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हथेलियों से गुम होती रेखाएँ

बुधवार, 9 सितंबर 2009

आगरा केवल ताज ही नही अपने पेठों के लिये भी मशहूर है, पेठे जिनकी मिठास मुँह में घुलने के बाद भी बड़ी देर तक बनी रहती है। उसी पेठे को एक दूसरी नज़र से देखने का प्रयास किया है, आशा करता हूँ कि आप पसंद करेंगे.........

मुकेश

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पेठा,
मीठा-मीठा
जुबान पे रखते ही घुल जाने वाला
जैसे ही याद आता है
मुँह में आने लगता है पानी
और,
जेहन में घूमने लगती हैं
आगरा की गलियाँ /
गलियों में दफ्न होती जिन्दगियाँ

इन,
गलियों में घरों के पीछे बनी
हौजों से आती चुनयाती गंध
आंगन में पकती हुई चाश्‍नी के काढाव
औसारी में गोदे जाते भूरे कोलों(कद्दू) का ढेर
नालियों पर धुलते मर्तबानों की भीड़

और,
याद आता है
वो बच्चा,
जिसकी किताबों के हर्फ
गर्क हो गये चूने की हौजों में
वो आदमी,
जो समय से पहले बूढा हो आया हो
जिसकी हथेलियों में
कोई भाग्यरेखा बची ही नही चूने के आगे
वो औरत,
जिसकी हंसी बदलती गई चाश्‍नी में
वो बूढा,
जो नही देख पाता कुछ और
मर्तबानों के सिवाय

शक्कर,
बदलती है चाश्‍नी में /
भूरा कोला,
बद्लता है खोखे में /
आदमी,
बदलता है भीड़ में
और, जिन्दगी,
बदलती है पेठे में
------------------------------
मुकेश कुमार तिवारी
दिनांक : १७-दिसम्बर-२००८ / समय : ११:१० रात्रि / घर

21 टिप्पणियाँ

अभिनव ने कहा…

बहुत उम्दा कविता.

9 सितंबर 2009 को 10:37 am
Mithilesh dubey ने कहा…

बहुत खुब सुन्दर रचना। मुँह मे पानी आ गया.......

9 सितंबर 2009 को 10:57 am
ओम आर्य ने कहा…

क्या कहे ......एक हकीकत जो जिन्दगी है जिनकी रेखाये चुने से काट दी गई है .....क्या बात है ....मर्मस्पर्शी ......सम्वेदनाओ से भारी.......एक सुन्दर कविता

9 सितंबर 2009 को 11:09 am

आपकी यह कविता एक सच्चाई ब्यान करती है
जिसकी किताबों के हर्फ
गर्क हो गये चूने की हौजों में
वो आदमी,
जो समय से पहले बूढा हो आया हो
जिसकी हथेलियों में
कोई भाग्यरेखा बची ही नही चूने के आगे
दूसरो का मुहं मीठा कराने वाले खुद किस तरह से जिंदगी के रास्ते से गुजर रहे हैं यह आपकी इन पक्तियों में खूब अच्छे से ब्यान हुआ है मुकेश जी ...
पर ..........
वो औरत,
जिसकी हंसी बदलती गई चाश्‍नी में
यहाँ इस पंक्ति को पढने से दो भाव आते हैं दिल में ..एक ख़ुशी का एक दुःख का कविता के हिसाब से निसंदेह सही है पर एक सकारत्मक भाव भी दर्शा गयी यह पंक्तियाँ ...

9 सितंबर 2009 को 11:50 am

JEEVAN KI KADVI HAKEEKAT KO RAKHA HAI AAPNE PETHE KE MAADHYAM SE .... MAIN KHUD BI BAHOOT SAMAY AGRA MEIN RAHA HUN AUR IS YANTRANA KO BHOGTE LOGON KO DEKH CHUKA HUN ...
PAR YE TO NIYATI AI JEEVAN KI ... INSAAN KEVAL FAL/PUSHP KO DEKHTA HAI ..... PEECHE CUPI MEHNAT KO KOI SALAAM NAHI KARTA ..... BAOOT HI MARMSPARSHIY RACHNA ...

9 सितंबर 2009 को 11:53 am
Nirmla Kapila ने कहा…

जिसकी किताबों के हर्फ
गर्क हो गये चूने की हौजों में
वो आदमी,
जो समय से पहले बूढा हो आया हो
जिसकी हथेलियों में
कोई भाग्यरेखा बची ही नही चूने के आगे
बेहद मर्मस्पर्शी रचना है शुभकामनायें

9 सितंबर 2009 को 11:56 am
vikram7 ने कहा…

बेहद मर्मस्पर्शी कविता

9 सितंबर 2009 को 12:46 pm

हुज़ूर, ये बा-कमाल हुनर है ! ज़िन्दगी की सामान्य उठा-पटक में भी आप अपनी कविता के तत्त्व कितनी आसानी से ढूंढ लेते है, सचमुच आश्चर्य होता है ! बुहत उम्दा है ये विवरण... बच्चे का बचपन, बूढे का बुढापा और महिलाओं की मादकता--सब तब्दील होती हुई पेठे में---ज़िन्दगी पेठा होती हुई... !!
लेकिन, मेरे जैसे मिष्टान्न-प्रेमी के लिए तो आपने मुश्किल खड़ी कर दी प्रभु ! अब पेठा खाऊं या ज़िन्दगी... ?
सप्रीत--समधर्मी--आ.

9 सितंबर 2009 को 1:02 pm
विनय ‘नज़र’ ने कहा…

अंर्तमन तक झनकने वाली रचना

9 सितंबर 2009 को 1:02 pm
रंजना ने कहा…

Waah ! Waah ! Waah ! jhakjhor gayi yah rachna.....Kya lahun...lajawaab !!!

9 सितंबर 2009 को 2:58 pm

aapki har rachna mein ek jivant zindagi,aas-paas ghoomta pariveshiye mahaul hota hai,jise padhte sondha-sondha sa mann ho uthta hai

9 सितंबर 2009 को 3:08 pm
Mumukshh Ki Rachanain ने कहा…

शक्कर,
बदलती है चाशनी में/
भूरा कोयला,
बदलता है खोके में/
आदमी,
बदलता है भीड़ में/
और जिंदगी,
बदलती है पेठे में

भाई तिवारी जी अंततः मैं तो यही कहूँगा कि

और फिर भी ज़बान,
मचल रही है पेठे के लिए...........

बहुत ही गहन भावों कि आपकी ये कविता है, पेठे के नाम से मुंह में जो लार टपकनी शुरू हुई थी अंत तक पढ़ते-पढ़ते बेचारी न निगलते ही बन रही है और न थूकते.

आपका आभार.

चन्द्र मोहन गुप्त
जयपुर
www.cmgupta.blogspot.com

9 सितंबर 2009 को 5:56 pm
Prem Farrukhabadi ने कहा…

mukesh ji,
bahut yatharth bhav.vyatha hi vyatha.janmdata ki vyatha to asahneey evam akathneey hoti hai.chahe vo petha ho ya fir koi jeev
aapki kavita sachmuch sarahneey.dil se badhai!

9 सितंबर 2009 को 9:06 pm

"शक्कर,
बदलती है चाश्‍नी में /
भूरा कोला,
बद्लता है खोखे में /
आदमी,
बदलता है भीड़ में
और, जिन्दगी,
बदलती है पेठे में"
बहुत ही अच्छी लगी ये रचना...आजकल की सच्चाई को प्रदर्शित करती रचना....

9 सितंबर 2009 को 10:22 pm
RC ने कहा…

Aakhri verse bahut hi sundar ! To good!

God bless
RC

9 सितंबर 2009 को 10:45 pm
गुंजन ने कहा…

भाई,

दर्द से दिल भर आया।

एक मर्मस्पर्शी कविता के लिये बधाई।

जीतेन्द्र चौहान

10 सितंबर 2009 को 11:01 am

क्या बतायें - पेठा खाते समय याद आयेगी यह बहुत!

10 सितंबर 2009 को 4:53 pm

Mukesh bhai,
pethe me is tarah itnee bhavnayen bhar dena aapka hi kamal hai,adbhut,mera sadar aabhaar,
aapka hi
dr.bhoopendra

11 सितंबर 2009 को 12:30 am

बहुत ही उम्दा रचना ।

11 सितंबर 2009 को 10:07 am

आप सभी का शुक्रिया!

आपकी टिप्पणियों के लिये आभार!!

सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

12 सितंबर 2009 को 4:54 pm

ye he baariki se dekhne vaali nazar ka kamaal/ jisame anubhav use pena kartaa he/ kyaa kahu, aapke lekhan ne sachmuch mujhe gambhir kar diya/ tivariji, sach kahu to jeevan ko dekhne ka apana ek nazriya hota he kintu aapka nazriya ek nahi, bahuaayaami he/ birle hote he ese.../

12 सितंबर 2009 को 5:27 pm