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सुकून से सोने के लिये

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2009

बाप,
जिसने देखी होती है
कम से कम बच्चे से ज्यादा दुनिया
और वह,
यह भी जानता है कि
जिन्दा रहने की जंग में
घर से बाहर निकलना ही पड़ता है
चाहे-अनचाहे

वही, बाप
जब किसी शाम बच्चा कहता है कि
मैं आया, थोड़ी देर में
तो, दागता है सवालों की बौछार
क्यों? जरूरी है क्या?
पैर घर में टिकते नही
क्या रखा है चौराहे पर?
तब, यह भी नही सोचता कि
अपने हिस्से की जंग में
उसे भी निकलना ही होगा
कभी ना कभी
बस यही उम्र है
जब तक बाहर नही निकलेगा तो,
सीखेगा क्या?

पूरी दुनिया,
नाप लेने वाला शख्स
जब बदलता है बाप में
तब उसे दिखनी लगती है
सड़कों पर भागती जिन्दगी
बेखौफ भागते ट्रैफ़िक से बचती हुई /
सड़कों पर जन्म लेते गड्‍ढे /
किसी मोड़ पर लूटे जाते हुये राहगीर /
ऐक्सीडेंट की दिल बैठाने वाली खबरें
तब वह,
बुनने लगता है एक दुनिया
घर की चारदीवारी में
अपने बच्चों के लिये
और,
ओढ लेता है अपने बच्चों के हिस्से की दुनिया
सुकून से सोने के लिये
-------------------------------
मुकेश कुमार तिवारी
दिनांक : ०९-अप्रैल-२००९ / समय : ११:१५ रात्रि / घर

9 टिप्पणियाँ

sareetha ने कहा…

जीवन के सार तत्व को समझाने का बेहद सरल अँदाज़ । बस एक ही चीज़ कर दें चारदीवारी को चहारदीवारी बना दें ।

10 अप्रैल 2009 को 7:49 pm
MANVINDER BHIMBER ने कहा…

क्या बात है....क्या खूब लिखा है ....

10 अप्रैल 2009 को 9:09 pm
अनिल कान्त : ने कहा…

जिंदगी का एक रूप आपने यहाँ बहुत अच्छे से पेश किया है ....एक एक शब्द जैसे सच बयां कर रहा हो

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

11 अप्रैल 2009 को 9:37 am
dr.bhoopendra singh ने कहा…

beautiful expression of feelings of a father.It looked to me as if I my self writing these lines.Theme is universal.
welldone friend,keep it up.
my best wishes
dr.bhoopendra

11 अप्रैल 2009 को 10:53 am

सही कहा ..यूँ ही दुनिया का चक्र चलता रहता है .ज़िन्दगी के फलसफे को बताती बढ़िया रचना लगी यह

11 अप्रैल 2009 को 12:45 pm
नवीन शर्मा ने कहा…

Dear Sir,

aapke lekhan me ek zabardast mod aaya hai .... bhot achaa laga padh kar aur aapke phone call ka bhi bhot shukriya... thode dinon se vyast hun to is taraf dhyaan naheen de paya...
---
aadar sahit
- Naveen

12 अप्रैल 2009 को 8:34 pm

apne meri kavita ko saraha...

dhanyvaad....

aur accha hi hua wahan se apke padchinh mile aur phir:

ओढ लेता है अपने बच्चों के हिस्से की दुनिया
सुकून से सोने के लिये

wah!!
mujhe bhi apke jaise vichaar aa rahein hain....

iski tareef nahi kar sakta....

...main to doob gaya hoon !!
is week end apke blog ko poora padhta hoon....

...punashc dhanyvaad avnm badhai!!

15 अप्रैल 2009 को 6:03 pm

आज के युग में पिता रूपी पुरूष की दशा-दुर्दशा का सटीक चित्रण करने में सक्षम रहे हैं आप।
बधाई

हिन्द युग्म पर मेरी गज़ल पर टिपण्णी हेतु आभार



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सस्नेह

15 अप्रैल 2009 को 9:19 pm
raj ने कहा…

boht achha..sach likha hai aapne..jajbato me piro ke zindgee ke sach ko likha hai..

16 अप्रैल 2009 को 5:57 pm