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नींद को थपकियाँ देते हुये

शुक्रवार, 16 अप्रैल 2010

मुझे,
यह भ्रम अक्सर होता है कि
कोई मेरे दरवाजे पर
दे रहा है दस्तक
या कभी रात यह भी महसूस होता है कि
पुकारा है किसी ने मेरा नाम लेकर
या
कोई मेरा पीछा कर रहा है
बड़ी देर से
मुझे सुनायी देती हैं
अन्जानी आहटें रह रहकर
या
किसी मोड़ पर
ठिठक जाते हैं कदम मुड़ने से पहले
लगता है कोई मेरी ताक में बैठा है छिपकर

मुझपे,
सवार हो यह भ्रम
उतर आता है मेरे बेड़रूम में
मैं महसूस करता हूँ
किसी साये की गर्मी को
बड़ी देर से यूँ ही बिछी हुई चादर पर
फिर,
वही भ्रम दौड़ने लगता है
मेरी रगों में
और
चुहचुहाने लगता है पेशानी पर
लगता है
आज फिर जागना पड़ेगा सारी रात
नींद को थपकियाँ देते हुये
--------------------------
मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : ०६-अप्रैल-२०१० / समय : ०७:४५ सायं / ऑफिस से लौटते

20 टिप्पणियाँ

संजय भास्कर ने कहा…

बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

16 अप्रैल 2010 को 6:15 am

हमेशा की तरह आप वाला ही टच.. :)

मै भी आज रात नीद को थपथपाता रहा.. लेकिन कम्बख्त अभी तक नही आयी है.. फ़िर कुछ लिखा और अभी सोने जा रहा हू...

काफ़ी दिनो के बाद लिखना हुआ, सब खैरियत न?

16 अप्रैल 2010 को 6:20 am
M VERMA ने कहा…

आज फिर जागना पड़ेगा सारी रात
नींद को थपकियाँ देते हुये

क्योंकि नींद की गोलियाँ भी
अब हैं बेअसर
जागना ही होगा
पसीने से तरबतर

बेहतरीन रचना के लिये साधुवाद

16 अप्रैल 2010 को 6:44 am
दिलीप ने कहा…

bahut sundar likha sir...apni bechaini ko kitna sundar roop diya...
http://dilkikalam-dileep.blogspot.com/

16 अप्रैल 2010 को 7:34 am
Udan Tashtari ने कहा…
मनोज कुमार ने कहा…

लगता है
आज फिर जागना पड़ेगा सारी रात
नींद को थपकियाँ देते हुये

लाजवाब!

16 अप्रैल 2010 को 10:34 am

आप तो हमेशा शानदार लिखते हैं...

16 अप्रैल 2010 को 11:57 am

आज फिर जागना पड़ेगा सारी रात
नींद को थपकियाँ देते हुये

नया विचार । बहुत सुन्दर ।

16 अप्रैल 2010 को 3:38 pm
वन्दना ने कहा…

आज फिर जागना पड़ेगा सारी रात
नींद को थपकियाँ देते हुये

वाह ……………………।क्या भाव है,बहुत ही सुन्दरता से शब्दों मे बाँधा है।

16 अप्रैल 2010 को 4:41 pm

बिल्कुल, हमारी भी यही अनुभूति है।

18 अप्रैल 2010 को 8:51 pm

बहुत सुन्दर प्रस्तुति... आपके शब्दों में कुछ अलग है ...नींद को थपकियाँ देने वाली बात बहुत अच्छी लगी !

19 अप्रैल 2010 को 2:38 pm

मुझे,
यह भ्रम अक्सर होता है कि
कोई मेरे दरवाजे पर
दे रहा है दस्तक
या कभी रात यह भी महसूस होता है कि
पुकारा है किसी ने मेरा नाम लेकर

कमाल की कविता. मुकेश जी ऐसा भ्रम तो मुझे भी होता है, अक्सर.

19 अप्रैल 2010 को 2:41 pm
बेचैन आत्मा ने कहा…

यह तो बेचैन आत्मा की आवाज है।
अच्छी कविता के लिए बधाई।

19 अप्रैल 2010 को 11:14 pm

कुछ भ्रम भी जिंदगी का हिस्सा बन जातेहैं और साथ ही मन को भाने लगते हैं.
बहुत खूब अभिव्यक्त किया है मन के भावों को.
[अनूप जी की चिटठा चर्चा से लिंक ले कर यहाँ पहुंची,आप की कवितायेँ अच्छी लगीं.]

21 अप्रैल 2010 को 9:26 am

ऐसा होता है अक्सर ... आपने मानव मन को बाखूबी पकड़ा है ....

21 अप्रैल 2010 को 12:59 pm

जी-मेल बज़ पर श्री नवीन शर्मा से मिली एक टिप्पणी :-

Mukesh Ji
Namaskar,
Ofcourse the whole piece was well written. But somehow i felt that feel of insecurity that is with every common man, becomes larger than life at times. And only we encourage our fears and ask us to scare us. Along with that it was marvel in last line "neend ko thapkiyaan dete hue " ... :)

Again a masterpiece from your pen...
regards
Naveen2:44 pm

21 अप्रैल 2010 को 7:21 pm
hem pandey ने कहा…
kshama ने कहा…

Poori rachana hi sundar hai..kaunsi panktiyan dohraun?

25 अप्रैल 2010 को 2:27 pm

बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.

28 अप्रैल 2010 को 12:35 am

बहुत दिनों के बाद अपने ब्लॉग पर लौटा था, लेकिन आप सबके प्रोत्साहन ने बने रहने का हौसला दिया है।

धन्यवाद,


मुकेश कुमार तिवारी

28 अप्रैल 2010 को 7:11 pm