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तुम्हारे कमरे से निकलने के बाद

सोमवार, 2 मार्च 2009

तुम,
अक्सर मुझे आवाज देती हो
मैं जब भी उतर चुका होता हूँ
दो चार सीढ़ियॉ

फिर,
मेरे लौट के आने पर
भेज देती हो उल्टे पाँव
कहते हुये
रहने दो, कुछ नही बस यूँ ही

या,
कभी पूछ बैठती हो
मैं कैसी लग रही हूँ
यह साडी ठीक तो है ना
या बदल लूँ ?

मेरे,
पास कुछ जवाब नही होता है
उन सवालों का
ना ही कोई च्वाईस होती है
सिवाय गर्दन हिलाने के /
या हाँ - हूं-हां बोलने के
यह अलग बात है कि
मैं,
कुछ भी सलाह दूँ
होना तो वही है
जो तुम चाहोगी
अलबत्ता,
मुझे रायशुमारी का मौका तो मिलता है

कभी-कभी,
तो लगता है कि
तुम्हें क्या हो जाता है
ना जाने कहाँ के और कैसे सवाल आते हैं
तुम्हारे दिमाग में
जिनमें सीधे-सीधे तो कुछ नही / पर
पीछे बहुत कुछ छिपा होता है
वो, भी जब मैं
उतर चुका होता हूँ
दो-चार सीढ़ियॉ
तुम्हारे कमरे से निकलने के बाद
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मुकेश कुमार तिवारी
दिनांक : 27-फरवरी-2009 / समय : 11:28 रात्रि / घर

6 टिप्पणियाँ

neeshoo ने कहा…

मुकेश जी बहुत सुन्दर कविता प्रस्तुत की है आपने । धन्यवाद

2 मार्च 2009 को 8:53 pm
शोभा ने कहा…

मेरे,
पास कुछ जवाब नही होता है
उन सवालों का
ना ही कोई च्वाईस होती है
सिवाय गर्दन हिलाने के /
या हाँ - हूं-हां बोलने के
यह अलग बात है कि
बहुत बढ़िया लिखा है।

2 मार्च 2009 को 9:24 pm
अनूप शुक्ल ने कहा…

बेहतरीन कविता। आपने बहुत सरल अंदाज में बहुत कुछ कह दिया। शानदार!

3 मार्च 2009 को 12:56 am

ना जाने कहाँ के और कैसे सवाल आते हैं
तुम्हारे दिमाग में
जिनमें सीधे-सीधे तो कुछ नही / पर
पीछे बहुत कुछ छिपा होता है

सीधे सरला लफ्जों में बहुत गहरी बात ..बहुत पसंद आई आपकी यह रचना

3 मार्च 2009 को 11:17 am
डॉ .अनुराग ने कहा…

सच में लाजवाब......सीधे शब्दों में बड़ी सरल सी बात तो सीधे मन में उतरती है

3 मार्च 2009 को 1:02 pm
प्रदीप कांत ने कहा…

अच्छी अभिव्यक्ति

14 मार्च 2009 को 1:47 pm