प्रिय ब्लॉगर साथियों,
नये वर्ष की मंगलकामनाओं के साथ कि आप सभी अपने सपनों को हकीकत में बदल पायें, स्वस्थ रहें, समृद्ध बनें।
वर्ष 2011 की पहली प्रस्तुति दे रहा हूँ, आपके समर्थन और स्नेह की आकांक्षा के साथ सादर प्रस्तुत :-
मेरे,
तुम्हारे बीच
जहाँ खत्म होता है
हमारा एक होना
और हम बँटने लगते है अलग-अलग
वहाँ तुम महसूस करती हो
हवा को साँस लेते हुये
बस उतनी ही गुंजाईश भर सच था
किसी मुलम्में की तरह
हमें जोड़ता हुआ
यही,
सच कचोटता /
कसमसाता था रहरहकर
तब महसूस करता था कि
तुम्हें भी दुनिया देखना चाहिये
अपनी आँखों से
और महसूस करना चाहिये
वो सारी चुभन जो मेरे हिस्से में आती है
तुम्हारे लिये जीते हुये
जबसे,
तुमने घर से बाहर रखा है कदम
दुनिया छोटी हुई है
लेकिन कद भी सिमटा है तुम्हारा
अब तुम्हारी
परछाईयाँ नही आती
मेरे आँगन दहलीज लाँघती हुई
लेकिन,
तुम्हारी गंध जरूर घुली रहती है
मेरे आस-पास अब भी
हमारे बीच की दूरियों में घुल रहा है ज़हर
और चुभन कहीं ज्यादा
----------------------------
मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 15-दिसमबर-2010 / सायं : 06:45 / ऑफिस
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18 टिप्पणियाँ
शानदार प्रस्तुति।
7 जनवरी 2011 1:09 pmमुकेश जी आपसी संबंधो को गहराई से व्यक्त करती सुन्दर कविता बन पढ़ी है... नव वर्ष की हार्दिक शुभकामना.
7 जनवरी 2011 1:36 pmएक दूसरे की नजर से दुनिया देखना सीख जायें, तो कितना कुछ सुलझ जाये।
7 जनवरी 2011 3:11 pmबहुत ही भावपूर्ण रचना ... नववर्ष की आपको भी हार्दिक शुभकामनाएं....
7 जनवरी 2011 3:15 pmबहुत ही भावपूर्ण रचना
7 जनवरी 2011 6:07 pmनए साल की आपको सपरिवार ढेरो बधाईयाँ !!!!
7 जनवरी 2011 6:07 pmसुलझी हुई रचना ! बधाई !
8 जनवरी 2011 8:33 pmसंबंधों को गहरे से समझ कर लिखा है आपने ...
9 जनवरी 2011 2:40 pmनया साल मुबारक हो ..
नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ ...
10 जनवरी 2011 7:25 pmसम्बन्धों को रेखांकित करती यह रचना अत्यंत भावपूर्ण है
सादर
.
11 जनवरी 2011 12:51 pmजिसे हम शिद्दत से प्यार करते हैं और जिसके लिए जीते हैं पल पल , कभी कभी मन कहता है वो भी समझ ले हर अनकही बातों को। महसूस कर ले हर उस चुभन को जो हमने उसकी खातिर झेली , लेकिन उसे कभी महसूस नहीं होने दिया।
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति।
.
मुकेश जी कहां थे इतने दिन ......?
11 जनवरी 2011 8:16 pmपुन: स्वागत है .....
वहाँ तुम महसूस करती हो
हवा को साँस लेते हुये
बस उतनी ही गुंजाईश भर सच था
किसी मुलम्में की तरह
हमें जोड़ता हुआ
आते ही चक्कर में दाल दिया न .....
लाजवाब ....!!
bahut achchi lagi.
13 जनवरी 2011 9:31 pmबनते-बिगड़ते संबंधों पर आपकी सुन्दर कविता पढ़ी. किसी का एक शेर याद आ गया:-
15 जनवरी 2011 12:50 pmअंदाज़ हूबहू तेरी आवाज़े-पा का था.
देखा पलट के मैंने तो झोका हवा का था
बहुत खूबसूरत शब्द दिए हैं आपने अपने भावों को... नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ ...
15 जनवरी 2011 2:37 pmयही,
15 जनवरी 2011 8:17 pmसच कचोटता /
कसमसाता था रहरहकर
तब महसूस करता था कि
तुम्हें भी दुनिया देखना चाहिये
अपनी आँखों से
और महसूस करना चाहिये
वो सारी चुभन जो मेरे हिस्से में आती है
तुम्हारे लिये जीते हुये
बहुत सुंदर !
वाह... इसे कहते हैं "my version of truth"
16 जनवरी 2011 11:52 amबहुत खूब...
प्रिय बंधुवर मुकेश कुमार तिवारी जी
16 जनवरी 2011 1:13 pmनमस्कार !
बहुत भावपूर्ण रचना है …
… आशा है, नव वर्ष में आपकी प्रखर लेखनी से ऐसी रचनाएं निसृत हों जिनके द्वारा आपके हृदय के प्रेम , संतुष्टि और आनन्दोल्लास का प्रसाद आम पाठक तक पहुंचे … तथास्तु !
>~*~ हार्दिक बधाई और मंगलकामनाएं !~*~
शुभकामनाओं सहित
- राजेन्द्र स्वर्णकार
bahut khoob
26 जनवरी 2011 3:52 pmएक टिप्पणी भेजें