कविता : बाकी रह आई दहलीजों के बीच

शुक्रवार, 10 दिसम्बर 2010

मुझे,
मौका था भागने का
वक्त के साथ
लेकिन उलझन भी थी
वक्त के साथ भागने में छूट जायेगा
वो,
जिसे मैं छाती से लगाये घूमता हूँ
और भीड़ में अलग से
पहचाना जाता हूँ

मेरे,
कदमों में वो हौंसला नही था कि
तौड़ सकें जंजीरें
जिन्हें दहलीज के साथ बाँधा जाता है
या चौबारे में खूंटे के साथ
जहाँ वक्त भी टँगा होता है खूंटियों पे
बैचेन,
और मेरे अंतर बो रहा होता है
विद्रोह के बीज

मसनदों,
के खोल सी लिपटी होती हैं
परंपरायें
मेरे गले के इर्दगिर्द
इन डोरियों में पाता हूँ
बुना हुआ रिश्तों को
और, वक्त
बैठक में बिछे पायदान सा गुहारता है
अपने साथ चलने को

घर,
टूटकर गिर रहा होता है मुझ पर
वक्त
तलाश रहा होता है कोई और घर
जहाँ अब भी बाकी रह आई हैं दहलीजें/
दरवाजें भीतर की ओर खुलते हैं
और उनमें रहने वाले
भूले नही हैं मुस्कुराना अब तक
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : ०२-दिसम्बर-२०१० / समय : ११:१५ रात्रि / घर

7 टिप्पणियाँ

अन्त में वही काम आयेगा जो हृदय को सबसे अधिक प्यारा है।

10 दिसम्बर 2010 10:48 pm
मनोज कुमार ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
विचार-मानवाधिकार, मस्तिष्क और शांति पुरस्कार

10 दिसम्बर 2010 11:28 pm
kshama ने कहा…

Muskurana bhoole nahi abhi tak....wo kabhi na bhoolen!

10 दिसम्बर 2010 11:43 pm
संजय भास्कर ने कहा…

सार्थक और बेहद खूबसूरत,प्रभावी,उम्दा रचना है..शुभकामनाएं।

11 दिसम्बर 2010 11:10 am
संजय भास्कर ने कहा…

सभी ही अच्छे शब्दों का चयन
और
अपनी सवेदनाओ को अच्छी अभिव्यक्ति दी है आपने.

11 दिसम्बर 2010 11:10 am
वन्दना ने कहा…

एक बेहद गहन अभिव्यक्ति सोच के स्तर से ऊपर्।

11 दिसम्बर 2010 6:10 pm

वक्त
तलाश रहा होता है कोई और घर
जहाँ अब भी बाकी रह आई हैं दहलीजें/
दरवाजें भीतर की ओर खुलते हैं
और उनमें रहने वाले
भूले नही हैं मुस्कुराना अब तक

एक दम सच और सच के सिवा कुछ नहीं ..बहुत बहुत बढ़िया लगी यह ...

24 दिसम्बर 2010 12:47 pm