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कविता : देह होने का भ्रम

बुधवार, 4 मई 2011

तुमने,
मेरे लाख मना करने के
बावजूद
यह मान लिया है
कि तुम अपनी शुरूआत
किसी पूर्णविराम के बाद ही करोगी
और उपसंहार को लिखोगी
अपनी जुबान में
या जब यह धरती सिमट आयेगी
और महाप्लावन के बाद
प्रथम अंकुरण होगा
तब तुम फूट पड़ोगी
जीवन के प्रथम चरण का स्वागत करते
या हथेलियों में मौजूद
सभी रेखायें
अपना लिखा पूरा कर चुकी होंगी
तब तुम किसी पड़ी हुई दरार को
बदल दोगी भाग्यरेखा में
और विधि के
मुकाबिल खड़ी हो जाओगी
सदेह

तुम,
अपनेआप को
एक देह होने के भ्रम से
मुक्त कर लो
और बदल जाओ उम्मीद में किसी दिन
और फिर शेष जिन्दगी
यूँ ही गुजार दो
किसी के चेहरे पर सजे हुए
या आँखों में

तुम,
अपनी सिसकियों के
बीच का अंतराल सौंप दो मुझे
मैं,
वहाँ भरना चाहता हूँ
संगीत !
और गुनगुनाना चाहता हूँ
गीत,
जो तुम्हें पसंद हो
-------------------------------
मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 28-अप्रैल-2011 / समय : 11:35 रात्रि / घर



13 टिप्पणियाँ

शिवम मिश्र ने कहा…

bahut sunder shabdon se rachi kavita hai, badhaiyan!!

5 मई 2011 को 1:38 am
Sunil Kumar ने कहा…

tum apni siskiyon ke beech .....bahut sundr bhavavyakti , badhi ya shubhkamnaye kiparidhi se bahar

5 मई 2011 को 8:20 am

सिसकियों के बीच के अन्तराल में संगीत, बहुत ही सुन्दर और अद्भुत कल्पना।

5 मई 2011 को 9:52 am
वन्दना ने कहा…

गज़ब की रचना…………क्या खूब ख्याल है दिल मे उतर गया…………बहुत सुन्दर भाव संयोजन्।

5 मई 2011 को 12:10 pm
ehsas ने कहा…

बेहद ही उम्दा प्रस्तुति है आपकी। सादर।

5 मई 2011 को 9:57 pm
Rachana ने कहा…

तुम,
अपनी सिसकियों के
बीच का अंतराल सौंप दो मुझे
मैं,
वहाँ भरना चाहता हूँ
संगीत !
और गुनगुनाना चाहता हूँ
गीत,
जो तुम्हें पसंद हो
sunder soch

5 मई 2011 को 10:37 pm
डॉ .अनुराग ने कहा…

तुम,
अपनेआप को
एक देह होने के भ्रम से
मुक्त कर लो
और बदल जाओ उम्मीद में किसी दिन
और फिर शेष जिन्दगी
यूँ ही गुजार दो
किसी के चेहरे पर सजे हुए
या आँखों में

तुम,
अपनी सिसकियों के
बीच का अंतराल सौंप दो मुझे
मैं,
वहाँ भरना चाहता हूँ
संगीत !
और गुनगुनाना चाहता हूँ
गीत,
जो तुम्हें पसंद हो






अद्भुत......ओर शानदार....

6 मई 2011 को 1:29 pm
singhsdm ने कहा…

तिवारी जी
कविता लम्बी होने के बावजूद कथ्य से भटकती नहीं है.... यही कविता और कविताकार दोनों की सफलता का प्रतीक है.
तुम,
अपनेआप को
एक देह होने के भ्रम से
मुक्त कर लो
और बदल जाओ उम्मीद में किसी दिन
और फिर शेष जिन्दगी
यूँ ही गुजार दो
किसी के चेहरे पर सजे हुए
या आँखों में
यह अंश बहुत दिलकश है.......!!!

7 मई 2011 को 6:04 pm
Arvind Mishra ने कहा…

वाह समर्पण आह समर्पण

8 मई 2011 को 7:53 am

सुश्री दीप्ती गुप्ता जी जोकि ई-कविता और स्वतंत्र लेखन में सक्रिय हैं उन्होंने "कवितायन" पर अपनी प्रतिक्रिया निम्न ई-मेल के माध्यम से व्यक्त की हैं :-

---------- Forwarded message ----------
From: "deepti gupta"
Date: 16 May 2011 22:04
Subject: Your Poems
To:

Your poems are extremely gripping, full of warmth. Subtle nuances of inner feelings and emotions are simply Superb.
Sorry, I wanted to express all this in our mother tongue, but today unicode fonts R not working properly, so I had to opt for Britt lang.
Kind Regards
Deepti

P.S.

cud not sign in at ur Blog, so sending it via mail

17 मई 2011 को 11:38 am

आप सभी सुधिजनों का आभार अपनी प्रतिक्रियायें देने के लिये और मेरा हौंसला बढ़ाने के लिये।

सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

17 मई 2011 को 5:32 pm

चलो इस मोड़ से शुरू करें एक और जिंदगी !
बहुत अच्छा अंदाज़ है आपकी कविता का ..

18 मई 2011 को 7:25 am