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एक आसिफ मिय़ाँ ही बचे हैं

गुरुवार, 2 अप्रैल 2009

एक,
आसिफ मिय़ाँ ही बचे हैं
और जो बूढे थे तो तस्वीर हो गये है
मोहल्ला तो करीब करीब लौंडो से भरा है,
दिनभर की मटरगश्ती / छेड़-छाड़
फिर देर रात चौराहे पर
सारे मोहल्ले की खत्म ना होने वाली छिछोरी बातें


एक,
आसिफ मियाँ ही है
तो मोहल्ले में जान है
जब भी मिलते हैं बिना किसी मलाल के
नसीहतें दिये जाते हैं
पूछ जाते हैं सारे घर के हाल
कमाई का हिसाब
पेशानी पे आयी सलवटों का /
या बढी हुई दाढी का सबब

एक,
वही हैं, जो बिना मतलब के ही
सलाम किये फिरते है
बाकी तो कोई किसी मतलब नही रखता
बस उन्हीं को रहती है
पूरे मोहल्ले की चिंता

सिरफिरे,
से हो गये हैं इन दिनों
शाम से ही बैठ जाते है
कब्रस्तान के मोड़ पर
और ना जाने किससे बातें करते है
वो भी किस जमाने की
जैसे वक्‍त टंक गया हो
तहमद पे पैबंद के साथ

सोचता हूँ,
कभी कभी वक्त निकालकर मिल लिया करुं
कुछ सीखने को ही मिलेगा
जिन्दगी की किताब का बहुत कुछ
अनकहा / अनपढा
कम से कम किसी इन्सान से कैसे मिला जाता है
यह तो सीखा ही जा सकता है
क्या भरोसा पके आम हैं
भला कब टिकेंगे डाल पर
फिर तो
उनके बाद हम में से किसी को ही
निभानी है जिम्मेवारी
मोहल्ले के बुजुर्ग की
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनांक : ०२-अप्रैल-२००९ / समय : ११:२७ रात्रि / घर

10 टिप्पणियाँ

संगीता पुरी ने कहा…

बढिया लिखा ... किसी को तो दुबला होना ही होता है शहर की चिंता से।

3 अप्रैल 2009 को 12:07 am
Udan Tashtari ने कहा…

यह भी एक सीख ही है. जब चेत जायें.

3 अप्रैल 2009 को 7:06 am

"उनके बाद हम में से किसी को ही
निभानी है जिम्मेवारी
मोहल्ले के बुजुर्ग की"
सलाम आसिफ मियाँ को!

3 अप्रैल 2009 को 8:00 am

सादर अभिवादन मुकेश जी
आपने मेरे ब्लोग पे पधार के आशीर्वाद दिया पहले तो इसके लिये आपका आभारी हू

दूसरे आपकी कविताओं ने वाकई बहुत प्रभावित किया
स्नेह बनाये रखियेगा
डा उदय मणि
http://mainsamayhun.blogspot.com

3 अप्रैल 2009 को 2:36 pm

बहुत कुछ कह गयी आपकी यह रचना ..सच्ची अच्छी लगी ...शुक्रिया

3 अप्रैल 2009 को 7:16 pm

बहुत अच्छी कविता. सिर्फ कहने के लिए नहीं. वाकई आपकी यहाँ मौजूद सारी कविताएं पढ़ गया.

3 अप्रैल 2009 को 11:38 pm

‘श्याम’निभानी है गर यारी
फिर तो दुनियादारी मत कर

एक,
वही हैं, जो बिना मतलब के ही
सलाम किये फिरते है
बाकी तो कोई किसी मतलब नही रखता
बहुत सुन्दर चित्रण है-
इन पंक्तियों के लेखक को धन्यवाद

और इन पंक्तियों ने गुजरे जमाने की याद ताजा करा दी, जब की सारी टोली में होड़ मची रहती थी कि वो देखेंगी तो किसकी ओर? फिर दूसरों के जलने-भुनने के किस्से :-

दिल रकीबों के जल गए होंगे
तुझसे जब भी नजर लड़ी होगी
श्याम सखा‘श्याम
मेरे ब्लॉग आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं http://gazalkbahane.blogspot.com/ कम से कम दो गज़ल [वज्न सहित] हर सप्ताह
http:/katha-kavita.blogspot.com दो छंद मुक्त कविता हर सप्ताह कभी-कभी लघु-कथा या कथा का छौंक भी मिलेगा
सस्नेह
श्यामसखा‘श्याम

8 अप्रैल 2009 को 12:50 pm
sareetha ने कहा…

अनकहे लफ़्ज़ों में ही आपने जीवन का फ़लसफ़ा बेअहद खूबसूरती से बयान कर दिया । कविता पढ़कर अच्छा लगा ।

8 अप्रैल 2009 को 6:05 pm

बुजुर्गों की अहमियत से रु-बा-रु कराती बेहतरीन अभिव्यक्ति सुन्दर कविता
मेरी ब्लॉग जगत से लम्बी अनुपस्तिथि के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ

8 अप्रैल 2009 को 9:26 pm
Harkirat Haqeer ने कहा…

"उनके बाद हम में से किसी को ही
निभानी है जिम्मेवारी
मोहल्ले के बुजुर्ग की"

प्रदीप मनोरिया जी ने सच कहा है बुजुर्गों कि अहमियत से रु बी रु कराती है आपकी कविता ....!!

9 अप्रैल 2009 को 2:03 pm