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कविता : सपनों का सैलाब

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

तुम,
जब अपनी मांग में
सवालों को सजा लेती हो तो
तुम्हारी आँखों में
तैरते सपने डूब जाते हैं
समन्दर में


तुम,
टाँक लेती हो जरूरतों को
जब अपनी साड़ी पर
और लपेट लेती हो तो
यूँ लगता है कि
जैसे आसमान लिपट आया हो
तुम्हारे बदन से
और तुम जरूरतों में घिरी
मुस्कुरा रही हो
चाँद की तरह


तुम,
जब उम्मीदों से
गूंथ लेती हो वेणी(गजरा)
और सजा लेती हो
अपने जूड़े में
तो यूँ लगता है कि
जैसे मुझे मिल गया हो
जीने का मक़सद
तुम्हारी उम्मीदों और जरूरतों के बीच
तुम्हारे सपनों का सैलाब
मुझे बहाए लिये जाता है
जिन्दगी की ओर
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : 31-मार्च-2011 / समय : 09:45 रात्रि / घर लौटते हुए

12 टिप्पणियाँ

वन्दना ने कहा…

आपकी इस रचना ने तो मन मोह लिया………बेहद उम्दा भावाव्यक्ति……………दिल को छूती हुई।

1 अप्रैल 2011 को 5:47 pm
शारदा अरोरा ने कहा…

badi sahjata se kavita bahti hui

1 अप्रैल 2011 को 8:08 pm

aapke ek ek shabd mein swapnil pyaar ka indradhanush nazar aata hai

1 अप्रैल 2011 को 8:10 pm
Sunil Kumar ने कहा…

बहुत सुन्दर भाव लिए यह रचना , बधाई

1 अप्रैल 2011 को 10:11 pm
kshama ने कहा…

Kisee ke jism pe aasmaan lipat janaa....wah kya khayal hai!

1 अप्रैल 2011 को 11:33 pm
मनोज कुमार ने कहा…

एक सधी-कसी शिल्प में बहुत ही अच्छी कविता।

2 अप्रैल 2011 को 12:03 am

जीने में गति ले आती कविता।

4 अप्रैल 2011 को 1:54 pm
नवीन शर्मा ने कहा…

Mukesh Ji

Aapki kavitaon par ab "Comments" dene ki kshamta naheen bachi hai, to choti choti smiles se baat bana lijiye. Aapka lekhan din bar din zabardast hota ja raha hai, jabki bol sadharan aur ati sadharan hote ja rahe hain.

Regards

7 अप्रैल 2011 को 5:26 pm

आप सभी को धन्यवाद!!!

आप सबकी प्रतिक्रियाएँ ही मुझे प्रेरणा देती हैं कि मैं अपने लेखन में सुधारकर अपनी भावनाओं को आप सब तक सकता हूँ ।

सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

7 अप्रैल 2011 को 8:48 pm
Amrita Tanmay ने कहा…
M VERMA ने कहा…

सपनों के सैलाब की सततता की शुभकामना
सुन्दर अल्फाज और भाव

9 अप्रैल 2011 को 5:03 pm