेश जी आपके ब्लॉग पर आकर लगा की कविता सिर्फ सुनने सुनाने या वाह वाही बटोरने का साधन ही नहीं (कुछेक ऐसा सोचते है )अपितु यह तो एक आन्दोलन भी है जिसे एक व्यक्ति अभिव्यक्ति के माध्यम से चला सकता है वेदना ओर दर्द मानवता के साथ साथ विकसित होते प्रतिमान है पर कहीं न कहीं हम ही जिम्मेदार है इन सब के लिए जब हम जानते तो है फिर समझते क्यों नहीं ---शायद यही सन्देश देती कविता है आपकी
स्त्री पुरुष संबंधो के माध्यम से बहुत गहरी बात कह गए है आप
प्रभावी लेखन को मेरा नमन

28 अप्रैल 2009 को 11:19 pm
Mired Mirage ने कहा…

वाह! बहुत ख़ूब लिखा है। पुरुष भी स्त्री की भावनाओं को समझ सकता है, देखकर सुखद लगा।
घुघूती बासूती

2 मई 2009 को 3:08 pm
bhootnath ने कहा…

bahut hi adbhut........gazab...!!

7 मई 2009 को 3:50 am
Babli ने कहा…

Thank you very much for your lovely comment about the pet.So how is Jackie? I love all pets very much.
Very beautiful poem.Keep writing.

8 मई 2009 को 1:42 pm
Rajat Narula ने कहा…

हाँ,
मैने देखा है
तुम्हारे चेहरे पर
झांईयों में बदल आये आत्मविश्‍वास को
और टूटे हुये विश्‍वास को
बदलते हुये झुर्रियों में

nayab , sunder rachna hai...

10 जून 2009 को 4:08 pm