मैं,
ढूंढ्ता हूँ कोई ना कोई मौका
जब भी मिले घर से बाहर निकलने का
कुछ देर खुली हवा में सांस लेने का
घर,
में तंग करती हैं दीवारें
दीवारों के बीच पल रहे दायरे
खिड़कियाँ जो
दरवाजों सी बंद हो जाती हैं
हर कमरे में बसा होता है अंधेरा
रिश्तों में लगी होती है सीलन
तब,
बाहर निकलते ही घर
सवार हो जाता है मेरे स्कूटर पर
कान पर बस बजता ही चला जाता है
बिना रुके
जैसा घाटियो में गूंजता है संगीत
या कोई अनचाहा गीत
और,
मैं तंग आकर फिर लौट आता हूँ
घर
पसर जाना चाहता हूँ
घर के खालीपन में
उन्ही दीवारों में तलाशता
अपना वजूद
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनांक : ०६-जनवरी-२००९ / समय : ११:१५ रात्रि / घर
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