मेरा तुम्हारा क्षितिज

बुधवार, 27 जनवरी 2010

मेरी,
कुछ अपनी क्षमता थी /
कुछ अपना नज़रिया /
और कुछ आकलन
तुमसे जुड़ने के बाद मुझे लगा था कि
मैं,
कर पाऊंगा विस्तार अपनी सीमाओं का
और व्यापक / पैनी / समग्र

तु
मेरे विचारों को मार रहे हो
गर्भ में ही
जहाँ वो आकार लेते रहे थे
और
अपने नज़रिये को थोप रहे हो
मैं,
यह महसूस कर रहा हूँ कि
कोई बदल रहा है किसी मशीन में मुझे
न कोई विचार आते हैं कोई /
न स्पंदन होता है /
न नज़रिया बचा है

तुम भी,
शायद उन ऊँचाईयों से
उतना ही देख पा रहे हो
जितना कि देख सकते थे
उसके आगे तुम्हारी दुनिया सिमट रही है
और,
जहाँ मैं मदद कर सकता था
अपने नज़रिये से
क्षितिज को पीछे धकेलने में
कि बढ़ा सकें दुनिया अपने हिस्से की
मैं भी उतना ही देख पा रहा हूँ
जितना कि तुम
-------------------
मुकेश कुमार तिवारी
दिनाँक : २७-जनवरी-२०१० / ऑफिस / समय ०१:३० दोपहर

21 टिप्पणियाँ

ह्रदय पुष्प ने कहा…

"मैं भी उतना ही देख पा रहा हूँ
जितना कि तुम"
दूर की सोच - गहरी और प्रभावशाली.

27 जनवरी 2010 5:04 pm

बंधुवर,
आप जिस तंत्र से बंधे हैं, वहाँ तो कविता के स्फुल्लिंग छिटक कर आपको अनायास मिल जाते है ! ये बौखलाहट तो कवि की कलम से बोलेगी ही :
'तुम
मेरे विचारों को मार रहे हो
गर्भ में ही
जहाँ वो आकार लेते रहे थे...'
और ये कि--
'यह महसूस कर रहा हूँ कि
कोई बदल रहा है किसी मशीन में मुझे...'
शमशेरबहादुर सिंह कि कविता-पुस्तक याद आयी है-- 'बात बोलेगी' . सो, बोल पड़ी है आपकी इस कविता में ! चीखने में तो गला खर्च करना पड़ेगा बन्धु ! सार्थक अर्थ-अभिप्राय संप्रेषित करती कविता ! साधू-साधु !!
बिटिया वाली कविता इसलिए नहीं भेजी कि ३०-३१ जनवरी तो पास आ गई है; आप भी पास आ जाएँ तो रू-ब-रू सूना दूँ ! कब आ रहे हैं ? लिखें !
आज ब्लॉग पर पिताजी कि एक रचना पोस्ट कि है, चाहता हूँ, उसे आप अवश्य पढ़ें !
सप्रीत--आ.

27 जनवरी 2010 5:21 pm

बेहतरीन रचना प्रस्तुति .... आभार

27 जनवरी 2010 5:24 pm

प्रभावी रचना है .......... विचारों की उथल पुथल में बुनी रचना .........

27 जनवरी 2010 5:32 pm
kshama ने कहा…

मैं भी उतना ही देख पा रहा हूँ
जितना कि तुम
Har kiseee kee apnee maryada hoti hai! Saral,sahaj shabdon me aapne apnee baat kahee...

27 जनवरी 2010 5:33 pm

behatreen.
jindagi shbdo me khelti he, sochati he,chintan karti he.., tiwariji, anubhav aour jeevan ko dekhane ke apne gambhir dhang se janmi he rachna, vese aapki kalam se ese hi shbdo ki dhaar bahati he jisame jeevan saamne khada dikhataa he.

27 जनवरी 2010 6:07 pm
मनोज कुमार ने कहा…

जीवन की अभिव्यक्ति का सच।

27 जनवरी 2010 9:24 pm

अपना अपना नजरिया और उससे जुदा क्षितिज इस को बखूबी आपने लफ़्ज़ों में पिरोया है ...सबसे बेहतरीन पंक्तियाँ लगी यह तुम
मेरे विचारों को मार रहे हो
गर्भ में ही
जहाँ वो आकार लेते रहे थे
और
अपने नज़रिये को थोप रहे हो
मैं,
यह महसूस कर रहा हूँ कि
कोई बदल रहा है किसी मशीन में मुझे
न कोई विचार आते हैं कोई /
न स्पंदन होता है /
न नज़रिया बचा है इस में जो सच है वह सब कुछ ब्यान कर देता है शुक्रिया मुकेश जी ..बेहतरीन

28 जनवरी 2010 6:21 pm

सुन्दर रचना. क्या करें अपनी-अपनी सीमाएं हैं.

29 जनवरी 2010 1:46 am

बेहद सशक्त रचना ! आभार ।

30 जनवरी 2010 1:56 pm
kshama ने कहा…

Rachana itnee sundar hai,ki, baar,baar padhne ka man karta hai!

1 फरवरी 2010 8:02 pm
शरद कोकास ने कहा…

अच्छी रचना

2 फरवरी 2010 10:10 pm
shikha varshney ने कहा…

अपनी अपनी सीमाए और इनसे घिरा इंसान..बहुत गहरी सोच के साथ बहुत ही प्रभावशाली अभिव्यक्ति है..बेहद सुन्दर कविता

10 फरवरी 2010 8:50 pm
Pankaj Upadhyay ने कहा…
Devendra ने कहा…

यह तो बंधन की छटपटाहट है. मेरा तो मानना है कि विचार गर्भ में नहीं मरते ...सिर्फ प्रतीत होते हैं कि मर रहे हैं...ये वो बीज हैं जो हवा-पानी पा कर कब अंकुरित हो जायं कहा नहीं जा सकता.
..सोचने कि लिए विवश करती इस कविता में आकार ढहर सा गया. बहुत अच्छी कविता है.

16 फरवरी 2010 7:39 pm

...प्रभावशाली अभिव्यक्ति !!

21 फरवरी 2010 10:18 pm
kshama ने कहा…

Phir ek baar aapki rachname naye mayne nazar aa gaye!

23 फरवरी 2010 9:14 pm
RC ने कहा…

hamesha ki tarah ... bahut bahut sundar ..

27 फरवरी 2010 10:57 am

होली और मिलाद उन नबी की शुभकामनायें कबूल करें !

27 फरवरी 2010 8:57 pm
संजय भास्कर ने कहा…

.सोचने कि लिए विवश करती इस कविता में आकार ढहर सा गया. बहुत अच्छी कविता है.

16 अप्रैल 2010 6:23 am