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बहरहाल चुनाव हो ही गये

गुरुवार, 11 दिसंबर 2008

किसी,
तरह चलो बज गये ढोल
पटाखे भी फोड़े गये
कुछ पिछड़े / कुछ निकल पड़े
कुछ बैठे / कुछ खड़े रहे
कई निपटे / कुछ लुटे / कुछ अड़े रहे
कुछ यूँ ही गुजर गये नज़र के सामने से
बहरहाल चुनाव आ ही गये

किसी
ने पहली बार रखा कदम जमीन पर
किसी ने पहली बार देखा शहर करीब से
किसी ने सीखा कमर को झुकाना
किसी ने सीखा नाक सीधे रखना
किसी ने छानी खाक गलियों में
किसी ने तलाशे अपने वाले
किसी ने खोजे पीकर मस्त रहने वाले
बहरहाल चुनाव शुरू हो ही गये


किसी,
के नारे लगे / जयकारे लगे
किसी तरह किनारे लगे
किसी की नैया लेती रही हिचकोले
किसी ने मारी बाजी
कोई निकला फिसड्डी
कई अब्दुल्ला बेगानी शादियों में
दीवाने बने रहे हैं
कई गुल्फाम मारे गये
आचार संहिता के फेर में
चौराहे पर चलते रही बतोलेबाजी
बहरहाल चुनाव जारी है

किसी,
ने मैदान मारा
किसी ने रण छोड़ा
किसी को पटका अपनो ने
आग लगी किसी के सपनों में
किसी को मिला आर्शीवाद
किसी को संताप
किसी को कालिख लगी
किसी के कटे पाप
जनता को शोर से राहत मिली
बहरहाल चुनाव हो ही गये
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनांक : ०९-दिसम्बर-२००८ / समय : १०:३० रात्रि / घर

2 टिप्पणियाँ

shyam kori 'uday' ने कहा…

... बहुत सुन्दर ।

12 दिसंबर 2008 को 7:34 am
BrijmohanShrivastava ने कहा…

बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना और मारे गए गुलफाम अरे हाँ दोनो गानों के शब्दों का बहुत ही उपयुक्त जगह प्रयोग किया है तिवारी जी /कालिख ,संताप और आशीर्बाद +अब किसको क्या मिला ये मुक्कदर की बात है या यूँ कहें जिसका जितना आँचल था उतनी ही सौगात मिली ""लेकिन एक बात बहुत शानदार कहदी कि जनता को शोर से रहत मिली /बहुत प्यारी रचना

12 दिसंबर 2008 को 12:47 pm