अंगूठे,
को लेकर
मेरा कौतुहल
आज भी विद्यमान है
महाभारत काल से लगाकर आजतक
जब आदमी रख चुका है
अपने कदम अंतरिक्ष के सीने पर
अंगूठे के अस्तित्व को नही नकार पाया है
फिर, वो चाहे
एकलव्य का रहा हो
आम आदमी का
किसी
आज भी
जब विज्ञान नही समझ पाता है
किसी बात को
रुक जाता है
किसी रूल ऑफ थम्ब पर
लेते हुए सहारा अंगूठे का
तर्कों को ठेंगा दिखाते हुए
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मुकेश कुमार तिवारी
गुरू पूर्णिमा के अवसर पर / दिनाँक : १५-जुलाई-२०११







8 टिप्पणियाँ
वाह गज़ब का चिन्तन है।
16 जुलाई 2011 5:39 pmवही अँगूठे आज ठेंगा दिखाते हैं, वाह बहुत सशक्त प्रस्तुति।
16 जुलाई 2011 5:57 pmसब समय के फेर है!
16 जुलाई 2011 7:18 pmबहुत बढ़िया चिंतनशील प्रस्तुति!
आज भी
16 जुलाई 2011 10:11 pmजब विज्ञान नही समझ पाता है
किसी बात को
रुक जाता है
किसी रूल ऑफ थम्ब पर
लेते हुए सहारा अंगूठे का
तर्कों को ठेंगा दिखाते हुए
बहुत सही शब्दों में आपने आज की स्थिति को परिभाषित किया है।
विशेष ज्ञान
17 जुलाई 2011 8:15 amसभी रहस्यों को सुलझाने में अभी काफी समय लेगा ||
फिर भी सुलझा नहीं ही पायेगा सभी रहस्यों को ||
सुन्दर प्रस्तुति ||
बधाई ||
बहुत ही सुंदर दृष्टांत है।
17 जुलाई 2011 11:32 amअंगूठे की महत्ता ...बढ़िया चिंतन ।
17 जुलाई 2011 8:34 pmआप का बलाँग मूझे पढ कर अच्छा लगा , मैं भी एक बलाँग खोली हू
17 जुलाई 2011 10:37 pmलिकं हैhttp://sarapyar.blogspot.com/
आपको मेरी हार्दिक शुभकामनायें.
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hai
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