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बहस

बुधवार, 26 अगस्त 2009

किसी,
मुद्दे पर जारी बहस
जब छोडती है बौद्धिक स्तर को
तो उतर आती है तू तू-मैं मैं पर
और फिर हाथापाई पर
कोई कभी भी और कहीं से भी
भाग लेने लगता है बहस में
जैसे किसी पब्लिक ट्रांसपोर्ट में चढते उतरते हैं लोग

मुद्दे का गद्दा
पहले बदलता है तकिये में
अंततः हवा मे़ उडने लगती है रुई

न सूत बचता है न कपास
फिर भी जुलाह¨ में लट्ठम लट्ठ जारी रहता है
औरर बोर्ड रूम के द्वार पर
“लाल“ बल्ब जलता रहता है देता संदेश
कि
यह मीटिंग अभी खत्म नही होने वाली
---------------------------
मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक: 18-जून-2008 / सुबह: 10:45 / विभागीय बैठक के दौरान

29 टिप्पणियाँ

समाज के वर्तमान नीतियों पर प्रहार करती..
संदेश वाहक कविता..अगर विचारों को माना जाए तो..
बधाई..

26 अगस्त 2009 को 1:36 pm
Nirmla Kapila ने कहा…

वाह बहुत सुन्दर शब्दों मे आज के सच को उकेरा है बधाई

26 अगस्त 2009 को 2:35 pm
Nirmla Kapila ने कहा…

वाह बहुत सुन्दर शब्दों मे आज के सच को उकेरा है बधाई

26 अगस्त 2009 को 2:35 pm
kshama ने कहा…

खामोश हूँ ..सही कहा ..परिस्थितियाँ तो बनाती ही हैं हमें,जो हम बन जाते हैं.....लेकिन कई बार हम समझौते कर लेते हैं ..जहाँ नही करने चाहियें ..पर समय रहते ये सब समझ में आ जाय तो क्या बात थी ...!दुनिया अलग नज़र आती...ना शिकवे होते न गिले!

26 अगस्त 2009 को 2:50 pm

यह तो हिन्दी ब्लॉगजगत का हाल है - यहां बौद्धिकता का दान बहुत आसानी से होता है! :)

26 अगस्त 2009 को 3:27 pm
sada ने कहा…

बहुत ही सही कहा आपने ।

26 अगस्त 2009 को 3:50 pm
ओम आर्य ने कहा…

आंतरिक स्तर पर भी इस तरह काअ दव्न्द चलता रहता है ........यह और नजरिया से देखा जा सकता है आपके रचना को बाह्य स्तर पर भी इसे देखा जा सकता है ........बहुत ही सुन्दर रचना .....बधाई

26 अगस्त 2009 को 4:41 pm
kshama ने कहा…

'बिखरे सितारे ' पे टिप्पणी के लिए धन्यवाद !

26 अगस्त 2009 को 8:23 pm
Mrs. Asha Joglekar ने कहा…

मुद्दे का गद्दा
पहले बदलता है तकिये में
अंततः हवा मे़ उडने लगती है रुई

न सूत बचता है न कपास
फिर भी जुलाह¨ में लट्ठम लट्ठ जारी रहता है
कितना सही वर्णन है बोर्ड मीटिंग्ज का । सुंदर ।

26 अगस्त 2009 को 9:25 pm
vikram7 ने कहा…

मुद्दे का गद्दा
पहले बदलता है तकिये में
अंततः हवा मे़ उडने लगती है रुई
अति सुन्दर रचना

26 अगस्त 2009 को 9:59 pm
प्रवीण शाह ने कहा…

.
.
.
अच्छी रचना है।

फिर भी बहस का न होना भयावह है।

सार्थक हो या निरर्थक, बहस का हो पाना आश्वस्त

करता है।

27 अगस्त 2009 को 12:02 am

बहुत सुन्दर.

27 अगस्त 2009 को 12:43 am
महफूज़ अली ने कहा…

किसी,
मुद्दे पर जारी बहस
जब छोडती है बौद्धिक स्तर को
तो उतर आती है तू तू-मैं मैं पर
और फिर हाथापाई पर
कोई कभी भी और कहीं से भी
भाग लेने लगता है बहस में
जैसे किसी पब्लिक ट्रांसपोर्ट में चढते उतरते हैं लोग


sahi likha hai aapne.....bahut hi sunder vichaar ke saath.....

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aapka profile prerna daayak hai......



Dhanyawaad.....

27 अगस्त 2009 को 10:28 am
vandana ने कहा…

satya ko ujagar karti bahas.

27 अगस्त 2009 को 11:33 am
Prem Farrukhabadi ने कहा…

जब छोडती है बौद्धिक स्तर को
तो उतर आती है तू तू-मैं मैं पर

वाह!! बहुत सुन्दर!! बधाई!!

27 अगस्त 2009 को 5:43 pm
गुंजन ने कहा…

भाई,

पैनी नज़र पाई है, तू-तू-मैं-मैं वाली बात कुछ ज्यादा जमी और पब्लिक ट्रांसपोर्ट तो बन ही जाती है क्योंकि सभी मोहल्ले से निकलकर शहर में आये हैं।

जीतेन्द्र चौहान

27 अगस्त 2009 को 6:47 pm

बंधुवर,
सिर्फ कविता नहीं, गहरा कटाक्षपूर्ण बयान, बोलते बिम्ब, प्रतीk इतने साफ़ कि निरावृत्त हो सामने खड़े hain--'मुद्दे ke gadde का पहले तकिया होना, फिर उसकी रुई का उड़ना hawa me.... लोग जैसे public ट्रांसपोर्ट में चढ़ने-उतारनेवाले... क्या बात है ! आप आसपास कि ज़मीन से कविता के स्फुल्लिंग उठाते है, इसीलिए बात इतनी धारदार हो जाती है. बधाई !!
.....लेकिन ये चुप-सी क्यों लगी है ? नागार्जुन जी पर मेरा संस्मरण आपकी दृष्टि से पूरा ही छूट गया न ? चाहता था, आप उसे पढें और अपनी पतिक्रिया से अवगत करें....
समधर्मी....आ.

27 अगस्त 2009 को 7:00 pm
M.A.Sharma "सेहर" ने कहा…

पर क्या ये बौद्धिक स्तर की बहस हुयी...??:)

मगर होता यही हाल है...सच में..:)
यथार्थ लिखा!!!
बहुत खूब !!

28 अगस्त 2009 को 2:37 pm

wah achhi kavita he tivariji, bahas yaani hi hota he LATHTHAM LATHTHAA../ bodhdhik star ko tyagne ke baad kuchh bhi ho jhagde ki jad hi he/
sundar tarike se samaz ki ek atigambhir baat ko ukera he/

28 अगस्त 2009 को 5:58 pm
M VERMA ने कहा…

मुद्दे का गद्दे से तकिये मे और फिर रूई मे बदलकर हवा मे उडना......
और अंतत: 'यह मीटिंग अभी खत्म नही होने वाली'
'बहस' तो बहस के लिये ही होती है यह खत्म कैसे हो जायेगी.
आपने तो शब्दो को जिस तरह पिरोया है क्या कहने
बहुत सुन्दर

28 अगस्त 2009 को 8:55 pm
hem pandey ने कहा…

बुद्धिजीवियों की बहस के सड़कछाप रूपांतरण का अच्छा चित्रण है.

28 अगस्त 2009 को 9:56 pm

कविता अच्छी भी लगी और सच्ची भी खासकर गद्दे से रुई तक का रूपक.

29 अगस्त 2009 को 4:30 am

वाह! क्या कमाल बात कही है.

29 अगस्त 2009 को 12:24 pm
विनय ‘नज़र’ ने कहा…

वाह-वा, नये आयामों तक पर फैलाये हुए है आपकी रचना!
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तख़लीक़-ए-नज़र

29 अगस्त 2009 को 2:49 pm
शोभना चौरे ने कहा…

भाग लेने लगता है बहस में
जैसे किसी पब्लिक ट्रांसपोर्ट में चढते उतरते हैं लोग
bahut sateek upma di hai .
sashakt abhivykti
badhai

30 अगस्त 2009 को 7:08 pm
Babli ने कहा…

बहुत खूबसूरती से आपने सच्चाई को बखूबी प्रस्तुत किया है ! बहुत बढ़िया लगा ! इस बेहतरीन रचना के लिए बधाई !

31 अगस्त 2009 को 6:51 am

आप सभी का धन्यवाद!!!

आपकी टिप्पणियाँ मेरा मार्गदर्शन करती हैं और आपका प्रोत्साहन मेरी सबसे बड़ी धरोहर है।

सादर,


मुकेश कुमार तिवारी

31 अगस्त 2009 को 9:02 am

समाज की visangtiyon पर karaara प्रहार करती rachna ...........

31 अगस्त 2009 को 12:06 pm