एक
मेरे होने या न होने से
क्या फर्क पड़ेगा
न होली के रंग फीके होंगे
ना बेमजा हो जायेगा भीगने का आनन्द
फागुन वैसे ही आया है
कुछ देर से
भला अब कोई मुझे तलाशे /
मेरे लिये रूके / या भागते फिरे जंगल में
चीखते पलाश के पीछे
जिन्दा रहना यूँ भी आसान तो नही है
वो भी,
इन्सानी बस्ती में
एकबार जंगल होता तो......
मेरे,
लिये न कभी रात होगी जवाँ
न किसी सुबह सूरज
पूछेगा मुझसे निकलने के पहले
यद्दपि,
भिनसारे (मुँहअंधेरे) या गोधूलि (धुंधलके) में
तुम अपना चेहरा देखोगी
आईने में तो
मेरी शक्ल नज़र आयेगी
मैं,
तुमसे कोई सवाल नही करूँगा
लेकिन
मेरी चुप!
तुम बर्दाश्त नही कर पाओगी
मैं,
अब भी वहीं हूँ वैसा ही
सिर्फ एक बार
तुम मुझे दिल से याद करो
मैंने,
चुन रक्खे हैं पलाश
तुम्हारे ऊपर अपना रंग डालने को
एक बार तुम्हें
अपने रंग में रंगना चाहता हूँ
------------------------------------------
मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 14-मार्च-2011 / समय : 1:40 दोपहर / ऑफिस(लंच ब्रेक)
मेरे होने या न होने से
क्या फर्क पड़ेगा
न होली के रंग फीके होंगे
ना बेमजा हो जायेगा भीगने का आनन्द
फागुन वैसे ही आया है
कुछ देर से
भला अब कोई मुझे तलाशे /
मेरे लिये रूके / या भागते फिरे जंगल में
चीखते पलाश के पीछे
जिन्दा रहना यूँ भी आसान तो नही है
वो भी,
इन्सानी बस्ती में
एकबार जंगल होता तो......
मेरे,
लिये न कभी रात होगी जवाँ
न किसी सुबह सूरज
पूछेगा मुझसे निकलने के पहले
यद्दपि,
भिनसारे (मुँहअंधेरे) या गोधूलि (धुंधलके) में
तुम अपना चेहरा देखोगी
आईने में तो
मेरी शक्ल नज़र आयेगी
मैं,
तुमसे कोई सवाल नही करूँगा
लेकिन
मेरी चुप!
तुम बर्दाश्त नही कर पाओगी
मैं,
अब भी वहीं हूँ वैसा ही
सिर्फ एक बार
तुम मुझे दिल से याद करो
मैंने,
चुन रक्खे हैं पलाश
तुम्हारे ऊपर अपना रंग डालने को
एक बार तुम्हें
अपने रंग में रंगना चाहता हूँ
------------------------------------------
मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 14-मार्च-2011 / समय : 1:40 दोपहर / ऑफिस(लंच ब्रेक)







16 टिप्पणियाँ
होली के रंग चुनना, वह भी पलाश के फूल , बहुत अच्छी अभिव्यक्ति , बधाई
14 मार्च 2011 6:25 pmबहुत भावपूर्ण..
14 मार्च 2011 6:29 pmअदभुद रंग बिखेर रही है कविता...
14 मार्च 2011 6:54 pmबहुत भावमयी प्रस्तुति..
14 मार्च 2011 7:02 pmKaash! Zindagee hame kisee ko apne rang me ragne kaa mauqa de!
14 मार्च 2011 7:56 pmbahut sundar rang ...
14 मार्च 2011 9:04 pmkavita - dhara aakash vayu ... apni ye rachna vatvriksh ke liye bhejen rasprabha@gmail.com per parichay tasweer blog link ke saath
होली के रंग बिखेरती बहुत अच्छी अभिव्यक्ति| धन्यवाद|
14 मार्च 2011 9:32 pmहर पलाश यही सोचने लगे तो रंग कौन भरेगा जीवन में।
14 मार्च 2011 10:32 pmpalash ka phool apane aap mai anoothaa hai . uske binaa holi pori ho sakati hai , holi ka maza nahi.
15 मार्च 2011 1:44 am"yahi kahataa hai hamase palash "
मैंने,
15 मार्च 2011 3:33 pmचुन रक्खे हैं पलाश
तुम्हारे ऊपर अपना रंग डालने को
एक बार तुम्हें
अपने रंग में रंगना चाहता हूँ
प्रेम की उत्तम अभिव्यक्ति…………ना जाने क्या क्या कह गयी……………कितना कहा और कितना अनकहा…………दिल को छू गयी आपकी ये रचना।
बेहद सुन्दर अभिव्यक्ति
16 मार्च 2011 11:53 amमैं,
18 मार्च 2011 6:20 pmतुमसे कोई सवाल नही करूँगा
लेकिन
मेरी चुप!
तुम बर्दाश्त नही कर पाओगी
वाह क्या बात कही है ..अक्सर जब कोई दिल में समाया होता है तो यही हाल होता है ..चुप रहा भी न जाए कहा भी न जाए ...आपका आभार इस सशक्त रचना के लिए
तीनों रचनाएँ बेहतरीन हैं..... 'मैं' खासतौर पर अच्छी लगी..........होली की हार्दिक शुभकामनायें
18 मार्च 2011 9:24 pmबहुत सुन्दर ! उम्दा प्रस्तुती!
18 मार्च 2011 10:01 pmआपको और आपके परिवार को होली की हार्दिक शुभकामनायें!
होली का त्यौहार आपके सुखद जीवन और सुखी परिवार में और भी रंग विरंगी खुशयां बिखेरे यही कामना
20 मार्च 2011 6:52 pmआप सभी आभार!
21 मार्च 2011 10:18 amहोली के अवसर पर रंगों में डूबी हुई शुभकामनाएं......
सादर,
मुकेश कुमार तिवारी
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