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कविता : पंख

मंगलवार, 3 सितंबर 2013


मैं
जब तक नही जानता था
अपने पंखों को
अन्जान था
आकाश की गहराइयों से
बस
धरती के छोर पर ही 
खत्म हो जाती थी
दुनिया मेरी

एक सुबह
आकाश ने रचे
रंगों के षड़यंत्र
मेरे लिए
तब कहीं जाके
मेरे पंखों ने लांघी
क्षमता की दहलीज
और समूचा
आकाश सिमट आया
मेरी उड़ान में
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : ०३-सितम्बर-२०१३ / १०:४० रात्रि / घर
 

 

9 टिप्पणियाँ

richa shukla ने कहा…

बहुत ही सुंदर-है आपकी ये उडान- ...बहुत सुंदर प्रस्तुति-

3 सितंबर 2013 को 11:32 pm
Kuldeep Thakur ने कहा…

सुंदर रचना...
आप की ये रचना आने वाले शुकरवार यानी 6 सितंबर 2013 को नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही है...आप भी इस हलचल में सादर आमंत्रित है... आप इस हलचल में शामिल अन्य रचनाओं पर भी अपनी दृष्टि डालें...इस संदर्भ में आप के सुझावों का स्वागत है...



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4 सितंबर 2013 को 11:51 am
Anita ने कहा…

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति..

4 सितंबर 2013 को 12:33 pm

आकाश सिमटना बन्द कर दे, पंखों को मार्ग देता रहे बस।

5 सितंबर 2013 को 8:21 am

इसे षड्यंत्र क्यों कहना .... वो तो आमंत्रण था आकाश का .. वो जानता था आपकी क्षमता ...

5 सितंबर 2013 को 2:35 pm

इन पंखों का आकाश मापने का हौसला सलामत रहे !

6 सितंबर 2013 को 10:17 am
Vinay Prajapati ने कहा…

बहुत सुंदर कृति मन को मोहने वाली
विनय प्रजापति 'नज़र'

8 सितंबर 2013 को 12:06 pm

http://bulletinofblog.blogspot.in/2014/05/blog-post_28.html

28 मई 2014 को 10:13 am