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जब, गुम हो जाये लिपियाँ

गुरुवार, 14 मई 2009

मैनें,
कभी नही चाहा कि
जोड़कर अंजुरि भर लूँ
अपने हिस्से की धूप
और अपने सपनों को बदलने की
कोशिश करूं हकीकत में

मैनें,
कभी नही चाहा कि
आकाश मेरे लिये सहेज कर रक्खे
एक टुकड़ा छांव सुख भरी
सुकून बाँटती
जब मेरी पीठ से उतरती हुई
पसीने की बूंद
गुम हो जाये दोनों पैरों के बीच कहीं
और सामने पड़ी हो दूरियाँ नापने को

मैनें,
कभी नही चाहा कि
मेरे आस-पास आभामंडल बने
और मुझे पहचाना जाये
पास बिखरी चमक दमक से
जब मैं अपनी ही खोज में किसी कतार में खड़ा
आरंभ कर रहा हूँ सीखना
रोशनी कैसा पैदा की जा सकती है
खून को जलाते हुये हाड़ की बत्ती से

मैनें,
कभी नही चाहा कि
मेरा नाम उकेरा जाये दीवारों पर
या पत्त्थर के सीने पर
और वर्षों बाद भी जब गुम हो जायें लिपियाँ
मैं अपने नाम के साथ जिन्दा रहूँ
अंजानी पहचान के साथ
जबकि, मैं चाहता रहा
मेरा नाम किसी दिल के हिस्से पर
बना सके अपने लिये कोई जगह
और धड़कता रहे
किसी दिन शून्य में विलीन होने से पहले
-----------------------------------------
मुकेश कुमार तिवारी
दिनांक : ०२-मई-२००९ / समय : ११:१५ रात्रि / घर

13 टिप्पणियाँ

raj ने कहा…

warsho baad jab gum ho jaye lippiya main apne naam ke sath zinda rahu....boht sunder...

14 मई 2009 को 11:07 am

जबकि, मैं चाहता रहा
मेरा नाम किसी दिल के हिस्से पर
बना सके अपने लिये कोई जगह
और धड़कता रहे
किसी दिन शून्य में विलीन होने से पहले

यह एक वो इच्छा है जो हर प्रेम को जीने वाला दिल चाहता है ..बाकी सब तो आना जाना है पर किसी के दिल की धड़कन के साथ होना जीवन को एक मायने दे देता है ...बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति मुकेश जी ..मोह लिया मन आपकी इस रचना ने .

14 मई 2009 को 11:24 am

बिन मांगे मोती मिले,..............आपने नहीं चाहा,पर कविता जगत में आपका नाम स्थापित है...

14 मई 2009 को 1:02 pm
विनय ने कहा…

बहुत ख़ूब, शब्द मन में गूँजते रह जाते हैं

14 मई 2009 को 1:04 pm
रंजना ने कहा…

Bhaavpoorn sundar kavita hetu aabhaar.

14 मई 2009 को 4:01 pm
RC ने कहा…

Nice - I agree with Vinay ji.

15 मई 2009 को 10:09 am
अमित ने कहा…

बहुत सुन्दर
अन्तिम पंक्तियाँ। विशेष प्रभाव छोड़ रही हैं।
अच्छी कविता के लिये मेरी बधाई!
सादर

15 मई 2009 को 4:45 pm
Babli ने कहा…

आपकी टिपण्णी के लिए बहुत बहुत शुक्रिया !
बहुत ही उम्दा कविता लिखा है आपने!

18 मई 2009 को 6:41 am
नवीन शर्मा ने कहा…

पहले पहल का इश्क अभी याद है 'फराज़'
दिल खुद ही चाहता था कि रुस्वाइयां भी हों...

-----------
बहुत प्यारा लिखा है जी.. हर दिल यही चाह्ता है कि उस्का कोई और भी मकाम हो... कहीं और भी रिहाइश हो... :)

आदर सहित
- नवीन

18 मई 2009 को 11:22 am

आरंभ कर रहा हूँ सीखना
रोशनी कैसा पैदा की जा सकती है
खून को जलाते हुये हाड़ की बत्ती से
प्रभावी अभिव्यक्ति .विशेषकर उपरोक्त पंग्तियाँ .

20 मई 2009 को 10:52 am

कभी नही चाहा कि
आकाश मेरे लिये सहेज कर रक्खे
एक टुकड़ा छांव सुख भरी

-उत्तम रचना है मुकेश जी.
बहुत ही सुन्दर भावाभिव्यक्ति.

27 मई 2009 को 11:08 am

good,sensitive poem describing beautiful insight of a man .
Keep writing and let us know.
with warm welcome
Dr.Bhoopendra

30 मई 2009 को 7:23 pm
ravikumarswarnkar ने कहा…

आपकी कविताओं से गुजरा..धीरे...धीरे
आपका कवि, अपनी आत्मपरक दुनिया में ले गया..शनैः..शनैः..
एक उदासी..एक बैचेनी...

समय लगा इस दुनिया की वस्तुगतता में लौटने में..

9 जून 2009 को 7:52 pm