सच!,
क्या उतना ही था?
जितना कि हम जानते थे
उसे सच होने के लिये
या कुछ और भी था
जुदा उसके सच होने से?
सच!,
जब मैनें पूछा किताबों से तो
गुम हो गया कहीं
अलबत्ता झूठ के पुलिंदों में मौजूद
हर काले अक्षर ने
अपने को सच साबित करने का
हरसंभव प्रयास किया
सच!
जब मैंने खोजा अपने आस-पास तो
हर बार यूँ लगा कि
जैसे जिन्दगी ने छला हो
साँसों के मोल पर
और झूठ को ही बाँधा हो अपनी गाँठ में
सच के नाम पर
सच!
जब दिल की गहराईयों में
तलाशा
तब कानों में झूठ की शहनाईयों ने
चीखकर कहा कि
जो सुनाई दे रहा है
वही सच है
तब से,
आज तक मैं जो
देखता हूँ / महसूस करता हूँ / सुनता हूँ
सच मान लेता हूँ
हो सकता है कि
तुम जिसे सच मानते हो
वो कुछ और हो?
------------------------------------------
मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 11-अप्रैल-2011 / समय : 11:09 रात्रि / घर
क्या उतना ही था?
जितना कि हम जानते थे
उसे सच होने के लिये
या कुछ और भी था
जुदा उसके सच होने से?
सच!,
जब मैनें पूछा किताबों से तो
गुम हो गया कहीं
अलबत्ता झूठ के पुलिंदों में मौजूद
हर काले अक्षर ने
अपने को सच साबित करने का
हरसंभव प्रयास किया
सच!
जब मैंने खोजा अपने आस-पास तो
हर बार यूँ लगा कि
जैसे जिन्दगी ने छला हो
साँसों के मोल पर
और झूठ को ही बाँधा हो अपनी गाँठ में
सच के नाम पर
सच!
जब दिल की गहराईयों में
तलाशा
तब कानों में झूठ की शहनाईयों ने
चीखकर कहा कि
जो सुनाई दे रहा है
वही सच है
तब से,
आज तक मैं जो
देखता हूँ / महसूस करता हूँ / सुनता हूँ
सच मान लेता हूँ
हो सकता है कि
तुम जिसे सच मानते हो
वो कुछ और हो?
------------------------------------------
मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 11-अप्रैल-2011 / समय : 11:09 रात्रि / घर







15 टिप्पणियाँ
देखने/सुनने/महसूस करने से परे भी सच है. शायद सच सापेक्ष है और जो सापेक्ष होता है वह सच नही होता.
17 मई 2011 6:34 pmमुकेश जी मंथित करती यह सुन्दर रचना है
जो सुनाई दे रहा है
17 मई 2011 6:52 pmवही सच है
सुन्दर रचना ....
हर का सच अपना है, अलग है।
17 मई 2011 6:57 pmसच!,
17 मई 2011 7:01 pmजब मैनें पूछा किताबों से तो
गुम हो गया कहीं
अलबत्ता झूठ के पुलिंदों में मौजूद
हर काले अक्षर ने
अपने को सच साबित करने का
हरसंभव प्रयास किया
sahi kaha hai aapne
हो सकता है कि
तुम जिसे सच मानते हो
वो कुछ और हो?
sochne pr majboor karti rachna
badhai
rachana
जब सबके सच एक से होंगे...
17 मई 2011 7:03 pmअलग-अलग नहीं...
बेहतर रचना...
तब से,
17 मई 2011 7:09 pmआज तक मैं जो
देखता हूँ / महसूस करता हूँ / सुनता हूँ
सच मान लेता हूँ
हो सकता है कि
तुम जिसे सच मानते हो
वो कुछ और हो?
...sach ka bahut sundar vishleshan kiya hai aapne...bahut manansheel rachna...
तब से,
17 मई 2011 7:56 pmआज तक मैं जो
देखता हूँ / महसूस करता हूँ / सुनता हूँ
सच मान लेता हूँ
हो सकता है कि
तुम जिसे सच मानते हो
वो कुछ और हो?
....बहुत गहन सोच दर्शाती सुन्दर प्रस्तुति..
सच तो हमेशा सच ही होता है। बेहद गहरे भाव लिये खुबसुरत रचना।
17 मई 2011 9:37 pmसच का बहुत बड़ा सच कह दिया ..गहन अभिव्यक्ति
17 मई 2011 11:36 pmजब मैंने खोजा अपने आस-पास तो
18 मई 2011 7:17 amहर बार यूँ लगा कि
जैसे जिन्दगी ने छला हो
साँसों के मोल पर
और झूठ को ही बाँधा हो अपनी गाँठ में
सच के नाम पर
(nakali)sach ko jhuthlati ek sach se sakshatkaar karati hai aapki rachna
जब मैंने खोजा अपने आस-पास तो
18 मई 2011 7:18 amहर बार यूँ लगा कि
जैसे जिन्दगी ने छला हो
साँसों के मोल पर
और झूठ को ही बाँधा हो अपनी गाँठ में
सच के नाम पर
(nakali)sach ko jhuthlati ek sach se sakshatkaar karati hai aapki rachna
बेहतरीन एहसासों से सजी कविता....
18 मई 2011 5:21 pmसच यही है.
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति | धन्यवाद|
18 मई 2011 9:55 pmदौनो के सच अलग अलग ,गहरी बात जिसे आप सच मानते है हो सकता है मेरे लिये वह सच न हो चिन्तन योग्य । हम सच समझ रहे है जिसे उसी की आड में जिन्दगी हमे छल रही है ं। किताबों में लिखे को सच मानना और जो समक्ष घट रहा है उसे न मानना यही तो नियति है । बहुत अच्छी रचना
19 मई 2011 8:17 pmआप सभी सुधिजनों का अपनी प्रतिक्रियाओं के लिये आभार।
23 मई 2011 4:19 pmआपकी प्रतिक्रियायें मेरा हौंसला बढाती हैं.....
सादर,
मुकेश कुमार तिवारी
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