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पर्यावरण दिवस विशेष : पेड़ तब भी नही सुखाता

शुक्रवार, 4 जून 2010

कल ०५ जून विश्व पर्यावरण दिवस है, खूब शोर होगा, अपीले होंगी, पौधे रोपे जायेंगे, तस्वीरे खिंचेगी लोग जबरिया मुस्कुराते हुये न जाने क्या भाषण पेलेंगे और हो जायेगा इस बार भी पर्यावरण दिवस..........


चिडियों,
ने जब बदल लिया हो
अपना आशियाना /
छांव ने तलाश लिया हो
कोई और ठौर /
न किसी डाल पे
कोई झूलते याद करता हो किसी को /
न तले गुड़गुड़ाते हों हुक्का बूढ़े
सुबह से शाम तक
पेड़,
तब भी नही सुखाता


पेड़,
जब सूखता है तो,
केवल पत्ते नही झरते,
न ही दरारें झाँकने लगती है डालों से
या उसके तने को ठोंककर पूछा जा सकता हो हाल
जब,
जड़ों में सूखने लगती है
आशा की नमी
कि, किसी शाम
कोई गायेगा गीत जी भरके /
कोई रोयेगा बुक्का भरके /
कोई सुखायेगा पसीना
पेड़ सूख जाता है
--------------------------------
मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : १६-अप्रैल-२०१० / समय : ०८:१० रात्रि / ऑफिस से लौटते

23 टिप्पणियाँ

Vinay Prajapati 'Nazar' ने कहा…

कविता में सजीवता है

4 जून 2010 को 9:16 pm
M VERMA ने कहा…

जड़ों में सूखने लगती है
आशा की नमी
कि, किसी शाम
कोई गायेगा गीत जी भरके /
----
आशा की यह नमी
शायद इसी की है कमी
वरना क्या कमी थी कि
बंजर हो गयी यह जमीं

4 जून 2010 को 9:23 pm
श्यामल सुमन ने कहा…

क समसामयिक और सार्थक भाव की रचना मुकेश भाई। बहुत दिनों के बाद आपकी गली में आ पाया हूँ।

आगे बढ़ी है दुनिया मौसम बदल रहा है
बदेले सुमन का जीवन इक ऐसा पहर होता

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com

4 जून 2010 को 9:31 pm
kshama ने कहा…

Haan..yah sab tamasha hoga..chhaya dena gunah hai,uski saza pedon ko milti rahegi..

4 जून 2010 को 10:26 pm
महफूज़ अली ने कहा…

और आपसे माफ़ी चाहता हूँ.... आजकल मसरूफ़ियत इतनी है कि "Nature's call' भी नहीं कर पाता हूँ..... बाई द वे.... मेरा नम्बर वही है.... बस एक ब्लैकबेरी का मोबाइल लिया नया तो आपका नंबर गायब हो गया.... है.... प्लीज़ अपना नंबर मेल कर दीजिये..... समसामयिक और सार्थक भाव की रचना ....

4 जून 2010 को 11:10 pm
महफूज़ अली ने कहा…

समसामयिक और सार्थक भाव की रचना ........

4 जून 2010 को 11:10 pm
sangeeta swarup ने कहा…

सुन्दर अभिव्यक्ति

4 जून 2010 को 11:58 pm
मनोज कुमार ने कहा…

05.06.10 की चिट्ठा चर्चा (सुबह 06 बजे) में शामिल करने के लिए इसका लिंक लिया है।
http://chitthacharcha.blogspot.com/

5 जून 2010 को 1:37 am
Udan Tashtari ने कहा…

बहुत उम्दा रचना...

5 जून 2010 को 5:47 am
ओम आर्य ने कहा…

आदमी और जंगल
साथ रहते थे तब
और तब तक हरा रहा आदमी

आदमी जंगली रहा
तब तक सब ठीक रहा

आदमी जंगल से निकल आया
और बाहर आकर
उसने कंक्रीट के जंगल बनाए
और
फिर सूख गया

5 जून 2010 को 7:03 am
अनूप शुक्ल ने कहा…

सुन्दर रचना। पेड़ की हिलती पत्तियों सरीखी।

5 जून 2010 को 8:33 am

बढ़िया तिवारी साहब, आज के अखबारों में तो दुनिया को हराभरा बनाने में हिंदुस्तान को अब्बल बताया गया है !

5 जून 2010 को 9:59 am
कविता रावत ने कहा…

Prayawaran Diwas par sajag post ke liye haardik shubhkamnayne

5 जून 2010 को 11:23 am
hem pandey ने कहा…

पेड़ को केवल यह अहसास होने दीजिये कि हम उसकी चिंता करते हैं, पेड़ नहीं सूखेगा.

5 जून 2010 को 1:17 pm

अगर हम आजके दिन भी सचमुच पर्यावरण के प्रति गम्भीर हो जाएं, तो भी इस धरती का बहुत भला हो सकता है।
--------
रूपसियों सजना संवरना छोड़ दो?
मंत्रो के द्वारा क्या-क्या चीज़ नहीं पैदा की जा सकती?

5 जून 2010 को 1:57 pm
बेचैन आत्मा ने कहा…

पेंड़ जब सूखता है तो जड़ों में सूखने लगती है आशा की नमी..!
...वाह! इसी तरह खाद-पानी देते रहिए ताकि जीवित रहे आशा की संभावना.

5 जून 2010 को 11:04 pm
rakeshindore.blogspot.com ने कहा…

aapne hmaare samy ke samooche sch ko rekhankit kiyr hai . ek lekhkeey daayitw ko pooraa kiya hai . badhaaee

6 जून 2010 को 12:11 pm
स्वाति ने कहा…

सामयिक और उम्दा रचना...

9 जून 2010 को 2:56 pm

बहुत दिनों बाद आपका लिखा पढ़ा बहुत सी रचनाये हैं जो पढने से चुक गयी थी मैं ..अभी सब पढ़ी ऐसे लगा जैसे इन्द्रधनुष के कई रंग बिखर गए लफ़्ज़ों में ..हर रचना अपने अलग मिजाज से अपनी बात कहती है ...सभी बहुत पसंद आई ..देर से पढने के लिए माफ़ी

9 जून 2010 को 6:44 pm
Mumukshh Ki Rachanain ने कहा…

दरख़्त के दर्द के माध्यम से पर्यावरण दिवस को मानाने के ढंग पर अद्भुत कटाक्ष.
हार्दिक बधाई के पात्र............

चन्द्र मोहन गुप्त
जयपुर

12 जून 2010 को 11:18 am

काश पेड़ कभी न सूखते..

13 जून 2010 को 7:08 am

अच्छी प्रस्तुति........बधाई.....

13 जून 2010 को 10:20 am
गुंजन ने कहा…

भाई,

अब तो सीमेंट और फायबर के नकली पेड़ ही चौराहों पर नज़र आते हैं जिनके नीचे न तो कोई बैठ सकता है और न ही कोई अपने दर्द बाँट सकता है।

अपने समय के यथार्थ को भोगती / ढोती भावना भरी कविता।

जीतेन्द्र चौहान
संपादक-गुंजन

14 जून 2010 को 12:24 pm