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कविता : तुम्हारे हिस्से का वक्त

शनिवार, 20 अक्तूबर 2012


हम
दोनों के बीच
पूरे चैबीस घंटे थे
यदि मेरे बस में होता तो लिख देता
अपने हिस्से को भी
तुम्हारे नाम
और यह जद्दोजेहद 
यहीं खत्म हो जाती
हमेशा के लिए कि
मेरे पास तुम्हारे लिए वक्त नही है

मेरे
अपने पास तो
अपनी वज़हों के लिए
खामोशियाँ ही बचती है
जिन्हें तुम अक्सर
मेरी लाचारियों का नाम दे देती हो 
और यही समझती हो
ऑफिस में
और कुछ नही होता
सिवाय लकीरों के पीटने के 
यह वक्त का साँप
न जाने कब सरक आया है
तुम्हारे पास
और मैं लौटा हूँ
तुम्हारे हिस्से का वक्त
जाया करके
-------------------
मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 30-जुलाई-2012 / समय : 06:10 सुबह / घर

8 टिप्पणियाँ

kshama ने कहा…

Waqt ka saanp....kya gazab kee upma hai.....waqt saanp kee tarah sarke to waqayee kitna darawna lage....aur lagta hee hai kayee baar!

20 अक्तूबर 2012 को 7:33 pm
mridula pradhan ने कहा…

आज कल सबके पास वक्त की बहुत कमी है .... सुंदर रचना

20 अक्तूबर 2012 को 11:05 pm

कौन समय है, किसका हिस्सा,
कौन लुभाया, किसका सिसका।

21 अक्तूबर 2012 को 12:40 am

बढ़ि‍या कवि‍ता है

21 अक्तूबर 2012 को 10:21 am

आपका ब्लॉग यहाँ शामिल किया गया है । समय मिलने पर अवश्य पधारें और अपनी राय से अवगत कराएँ ।
ब्लॉग"दीप"

28 नवंबर 2012 को 12:04 pm
Vinay Prajapati ने कहा…

नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ... आशा है नया वर्ष न्याय वर्ष नव युग के रूप में जाना जायेगा।

ब्लॉग: गुलाबी कोंपलें - जाते रहना...

31 दिसंबर 2012 को 9:41 pm