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कविता : मेरा - तुम्हारा सच!

मंगलवार, 17 मई 2011

सच!,
क्या उतना ही था?
जितना कि हम जानते थे
उसे सच होने के लिये
या कुछ और भी था
जुदा उसके सच होने से?

सच!,
जब मैनें पूछा किताबों से तो
गुम हो गया कहीं
अलबत्ता झूठ के पुलिंदों में मौजूद
हर काले अक्षर ने
अपने को सच साबित करने का
हरसंभव प्रयास किया

सच!
जब मैंने खोजा अपने आस-पास तो
हर बार यूँ लगा कि
जैसे जिन्दगी ने छला हो
साँसों के मोल पर
और झूठ को ही बाँधा हो अपनी गाँठ में
सच के नाम पर

सच!
जब दिल की गहराईयों में
तलाशा
तब कानों में झूठ की शहनाईयों ने
चीखकर कहा कि
जो सुनाई दे रहा है
वही सच है

तब से,
आज तक मैं जो
देखता हूँ / महसूस करता हूँ / सुनता हूँ
सच मान लेता हूँ
हो सकता है कि
तुम जिसे सच मानते हो
वो कुछ और हो?
------------------------------------------
मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 11-अप्रैल-2011 / समय : 11:09 रात्रि / घर

15 टिप्पणियाँ

M VERMA ने कहा…

देखने/सुनने/महसूस करने से परे भी सच है. शायद सच सापेक्ष है और जो सापेक्ष होता है वह सच नही होता.
मुकेश जी मंथित करती यह सुन्दर रचना है

17 मई 2011 को 6:34 pm
Sunil Kumar ने कहा…

जो सुनाई दे रहा है
वही सच है
सुन्दर रचना ....

17 मई 2011 को 6:52 pm

हर का सच अपना है, अलग है।

17 मई 2011 को 6:57 pm
Rachana ने कहा…

सच!,
जब मैनें पूछा किताबों से तो
गुम हो गया कहीं
अलबत्ता झूठ के पुलिंदों में मौजूद
हर काले अक्षर ने
अपने को सच साबित करने का
हरसंभव प्रयास किया
sahi kaha hai aapne
हो सकता है कि
तुम जिसे सच मानते हो
वो कुछ और हो?
sochne pr majboor karti rachna
badhai
rachana

17 मई 2011 को 7:01 pm
ravikumarswarnkar ने कहा…

जब सबके सच एक से होंगे...
अलग-अलग नहीं...

बेहतर रचना...

17 मई 2011 को 7:03 pm
कविता रावत ने कहा…

तब से,
आज तक मैं जो
देखता हूँ / महसूस करता हूँ / सुनता हूँ
सच मान लेता हूँ
हो सकता है कि
तुम जिसे सच मानते हो
वो कुछ और हो?
...sach ka bahut sundar vishleshan kiya hai aapne...bahut manansheel rachna...

17 मई 2011 को 7:09 pm
Kailash C Sharma ने कहा…

तब से,
आज तक मैं जो
देखता हूँ / महसूस करता हूँ / सुनता हूँ
सच मान लेता हूँ
हो सकता है कि
तुम जिसे सच मानते हो
वो कुछ और हो?

....बहुत गहन सोच दर्शाती सुन्दर प्रस्तुति..

17 मई 2011 को 7:56 pm
ehsas ने कहा…

सच तो हमेशा सच ही होता है। बेहद गहरे भाव लिये खुबसुरत रचना।

17 मई 2011 को 9:37 pm

सच का बहुत बड़ा सच कह दिया ..गहन अभिव्यक्ति

17 मई 2011 को 11:36 pm

जब मैंने खोजा अपने आस-पास तो
हर बार यूँ लगा कि
जैसे जिन्दगी ने छला हो
साँसों के मोल पर
और झूठ को ही बाँधा हो अपनी गाँठ में
सच के नाम पर
(nakali)sach ko jhuthlati ek sach se sakshatkaar karati hai aapki rachna

18 मई 2011 को 7:17 am

जब मैंने खोजा अपने आस-पास तो
हर बार यूँ लगा कि
जैसे जिन्दगी ने छला हो
साँसों के मोल पर
और झूठ को ही बाँधा हो अपनी गाँठ में
सच के नाम पर
(nakali)sach ko jhuthlati ek sach se sakshatkaar karati hai aapki rachna

18 मई 2011 को 7:18 am
singh ने कहा…

बेहतरीन एहसासों से सजी कविता....
सच यही है.

18 मई 2011 को 5:21 pm
Patali-The-Village ने कहा…

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति | धन्यवाद|

18 मई 2011 को 9:55 pm
BrijmohanShrivastava ने कहा…

दौनो के सच अलग अलग ,गहरी बात जिसे आप सच मानते है हो सकता है मेरे लिये वह सच न हो चिन्तन योग्य । हम सच समझ रहे है जिसे उसी की आड में जिन्दगी हमे छल रही है ं। किताबों में लिखे को सच मानना और जो समक्ष घट रहा है उसे न मानना यही तो नियति है । बहुत अच्छी रचना

19 मई 2011 को 8:17 pm

आप सभी सुधिजनों का अपनी प्रतिक्रियाओं के लिये आभार।

आपकी प्रतिक्रियायें मेरा हौंसला बढाती हैं.....

सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

23 मई 2011 को 4:19 pm