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टारगेट के पीछे भागते

मंगलवार, 18 अगस्त 2009

आज,
फिर पूरा दिन गुजर गया
टारगेट के पीछे भागते
दिन है कि
जैसे पूरा था ही नही
अधूरा सा दिन
बस पलों में सिमट आया
धुंधलके में
टारगेट वहीं था
और हमारे बीच दूरियाँ
रात की तरह गहराती जा रही थी


सारा,
सामर्थ्य झोंक कर भी
मैं
विफलता के साये में
ढूंढ रहा था
कोई सुकून भरी तपिश /
कोई पसीने में नहाई सुबह /
और बचना चाहता था
किसी रिव्यूह से
जहाँ लानतों का ठीकरा
बुके के पीछे से झांकता
कर रहा होगा
मेरा इंतजार
--------------------------
मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : १८-अगस्त-२००९ / समय : ०७:२५ सायं / ऑफिस

15 टिप्पणियाँ

M VERMA ने कहा…

जहाँ लानतों का ठीकरा
बुके के पीछे से झांकता
कर रहा होगा
मेरा इंतजार
==========
कितना विद्रूप यथार्थ छिपा है इन पंक्तियो के अन्दर. वाकई सच तो यही है.
श्रेष्ठ रचना के लिये बधाई

18 अगस्त 2009 को 7:59 pm

जिन्दगी मुसलसल सफर है - जब मंजिल पर पंहुचे तो मंजिल बढ़ा दी! :(

18 अगस्त 2009 को 8:22 pm
श्यामल सुमन ने कहा…

कोई सुकून भरी तपिश /
कोई पसीने में नहाई सुबह /

शब्दों का गजब चुनाव किया है मुकेश भाई आपने। वाह।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

18 अगस्त 2009 को 8:25 pm
अनूप शुक्ल ने कहा…

जय हो! क्या दर्द है!

18 अगस्त 2009 को 8:44 pm
ओम आर्य ने कहा…

गहरे भावो को बहुत ही सुन्दरता से अनोखे शब्दो से सजाया है ...........एक खुब्सूरत रचना.....बहुत ही खुब

18 अगस्त 2009 को 9:00 pm

किसी sales वाले से पूछा होता 'टारगेट' के बारे में ???
खैर , आगे आने वाले 'टारगेट्स' के लिए हमारी शुभकामनाएं।

18 अगस्त 2009 को 9:42 pm

अधूरा सा दिन
बस पलों में सिमट आया
धुंधलके में
टारगेट वहीं था
और हमारे बीच दूरियाँ
रात की तरह गहराती जा रही थी

बहुत खूब ...बेहद खूबसूरत लगी यह रचना

19 अगस्त 2009 को 10:20 am
Mumukshh Ki Rachanain ने कहा…

शायद नया टारगेट ही आज के समाज के लिए प्रगति का वास्तविक मायने रह गया है................

20 अगस्त 2009 को 3:54 pm

सारा,सामर्थ्य झोंक कर भी
मैं
विफलता के साये में
ढूंढ रहा था
कोई सुकून भरी तपिश

बहुत ही सार्थक लिखा है ......... इंसान बस talaash करता rahta है sukoon का इक पल ........ bhaavon को सार्थक रूप से शब्दों में piroya है आपने .........

20 अगस्त 2009 को 4:47 pm
BrijmohanShrivastava ने कहा…

कोई सुकून भरी तपिश वाह तिवारीजी |बुके के पीछे से झांकता लानतों का ठीकरा |टारगेट वही मगर दूरियां रात की तरह गहराती |

20 अगस्त 2009 को 8:28 pm

सुन्दर भाव भरी रचना के लिये बधाई

21 अगस्त 2009 को 11:29 am
RC ने कहा…
गुंजन ने कहा…

Bhai,

hum sabhi bhaagate hai TARGET ke peechhe aur Jindagi se door chale jaate hain.

Achchhi lagi Kavita.

Jeetendra

23 अगस्त 2009 को 7:50 am
neera ने कहा…

कभी टार्गेट के पीछे तो कभी रिपोर्ट के तो कभी डेटा के पीछे भागते- भागते जिंदगी पीछे छूट जाती है.. बड़ा सार्थक लिखा है

25 अगस्त 2009 को 2:17 am