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छतों के सीने पर

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2009

कभी,
तो लगता है कि
मैं घर लौटता ही क्यूं हूँ
सिमटने को एक कमरे में
जिसमें भरा होता है
सामान इस कदर कि
बड़ी मुश्किल से किसी तरह खोजना होता है
अपने लिये कोई कोना
जहाँ मै फैल सकूं
कुछ देर सुकून के साथ /
बदल सकूं इंसान में

कमरे में,
सारी दुनिया फैली होती है /
करीने से सजा होता है
दिन भर का गुबार /
फूले हुये मुँह भर गुस्सा /
मेरे कद से बड़ी होती शिकायतों की फेहरिस्त /
शायद मेरा ही इंतजार करते आँसू

फिर,
मैं पहले बदलने लगता हूँ
पत्थर में
फिर दीवारों में धीरे-धीरे
जो ढूंढती हैं कंधा
छतों के सीने पर रोने के लिये
मेरे आँसू बदलने लगते हैं
छत में कैद सीलन में
जो,
दिन भर गवाही देती हैं कि
मैं कल रात था यहीं कमरे में
कुछ देर इंसान की तरह
मशीन में बदलने के पहले
-----------------------------------
मुकेश कुमार तिवारी
दिनांक : १३-फरवरी-२००९ / समय : ११;४० रात्रि / घर

7 टिप्पणियाँ

Udan Tashtari ने कहा…

मैं कल रात था
यहीं इस कमरे में
कुछ देर इन्सान की तरह
मशीन में बदलने के पहले...


-बहुत गहरे भाव हैं आपकी रचना के. वाह!!

21 फ़रवरी 2009 को 6:18 am
Anil Pusadkar ने कहा…

सच कहूं तो दिल जीत लिया आपने।तारीफ़ जितनी भी की जाए कम ही होगी।

21 फ़रवरी 2009 को 10:02 am
mehek ने कहा…
विनय ने कहा…

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21 फ़रवरी 2009 को 10:28 am
Mumukshh Ki Rachanain ने कहा…

मुकेश जी,
सच कह कर दिल जीत लिया आपने.
कुछ देर सकून के साथ/
बदल सकूं इन्सान में
आभास हो रहा है कि कितना बदल गया इन्सान कि घर में भी इंसानियत दिखने के लिए उसे न तो कोना न सकून मिल रहा है.

हार्दिक आभार.

चन्द्र मोहन गुप्त

21 फ़रवरी 2009 को 2:34 pm
hem pandey ने कहा…

घर एक ऐसी जगह है जहां इंसान सकून तलाशता है, शिकायतें नही.

23 फ़रवरी 2009 को 5:15 pm
Jyotsna Pandey ने कहा…

छतों के सीने पर रोने के लिये
मेरे आँसू बदलने लगते हैं
छत में कैद सीलन में

bahut sundar abhivyakti ......
in panktiyon men simta hai aapki kavita ka saar .........
meri shubhkamnaayen....

25 फ़रवरी 2009 को 7:18 pm