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फिर भी ड़र तो लगता ही है न ?

बुधवार, 28 अप्रैल 2010

मैंने,
सीखा वक्त के साथ
दीवार के पार देखना/
देख लेना चेहरे के पीछे चेहरा
सूरज, जहाँ डूबता प्रतीत होता है
वहाँ की गहराई नाप लेना


मैंने,
यह भी सीखा कि
जिंदा रहने के लिये
जो जरूरी है
कैसे किया जाये?
जिन्दा बने रहने के लिये
जो भी जरूरी हो


सीखा,
तो यह भी था कि
जब जिन्दा रहना ही एक सवाल हो
तो कैसे बचाये रखना है
अपनेआप को
लेकिन
फिर भी ड़र तो लगता ही है न ?
आखिरकार,
जिन्दा बचे रहना
केवल अपने हाथ में ही तो नही होता
------------------------------
मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : २६-मार्च-२०१० / समय : १०:५६ रात्रि / घर

12 टिप्पणियाँ

रोहित ने कहा…

jindagi hume har pal nit kuch naya sikhlati hai...phir bhi jinda rahne ke liye jaddojahad karni hi padti hai.
hum kitna bhi jyada kyun n sikh le par dar to lagta hi hai..
ek aam aadmi ki vedna ko bakhubi pesh kiya hai aapne.
acchi rachna!
aadar-
#ROHIT

28 अप्रैल 2010 को 7:37 pm
दिलीप ने कहा…

bahut khoob sir ye marne ka dar hi to aadmi ko thoda bahut punya kama lene ko prerit karta hai ..varna jaane kya hota...bahut khoob likha...

28 अप्रैल 2010 को 8:06 pm
M VERMA ने कहा…

आखिरकार,
जिन्दा बचे रहना
केवल अपने हाथ में ही तो नही होता

बचे हुए तो खुद की बचाने की फिक्र करेंगे.
जो नहीं बचे उनका क्या?
बेहतरीन रचना के आप पर्याय हैं

28 अप्रैल 2010 को 8:39 pm
मनोज कुमार ने कहा…

बहुत अच्छी कविता।

28 अप्रैल 2010 को 9:07 pm
kshama ने कहा…

Zindagee ek paathshala hai hi...! Abyaskram nit naya badalta hai..

28 अप्रैल 2010 को 9:58 pm
ओम आर्य ने कहा…

इधर काफी दिनों से आपको पढ़ नहीं पाया. आप जब वेबदुनिया पे थे...तब से एक छाप पड़ी हुई है आपकी मानस पे. जाने क्यूँ आपका लिंक जुड़ नहीं रहा है अभी..मैं फिर से कोशिश करता हूँ...

28 अप्रैल 2010 को 10:13 pm
संगीता पुरी ने कहा…

बहुत बढिया रचना !!

28 अप्रैल 2010 को 11:44 pm
महफूज़ अली ने कहा…

बहुत सुंदर रचना......

Will call u tomorrow....Sir....

29 अप्रैल 2010 को 12:24 am

सीखते रहना और जीते रहना । यही जीवन है ।

29 अप्रैल 2010 को 10:08 am

जीवन और मृत्यु के बीच जीने की कोशिश और तैयारी के युग्म में पनपते भय-बोध की प्रभावी अभिव्यक्ति ! इसी को लोग जीवन-यात्रा कहते हैं, गलत कहते हैं ! यही तो मृत्यु-यात्रा है !! बहरहाल, कविता अपनी बात जिस ढंग से कहती है, वह तो आपकी कलम का ही कमाल है ! अद्भुत, अनूठा, अप्रतिम !!!
सप्रीत--आ.

3 मई 2010 को 10:48 am
hem pandey ने कहा…

'जिन्दा बचे रहना केवल अपने हाथ में ही तो नही होता'
लेकिन कहा गया है-
ज़िन्दगी जिंदादिली का नाम है.

4 मई 2010 को 10:02 pm